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’’मीडिया निर्माण का दूसरा केजरीवाल’’- रघु ठाकुर

हमारे देश में आजकल बुद्धिजीवियों की बहस अमूमन अबौद्धिक और पक्षपात पूर्ण होती है।पिछले दिनों जे.एन.यू. को लेकर जिस प्रकार का विभाजन और आरोप प्रत्यारोप प्रचार तंत्र में छाया रहा है वह करीब-करीब इसी धारणा को पुष्ट करता है। दरअसल जे.एन.यू के बारे में पिछले दिनों जिस प्रकार के हमलो की शुरुआत श्री सुब्रमण्यम स्वामी ने की थी, उससे विश्वविद्यालय का सावधान तबका और अधिक सचेत हो गया, तथा उसके मन में यह धारणा बन गई थी कि स्वामी के द्वारा शुरुआत केन्द्रीय सरकार और उसके अखिल भारतीय संगठन के इशारे पर है।जिसके एक कद्दावर नेता के रुप में सुब्रमण्यम स्वामी जाने जाते है। उसके कुछ दिनों पश्चात सोशल मीडिया पर अफजल गुरु, जिसे सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति जी ने दोषी माना तथा मृत्युदण्ड दिया कि स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। बताया जाता है कि इस कार्यक्रम में कश्मीर को भारत से आजाद करने के नारे लगे और अज्ञात तत्परता की वजह से दिल्ली पुलिस ने इसको लेकर श्री कन्हैया कुमार जो जे.एन.यू.छात्र संघ के अध्यक्ष है तथा अन्य लोगो के विरुद्व राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया तथा श्री कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।हालांकि बाद में स्वतः दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को यह कहा कि श्री कन्हैया कुमार के द्वारा नारे लगाने का कोई वीडियो उनके पास नही है। भाजपा के बौद्धिको ने इस गिरफ्तारी के पक्ष में खडे़ होते हुये यह कहना शुरु किया कि जे.एन.यू. राष्ट्र द्रोहियो का अड्डा बन गया और दूसरे पक्ष ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को सीधे गिरफ्तारी का जिम्मेदार ठहराते हुए जे.एन.यू. की संस्कृति परम्परा आदि का गुणगान शुरु किया तथा यह भी बताना शुरु किया कि जे.एन.यू कितना महान विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय से कौन-कौन महान लोग निकले है।

जे.एन.यू. अपनी स्थापना के समय से ही कांग्रेस के मित्र साम्यवादियों का वैचारिक केन्द्र रहा है। हालांकि आपातकाल और बाद के दिनो में सी.पी.एम. समर्थक शिक्षकों और छात्र नेताओं की सोच में कांग्रेस के प्रति कुछ फर्क आ गया था। परन्तु वह एक अस्थाई दौर था और अब-जब पश्चिम बंगाल में साम्यवादी मित्रों का जनाधार कमजोर पड़ा है तब उन्हें अपने जनाधार को तथा पश्चिम बंगाल की सत्ता को पुनः पाने के लिये कुछ नये तरीके खोजना पड़ रहे है।लगभग यही स्थिति राजनैतिक रुप से कांग्रेस पार्टी के साथ भी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की संख्या संसद में सिकुड़ कर 44 तक पहॅुचने के बाद कांग्रेस पार्टी भी अपने खोये हुए जनाधार को पाने के लिये बैचेन है और बैचेन होना स्वाभाविक भी है। अतः कांग्रेस पार्टी भी ऐसे हर सवाल को हथियाने का प्रयास करती है जो उनका नेहरु काल का सामाजिक आधार जिसमें ब्राम्हण,सवर्ण, अल्पसंख्यक और दलित शामिल थे। जिसके आधार पर कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद लगातार लगभग 30 साल तक केन्द्र और राज्य में सत्तासीन रही, को वापस पाना चाहते है। दूसरे भाजपा भी अपने जनाधार के विस्तार को कायम रखने के लिये अब राम, एंव हिन्दु को राष्ट्रवाद के विशाल वृक्ष की छाया में सुरक्षित करना चाहते है और इसीलिये इन दो राजनैतिक किलेवंदियों में देश का बौद्धिक जगत एंव मीडिया बॅट गया है। हालांकि इस किले युद्धो से इन दोनो राजनैतिक धड़ो को कितनी सुरक्षा मिलेगी कहना अभी कठिन है, परन्तु बिल्ली के बंदरबॅाट की चर्चा जरुर हो रही है और वैश्विक, आर्थिक, शक्तियां अवश्य इससे सुरक्षित हो गई है। क्योंकि पुनः देश में हिन्दु बनाम मुस्लिम, सवर्ण बनाम अवर्ण का मानसिक विभाजन गहरा हो गया है तथा आर्थिक सवाल और बुनियादी परिवर्तन के सवाल पीछे ढकेल दिये गये है।

