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मोदी इस बार गुजरात चुनाव को लेकर पुराने आत्मविश्वास में नहीं – राज खन्ना

राज खन्ना

यह भाजपा शासित एक राज्य के मुख्यमंत्री का हल्के-फुल्के क्षणों में पत्रकारों के बीच का कथन है। 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी ने उन्हें पांच दिन गुजरात में प्रचार अभियान में लगाने के लिए कहा था। वहां के कार्यक्रम गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समन्वय से तय होने थे। उन्होंने मोदी से संपर्क किया तो आत्मविश्वास से भरे मोदी ने हंसते हुए पांच दिन की छुट्टी परिवार के साथ कहीं और बिताने का सुझाव दिया। यह मुख्यमंत्री इस बार गुजरात जाएंगे। अन्य भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और विभिन्न इलाकों के तमाम नेताओं-कार्यकर्त्ताओ को भी पार्टी वहां सक्रिय कर रही है।

उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी तो चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले ही गुजरात का एक दौरा कर चुके हैं।हफ्ते भर के लिए फिर जाएंगे। पार्टी पहले भी ऐसा करती रही है। लेकिन 22 साल से गुजरात की सत्ता पर काबिज भाजपा को इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है। दिलचस्प है कि अब तक के सभी ओपिनियन पोल उसके माफिक हैं।विपक्षी कांग्रेस के पास गुजरात में कोई बड़ा चेहरा नहीं है। उसका संगठनात्मक ढांचा बुरे हाल में है। पिछली पराजयों से हताशा है।फिर भी मोदी-शाह और भाजपा पिछले मौकों की तरह इस बार गुजरात को लेकर पुराने आत्मविश्वास में नहीं हैं।

क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि इस बार मोदी वहां मुख्यमंत्री के रूप में नहीं हैं? उनके प्रधानमन्त्री बनने के बाद बनाई गई मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को बीच रास्ते पार्टी को हटाना पड़ा था। उनकी जगह लेने वाले विजय रूपानी भी प्रभावशाली सिद्ध नहीं हो सके हैं। या फिर लम्बे समय से पार्टी के सत्ता में रहने के कारण उसे सत्ता विरोधी रुझान का सामना करने का खतरा दिख रहा है?केंद्र के प्रति बढ़ती नाराजगी और मोदी लहर का उतार तो इसकी वजह नहीं है? कोई एक वजह  या फिर कई वजहों ने मिलकर गुजरात चुनाव को गुजरात से ज्यादा बाकी देश की दिलचस्पी के केंद्र में ला दिया है।फिर भी पार्टी का आंतरिक आकलन है कि चुनाव तो जीत लिया जाएगा,लेकिन बेशक चुनौती बढ़ी हुई है। मुख्य विपक्षी कांग्रेस की कमजोरी के बाद भी यह चुनौती क्यों बढ़ी या फिर तारीखें नजदीक आने के साथ और विस्तार क्यों पा रही है ?

गुजरात मोदी के हटते ही पार्टी को आँखे क्यों दिखाने लगा है? पार्टी वहां मोदी का विकल्प क्यों नहीं पा सकी?  अगर सवाल मोदी को लेकर है तो जबाब भी मोदी को ही देना है। जब चेहरे पार्टी से बड़े हो जाते हैं तो ऐसी ही रिक्तता से दरपेश होना पड़ता है। मोदी के गुजरात में रहते हुए उन पर यही आरोप रहा है कि उन्होंने अपने सामने किसी को उभरने नहीं दिया। ठीक उसी तर्ज पर जैसे कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होते ही उन्होंने पार्टी के अपने प्रतिद्वन्दियों को किनारे लगाना शुरू किया और फिर प्रधानमन्त्री बनने के बाद उन्हें दर्शक दीर्घा का मूक श्रोता बना दिया।

भाजपा फ़िलहाल मोदीमय है, इसलिए इससे फर्क नहीं पड़ता कि गुजरात में मोदी के हटने के बाद वहां मुख्यमंत्री कौन बना या फ़िलहाल कौन है ? उन्होंने जिसे चाहा बनाया और जब चाहा हटाया। इसलिए जीतना भी उन्ही को है और हारना भी उन्हीं को। मोदी इससे बखूबी वाकिफ़ हैं। उन्होंने चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले ही गुजरात की महीने भर में तीन यात्राएं की। वह संसद में उत्तर प्रदेश से हैं लेकिन उनकी जड़ें गुजरात में हैं। जड़ों के हिलने के खतरों और नतीजों को लेकर वह चौकन्ने हैं। मोदी-शाह की जोड़ी को पता है कि गुजरात में उनका कमजोर होना मुख्य विपक्षी कांग्रेस से ज्यादा पार्टी के भीतर अलग-थलग पड़े उनके कमजोर विरोधियों को संजीवनी देगा।उस हाल में उन्हें 2019 के पहले पार्टी के मोर्चे पर एक और लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

