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म.प्र. में ‘शिवराज’ और ‘नरेन्द्र’ की जोड़ी के सामने टिक पाएगी कांग्रेस ?- अरुण पटेल

अरूण पटेल

मिशन-2018 के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी उस टीम का एलान कर दिया है जिसके भरोसे वह चौथी बार राज्य में सरकार बनाने की दिशा में सधे हुए कदमों से आगे बढ़ना चाहती है। लगभग 33 साल बाद भारतीय जनता पार्टी ने महाकौशल की सुध ली है।इस अंचल की राजनीति के स्पंदन केन्द्र जबलपुर से तीन बार लगातार लोकसभा चुनाव जीत रहे राकेश सिंह को पार्टी की कमान सौंप दी है। राकेश सिंह की भूमिका भाजपा में एक पूरक सप्लीमेंट की होगी जबकि असली चुनावी लड़ाई के मुख्य किरदार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की जिताऊ जुगल जोड़ी होगी। विधानसभा और लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भाजपा ने लगे हाथ चुनाव प्रबंधन समिति का एलान कर दिया है और बतौर संयोजक तोमर को जिम्मेदारी सौंपी गई है। चुनाव प्रबंधन समिति के माध्यम से सभी जातियों, वर्गों और अंचलों को साधने की कोशिश की गई है ताकि दल के भीतर समरसता हो। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस 2018 के विधानसभा चुनाव को ‘करो या मरो’ की भावना से लड़ने का मन बना रही है लेकिन लाख टके की बात यही है कि क्या कांग्रेस इस साल के विधानसभा चुनाव में उस जुगल जोड़ी के सामने टिक पाएगी जो भाजपा के लिए 2008 और 2013 में  लकी साबित हुई है।

महाकौशल अंचल परंपरागत ढंग से कांग्रेस और समाजवादियों का गढ़ रहा है, लेकिन 2003 से यहां भाजपा ने अपनी जड़ें काफी मजबूत कर ली हैं। इससे पूर्व 90 के दशक में इस अंचल में भाजपा को अच्छी खासी चुनाव में सफलता मिली थी। डेढ़ दशक से भाजपा इस अंचल में मजबूत रही है और कांग्रेस को भी इसी अंचल में सबसे अधिक उम्मीद है। इस अंचल के लोगों के मन में यह टीस रही है कि महाकौशल को राजनीतिक तौर पर वह महत्व  नहीं मिला जो पहले मिला करता था। एंटीइंकम्बेंसी की चिंता भाजपा को भी सता रही है और वह नहीं चाहती कि इस अंचल में उसका आधार कमजोर हो। कांग्रेस यहां की बंजर जमीन को खुद के लिए उर्वरा बना पाए, इसलिए राकेश सिंह को प्रदेश का मुखिया बनाया है। यह सही है कि राकेश सिंह जबलपुर से सांसद रहे हैं लेकिन फिर भी उन्हें पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बनाने के लिए काफी मशक्कत करना होगी, क्योंकि चुनाव में लगभग सात माह का समय शेष है। उनकी इस कमी को शिवराज सिंह और नरेन्द्र सिंह तोमर मिलकर पूरा करेंगे और पूरे चुनावी समर में यह दोनों चेहरे ही अधिक सक्रिय रहने वाले हैं। चूंकि भाजपा ने महाकौशल को प्रदेश अध्यक्ष का पद देकर उस टीस को दूर करने की कोशिश की है जिसको लेकर उपेक्षा का भाव माना जा रहा था। वैसे विधानसभा अध्यक्ष के रूप में ईश्वरदास रोहाणी दस साल तक पदासीन रहे लेकिन यह एक संवैधानिक पद है जिसका राजनीतिक फायदा पार्टियों को नहीं मिल पाता है क्योंकि अध्यक्ष कभी भी खुलकर राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेते हैं। कांग्रेस के सामने भाजपा की चुनौती का माकूल उत्तर देने के लिए विकल्प सीमित हैं। महाकौशल अंचल का प्रतिनिधित्व करने वाले कांग्रेसी चेहरों में तीन बड़े नाम उभरकर सामने आते हैं और वे हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ, राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा और पूर्व सांसद रामेश्वर नीखरा। इसके अलावा चौथा नाम सुरेश पचौरी का लिया जा सकता है जिनका जन्म स्थान तो भोपाल रियासत में है लेकिन राजनीति में उन्होंने अपनी कर्मभूमि होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर को बना रखा है। वे इस इलाके में काफी सक्रिय रहते हैं। अब देखने की बात यही होगी कि कांग्रेस इनमें से किस किस को किस भूमिका में शामिल करती है। कांग्रेस की भी अब राजनीतिक मजबूरी हो गई है कि वह अब महाकौशल को पूरी तवज्जो दे।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कह चुके हैं कि 2018 में प्रदेश में कांग्रेस को जिता कर उसकी सरकार बनाना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसके साथ ही वे यह भी कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री का पद वे स्वीकार नहीं करेंगे। यह हकीकत है कि कांग्रेस गुटों धड़ों और उप गुटों में बुरी तरह से बंटी हुई है और आज कांग्रेस को उस एकजुटता की जरूरत है जो कि हाथ में हाथ थामकर केवल दिखावटी रस्म अदायगी मात्र न हो बल्कि दिल भी आपस में जुड़े होें। दिग्विजय का कहना है कि अब वे राजनीतिक तौर पर प्रदेश में सक्रिय होंगे और उनका काम सभी कांग्रेसियों को एकसाथ मिलाकर उनके मतभेद दूर कराना होगा। इसके लिए वे ‘संगत में पंगत’ का आयोजन करेंगे और सभी को साथ बिठाकर उनके साथ भोजन करेंगे। संगत में पंगत से ही बात बनने वाली नहीं है इसके  इतर भी कुछ प्रयास करना होंगे क्योंकि साथ बैठने से ही मतभेद और मनभेद कैसे दूर होंगे, इस दिशा में ईमानदारी वाले प्रयासों की जरूरत होगी। कांग्रेस में अभी कमी इसी बात की है कि लोगों को इस बात का भरोसा नहीं है कि वास्तव में नेता एक हो गए हैं और एक दूसरे की टांग खिंचाई नहीं करेंगे। संगत में पंगत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजा और महाराजा यानी दिग्विजय और ज्योतिरादित्य सिंधिया कितने नजदीक आए हैं और इनके आपस में दिल कितने मिल गए हैं? अन्य नेताओं को एक करने में दिग्विजय को अधिक मशक्कत नहीं करनी होगी, लेकिन उनके और सिंधिया के रिश्ते व्यक्तिगत भरोसे के बन गए हैं और दोनों एकजुट होकर कांग्रेस को जिताने के लिए काम कर रहे हैं न कि एक होने की रस्म अदाएगी कर रहे हैं। इन्ही प्रयासों में अधिक मशक्कत की जरूरत इसलिए होगी क्योंकि न केवल दोनों एक हो गए हैं यह उन्हें दिखाना है बल्कि आम लोगों के गले भी अपने कार्य व्यवहार से यह बात उतारना होगी कि अब राजा और महाराजा भी एकसाथ हैं। कांग्रेस को अभी यह तय करना है कि कौन नेता चुनावी समर में किस भूमिका में रहेगा? जबकि भाजपा ने इस मामले में बाजी मार ली है भले ही इस मामले में करीब 6 माह की देरी हो गई है। नंदकुमार सिंह चौहान की विदाई तो लगभग छह माह से अपेक्षित थी लेकिन फिर भी कुछ कारणों से उन्हें अभयदान मिलता रहा लेकिन जब उच्च कमान को यह भरोसा हो गया कि वे जिताऊ टीम के कारगर अंग नहीं हो सकते तब नए अध्यक्ष की ताजपोशी की। चौहान की विदाई में एक अनुभवी नेता की जो प्रतिक्रिया थी वह अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है और साथ में परिवर्तन की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश जोशी का कहना था कि भाजपा संगठन की गाड़ी तो सही चल रही थी पर ड्रायवर में कुछ कमी थी इसलिए बदलाव हुआ।