इस प्रसंग में निम्न बिन्दुओं पर विचार करना होगा।

1.            जे.एन.यू. निंसदेह अपनी स्थापना के समय से एक वैश्विक ज्ञान का केन्द्र रहा है। जिसमें महान व्यक्ति तो नही कह सकते परन्तु उसने देश को नौकरशाह काफी दिये है। लगभग 80 के दशक तक देश के शीर्ष नौकरशाही में जे.एन.यू. की हिस्सेदारी सर्वाधिक होती थी और उसका एक बड़ा कारण अंग्रेजी भाषा तथा जे.एन.यू. वाद भी था। जे.एन.यू. के निकले हुए लोग वे चाहे राजसत्ता में रहे हो या प्रशासन में जे.एन.यू के लोगों को ही सबसे अधिक योग्य और लोकतंत्र, खुलेपन तथा मुक्कबल आजादी, समता और विविधता का एक मात्र वाहक मानते है। मुझे स्मरण है कि स्वः दिग्विजय सिंह जो कि उस समय केन्द्रीय राज्य मंत्री थे ने एक राज्यपाल महोद्य को जो बिहार से थे और उनके करीबी भी थे से एक मित्र को कुलपति के पद के मनोनयन की सिफारिश की थी तथा उन्होंने दूरभाष पर मेरे सामने कहा बगैर किसी पूछताछ के व्यक्ति का चयन कीजिये। वह तो जे.एन.यू. का है। कई बार कई नौकरशाह मित्र मुझसे भी पूछते हैं कि आप तो जे.एन.यू में पढ़े होगे। शायद उन्हें यह भ्रम जे.एन.यू. की योग्यता का एकाकार दावे के कारण है। क्योकि वहां से निकले नौकरशाहों का यह दृढ़ विश्वास अंधविश्वास जैसा बन गया है कि योग्यता जे.एन.यू. का ही अधिकार है तथा संविधान के मूल्यो की एक मात्र वाहक जे.एन.यू. ही है। हालांकि आजादी के बाद के समता स्वाधीनता के आंदोलन में सक्रिय भाग लेने वालों और अपने कैरियर को दांव पर लगाने वालों की संख्या जे.एन.यू., इलाहाबाद, पटना और देश के कम चर्चित जबलपुर, सागर जैसे अनेक विश्वविद्यालय में से भागीदारी काफी रही है। अभी आपातकाल के दौरान गिरफ्तार छात्र नेताओं की संख्या का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो जे.एन.यू. से इतर विश्वविद्यालयो के छात्रों और नेताओं की संख्या जे.एन.यू. से ज्यादा थी।

2.            जे.एन.यू. चूंकि इंदिरा गांधी के स्वप्न कल्पना की उड़ान का विश्वविद्यालय था। अंतः उन्होंने इसके लिये केन्द्रीय बजट का आंवटन दिल्ली से किया। जहां राज्यों के विश्वविद्यालयों को शिक्षको के वेतन देने में परेशान रहना होता था वही जे.एन.यू. अति सम्पन्न शिक्षण संस्थान रहा है।