गुजरात में भाजपा की चुनौती मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस से ज्यादा अलग धारा के तीन युवा नेताओं ने कड़ी की है।पाटीदार आंदोलन के नेता के रूप में उभरे हार्दिक पटेल ने 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद में पांच लाख की रैली करके सबको हैरान कर दिया। बाद के आंदोलन की तेज आंच के बीच आनंदी बेन की कुर्सी गई। गुजरात की 182 सीटों में 70 में पटेल प्रभावी स्थिति में हैं। इस आंदोलन के प्रभाव में ही 2015 में सौराष्ट्र की 11 में आठ जिला पंचायतों पर कांग्रेस का कब्जा हो गया। उधर ओबीसी चेहरे अल्पेश ठाकुर हैं जिन्होंने 80 सीटों पर बूथ स्तर पर आधार खड़ा किया है। 66 सीटों पर ओ बी सी प्रभावी हैं। कई चुनावों से भाजपा की तरफ रहे ओबीसी मतदाताओं को कांग्रेस से जुड़ चुके अल्पेश अपनी पार्टी की और खींचने में लगे हैं।ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलित उत्पीड़न की व्यापक रूप से प्रचारित वारदात के बाद विरोध में 20 हजार दलितों के साथ आजादी कूच आंदोलन करने वाले दलित युवा जिग्नेश मेवानी भी भाजपा को हराने के अभियान पर हैं। दलित-मुस्लिम  गठबंधन कांग्रेस के लिए लाभकर हो सकता है। हार्दिक फिलहाल कांग्रेस से मोलभाव में लगे हैं लेकिन अल्पेश और जिग्नेश कांग्रेस को ताकत दे रहे हैं।

गुजरात की चुनौती केवल एंटी इन्कम्बेंसी, जातीय असंतोष और राज्य सरकार की विफलताओं से ही आकार नहीं पा रही है। असलियत में वहाँ मोदी और उनकी केंद्र सरकार का भी बड़ा इम्तहान है। पहले नोटबंदी और फिर जी एस टी ने वहां असन्तोष की आग को भड़काया है।आर्थिक सुधार और भ्रष्टाचार पर चोट के नाम पर उठाये इन कदमों का जाहिर तौर पर तालुक्क सम्पन्न और मंझोले कारोबारियों से माना जाता है। यह एक छोटा वर्ग है और यह चुनाव नतीजों में उलटफेर कर सकता है, इसकी उम्मीद कम की जाती है। लेकिन इन कदमों का रोजी- रोजगार पर कितना बड़ा असर पड़ सकता है, इसका शायद उन्हें उठाये जाते समय सरकार को अनुमान नहीं था। व्यापार जगत में अराजक स्थिति और तमाम छोटे कारोबारियों के कारोबार ठप होने से बहुतों की रोजी छिनी या आशंका पैदा हुई है। इसका सन्देश और खतरा कितना गहरा है कि गुजरात ने मोदी को लाचार स्वरों में कहते सुना कि जी एस टी का फैसला अकेले उनका नहीं था।

राष्ट्रवाद के भड़कीले नारे और तकरीरें। गोरक्षा और हिन्दू- मुस्लिम के सवाल या फिर जातीय गोलबंदी तब कसैली लगती है,जब पेट पर लात पड़ती है। गुजरात की स्थिति और उसके आंतरिक समीकरण ही वहां निर्णायक नहीं हैं। बाकी देश का सन्देश भी गुजरात पर असर डालेगा।ठीक उसी तरह जैसे गुजरात 2019 की पटकथा लिखेगा। माफिक नतीजों की दशा में भी वहां की चुनौती मोदी-शाह की जोड़ी को पार्टी और सरकार को चलाने के तौर-तरीकों पर पुनर्विचार को मजबूर कर सकती है।

 

सम्प्रति-लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक से जुड़े श्री खन्ना जाने माने राजनीतिक विश्लेषक भी है।