जहां तक राकेश सिंह का सवाल है वे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र सिंह तोमर के भी विश्वास पात्र हैं। केंद्रीय नेतृत्व का राकेश सिंह पर कितना भरोसा था इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक हैं और उन्हें महाराष्ट्र का सहप्रभारी बनाया गया था। अब महाराष्ट्र का प्रभार वे छोड़ने वाले हैं क्योंकि उन्हें अब पूरी तरह से चुनावी साल में प्रदेश में सक्रिय होना है। भाजपा ने जो चुनावी जमावट की है उसमें यदि मुख्यमंत्री का पद शिवराज सिंह चौहान पूर्व भोपाल रियासत घटक के पास है तो प्रदेश की कमान महाकौशल को दे दी गई है। चुनाव प्रबंधन समिति बनाकर बतौर संयोजक नरेन्द्र सिंह तोमर को सौंप दी गई है। जिससे ग्वालियर और चंबल संभाग को भी इन अचंलों की तरह महत्व मिल गया है। इस समिति में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि इसका तानाबाना ऐसा बने जिससे कि पार्टी में समरसता बने और सभी को अहसास दिलाया जाए कि भाजपा सबको साथ लेकर चलती है। बतौर सह संयोजक नरोत्तम मिश्रा, लाल सिंह आर्य और फग्गन सिंह कुलस्ते को शामिल किया गया है। आरक्षण के मुद्दे को लेकर भाजपा में अपने आप को उपेक्षित महसूस करते हुए ब्राह्मण समाज में नाराजी का भाव है और उसे दूर करने के लिए ही नरोत्तम मिश्रा को सह संयोजक बनाया गया है। दलितों को साधने के लिए लाल सिंह आर्य और आदिवासियों को साधने के लिए फग्गन सिंह कुलस्ते को सह संयोजक बनाया गया है। यही दोनों वर्ग भाजपा से दूर होते जा रहे हैं। आदिवासियों का झुकाव कांग्रेस की तरफ बढ़ रहा है और दलित भी कांग्रेस के साथ न चला जाए इन्हें थामने के लिए कुलस्ते और आर्य को आगे किया गया है। चुनाव प्रबंधन समिति के हाथ में ही सारी चुनावी चक्रव्यूह रचना रहेगी। इस समिति में केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत, राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय और उपाध्यक्ष प्रभात झा, सासंद प्रहलाद पटेल, नंदकुमार सिंह चौहान, भूपेन्द्र सिंह, राजेन्द्र शुक्ल और माया सिंह को भी रखा गया है। इस समिति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और महामंत्री संगठन सुहास भगत पदेन सदस्य होंगे। यह तो चुनाव नतीजों से ही पता चल पाएगा कि भाजपा ने जिस उद्देश्य से नई जमावट की है उसमें वह कांग्रेस को रोकने में कितनी कामयाब हुई।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।