3.            शिक्षण संस्थायें होती है जिनमें छात्र या विभिन्न प्रकार के विचारो के छात्र आकर पढ़ते है। अतः किसी भी शिक्षण संस्था को समूचा राष्ट्रद्रोही कहना गलत है और किसी शिक्षण संस्था को एक मात्र मूल्यों का वाहक घोषित करना भी गलत है। निसंदेह भारत सरकार की पुलिस ने कन्हैया कुमार के विरुद्व या अन्यों के विरुद् राष्ट्रद्रोह की कार्यवाई करने की अनावश्यक तत्परता की। अगर कश्मीर को अलग करने वाले कश्मीर में ही अल्पमत में है और कश्मीर में उनकी आम स्वीकारिता नही है तो वे जे.एन.यू. में कुछ नारे लगाकर भारत की एकता को खंडित कर सकते है यह अतिरेकी सोच होगी, पर इसके साथ दूसरा प्रश्न भी है जिसका उत्तर कन्हैया कुमार और उनके बामंपथी मित्रों को देना चाहिये कि अफजल गुरु जैसे सिद्व अपराधियों की स्मृति के कार्यक्रम जे.एन.यू या किसी अन्य शिक्षण संस्थाओं में क्यों होना चाहिये ? क्या जितना बड़ा अपराध गोडसे की पूजा करने वाले, मूर्ति लगाने वाले या मंदिर बनाने वाले कर रहे है? वैसा ही अपराध अफजल गुरु की पूजा करने वाले नही कर रहे है। मेरी राय में गोडसे पूजक और अफजल गूरु के पूजक समान रुप से दोषी है। हालांकि मैं इस राय का भी हॅू कि इनके साथ खुला संवाद होना चाहिये और अगर इस सवाल से बचना चाहें तभी इनके विरुद्व कार्यवाही हो। मेरा विश्वास है अगर यह लोग खुले संवाद में शामिल होगे तो इनकी धारणायें बदलेगी परन्तु दोनो ही पक्ष के मित्र लोकतंत्र की परिभाषा या आजादी की कल्पना अपने ही, दृष्टिकोण से करना चाहते है।

4.            जो लोग यह दावा करते है कि जे.एन.यू में वैचारिक कटुता नही है या जे.एन.यू हार्बड या आक्सफोर्ड की तरह है और वहां एक उदार माहौल हो। मैं कहना चाहता हॅू कि वैसे तो हर विश्वविद्यालय में उदार माहौल होना चाहिये और संवाद होना चाहिये परन्तु वैचारिक कटुतायें और विषमतायें जे.एन.यू में भी है।जे.एन.यू. में पिछले दिनों महिला छात्राओं के साथ भेद-भाव और अपराधिक व्यवहार की शिकायतें अखबारो में आई थी। हांलाकि इन शिकायतो को पुरुषवादी वर्चस्व ने ज्यादा चर्चित नही होने दिया और जो जे.एन.यू. के छात्र निर्भया कान्ड को लेकर सक्रिय थे वे अपने आंतरिक घटनाओं को लेकर मुखर नही हुये। यह भी एक अनुदारता है। दलीय छात्र संगठनो के बीच कई बार जे.एन.यू. में हिसंक संघर्ष भी हुये और जिसका प्रमाण वहां के पुराने छात्र दे सकते है। 1990 में मंडल कमीशन के समय भी जे.एन.यू. मंडल विरोधी प्रमुख केन्द्र बना था। हालांकि तब अम्बेडकरवादियो का स्वर इतना मजबूत नही था। यह अच्छा है कि अब अम्बेडकरवादी पहले से ज्यादा सक्रिय है और जिस वामपंथी नेतृत्व को बाबा साहब अम्बेडकर ने सवर्णवादी कह कर निकाल दिया था अब वे उनके साथ परिर्वतन की संभावनाओं की तलाश का प्रयोग कर रहे है। अनुदारता और पाखण्ड भारतीय समाज की सैकड़ों वर्षो की बीमारी है, और जे.एन.यू. के छात्र भी इसी बीमार समाज से आते है। निसंदेह शिक्षा और संवाद कुछ मनोरोगों का इलाज करता है परन्तु रोग से संपूर्ण मुक्ति और रोग पैदा न हो सके, ऐसी उर्वरकता एक कठिन लक्ष्य है यद्धपि मैं इस प्रयास को पंसद करुंगा और अगर वे ऐसा कर सके तो अपनी शुभकमनायें भी दूंगा।

5.            वामपंथी मित्रो की राजनैतिक बैचेनी भी इससे महसूस की जा सकती है कि जिस एस.यू.पी.आई जिसके नेता कामरेड शिवदास घोष थे को अभी तक पश्चिम बंगाल की सी.पी.आई., सी.पी.एम और वामपंथ मोर्चा अपना शत्रु मानते थे आज कल वह उनके वामपंथी मोर्च का सम्मानित घटक है। अभी पिछले 30 वर्षो के समाचार पत्र को देखा जाये तो सी.पी.एम और एस.एस.यू.आई के युद्व में कितने लेाग मारे गये और आज वह राजनैतिक सत्ता की वापसी के लिये एकजुट है। इसका अर्थ यह भी है कि यह वामपंथी मित्र आरोप प्रत्यारोप सत्य के आधार पर नही बल्कि राजनैतिक अवसर पैदा होने पर करते है।

6.            श्री कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के कुछ दिन बाद वे जेल से रिहा होकर जे.एन.यू. परिसर पहुंचे और जहां उनके समर्थक संगठनो ने उनका स्वागत किया। इसमें कोई दो राह नही है कि दिल्ली के पटियाला हाई कोर्ट में जिस प्रकार कुछ वकीलों ने कन्हैया कुमार पर हमला किया वह निदंनीय और शर्मनाक है तथा कानून को हाथ में लेने वाले न्यायिक परिसर में न्याय पालिका की अपमान करने वाले इन वकीलो के विरुद्व कार्यवाही तो होनी ही चाहिये। एंव उनकी सनद भी रद्द होना चाहिये। कन्हैया कुमार का भाषण जैसा की मुझे बताया गया कि लगभग 40 मिनट तक अनेको बड़े-बड़े राष्ट्रीय टी.वी.चैनलो पर जींवत प्रसारण किया गया। जिसकी व्यापक चर्चा राष्ट्रीय समाचार पत्रों के प्रमुख पृष्ठों पर देश के प्रिंट मीडिया के एक बड़े धड़े ने भी की। आश्चर्यजनक है मुझ जैसे कितने ही लोग देश में है यहां तक की वामपंथी पार्टियो में भी है जिन्होंने कभी अपने विचारो को लेकर जमानत नही दी भले ही उन्हें सालो साल जेल में रहना पड़ा हो, परन्तु कन्हैया कुमार देश के मीडिया के बड़े हिस्से के लिये अचानक इतना प्रिय हो गया कि मीडिया लगभग उसी प्रकार उसे माहिमा मंडित करने में लग गया जैसा आरंभिक दौर में अन्ना हजारे और आप पार्टी की स्थापना के समय केजरीवाल मय हो गया था। आजकल राजनैतिक नेतृत्व संघर्ष, चरित्र, विचार या कुर्बानी से पैदा नही होता बल्कि मीडिया से पैदा होता है। पिछले कुछ वर्षो से राजनैतिक नेतृत्व मीडिया का उत्पाद बन गया है। चाहे वह नरेन्द्र मोदी हो, अन्ना या केजरीवाल हो ओैर अब कन्हैया कुमार। यह दूसरे केजरीवाल का उदय किसी छिपी दुरभि संधि का परिणाम नजर आती है

मैं भाजपा और भारत सरकार से तथा वामपंथी मित्रो से अपील करुगां किः-

1.            किसी भी समूची संस्था को आरोपित न करे और शिक्षण संस्थाओं में ऐसे गैर जरुरी संविधान और राष्ट्रीय एकता के विरोधी आयोजनो को भी महिमा मंडित न करें।

2.            विज्ञापनी या मीडिया के उत्पाद नेताओं के प्रति कुछ सावधानी रखे क्योंकि न केवल देश में बल्कि दुनिया में आज भी मीडिया का निंयत्रक आर्थिक शक्तियां है और वे जरुरत के अनुसार नये-नये राजनैतिक उत्पाद ब्रांड और मुद्दे तैयार करते है, उनका इस्तेमाल करते है और फिर उन्हे बाजार की संस्कृति ’’यूज एण्ड थ्रो’’ के अनुसार फेंक देते है।

3.            ऐसी वक्ती घटनाओं से क्रांतिकारी और विचारों की राजनीति पीछे ढ़केली जा रही है। संकल्पित नेतृत्व जा रहा है दरअसल यह राजनैतिक प्रक्रिया को चुनौती है कि नेतृत्व का निर्माण व्यक्ति का जीवन, दल या जनता करेगी या फिर उनके ऊपर फिल्म के हीरो थेाप दिये जायेगे। जिस प्रकार सिनेमा पट पर अचानक एक हीरो प्रकट होता है और वह सबको परास्त कर देता है इसी प्रकार बाजार और मीडिया राजनीति में हीरो बना और मिटा रहा है यह लोकतंत्र की प्रणाली के लिये एक बड़ी चुनौती है।

 

सम्प्रति – लेखक श्री रघु ठाकुर देश के जाने माने समाजवादी चिन्तक है।वह लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक भी है।