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भूपेश की ग्रामीण पृष्ठभूमि और ठेठ छत्तीसगढियापन भा रहा हैं लोगो को – दिवाकर मुक्तिबोध

दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन दिनों ग्रामीण जनता से सीधे संवाद के लिए उनके बीच हैं। चार मई से उनकी यात्रा सरगुजा संभाग के बलरामपुर जिले से प्रारंभ हुई जो संभवतः 15 जून तक चलेगी। वे सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में जाएंगे। हर जिला मुख्यालय में वे रात्रि विश्राम करेंगे और प्रत्येक विधानसभा के किन्हीं तीन गांवो के निवासियों से बातचीत के जरिए जानने की कोशिश करेंगे कि सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ उन्हें मिल रहा है अथवा नहीं ? शासन-प्रशासन से संबंधित उनकी समस्याएं क्या हैं ? वे क्या चाहते हैं ? सरकार से उनकी अपेक्षा क्या है? चूंकि विधानसभा चुनाव अगले वर्ष नवंबर में होने है इसलिए जाहिर है यह उनका चुनावी दौरा है। गांव वालों की राय व उनकी समस्याओं को जानने-समझने का प्रत्यक्ष लाभ बघेल सरकार को अपनी स्थिति का आकलन करने एवं तदानुसार कामकाज में सुधार के रूप में मिलेगा। सुधार के बाद, बशर्ते वह हो, पुनः स्थिति को टटोलने अगली गर्मियों में मुख्यमंत्री का ग्रामीण दौरा तय मानना चाहिए क्योंकि तब विधानसभा चुनाव के लिए चंद महीने ही शेष रहेंगे।

अपने कार्यकाल के साढे तीन वर्षों में , जिसमें दो वर्ष कोविड से जूझने में निकल गए , मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का यह पहला सघन दौरा है। राजनयिकों के ऐसे दौरे कुछ समय तक आम आदमी बनकर आम जनता के बीच बसर करने के होते हैं यानी एक सामान्य आदमी के कंधे पर हाथ रखना, बातों से दुलारना, उसकी तकलीफों को जानना-समझना , उसे आश्वस्त करना, उसकी शिकायत पर तत्काल संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों को दंडित करना तथा उसके साथ जमीन पर बैठकर भोजन करना और उसके उत्सव में भी शामिल होना। सभी सत्ताधारी दल के प्रमुख समय समय पर यहीं करते रहे हैं। मुख्यमंत्री भूपेश भी यही कर रहे हैं पर वे अन्य की तुलना में अधिक प्रभावित करते हैं। कारण है उनकी ग्रामीण पृष्ठभूमि और उनका ठेठ छत्तीसगढियापन जो उनके व्यवहार से झलकता है और जो ग्रामीण जनता को लुभाता है, अपनत्व महसूस कराता है।

इसमें दो राय नहीं कि बघेल पक्के छत्तीसगढ़िया हैं। उन्होंने अपने कामकाज व विचारों से साबित किया है कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति व लोक परम्पराओं के वे सच्चे रक्षक हैं और इसकी समृद्धि के लिए भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। तीज त्योहारों को शासकीय स्तर पर मनाने का नीतिगत निर्णय, शासकीय अवकाशों की घोषणा , छत्तीसगढ़ी व्यजंनों को प्रमोट करना, एक मई मजदूर दिवस पर राज्य के मूल निवासियों का भोजन, बोरे भात खुद खाना व लोगों को खाने के लिए प्रवृत्त करना, अक्षय तृतीया पर छत्तीसगढ़ की मिट्टी का पूजन जैसे सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए समूचे प्रदेश में त्योहारों का रंग बिखेरना, उत्सव का माहौल बनाना व इनमें स्वयं की सक्रिय भागीदारी उन्हें अपने पूर्ववर्तियों से अलग करती है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी व डॉक्टर रमन सिंह ने भी अपने तई कुछ इसी तरह की छवि गढने की कोशिश की थी पर वे आधीअधूरी रही, परवान नहीं चढ सकी बल्कि यों कहें जनता को वे प्रभावित नहीं कर सकी। जबकि बघेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ही इस बात का ध्यान रखा कि उनकी छवि विशुद्ध रूप से जमीन से जुड़े छत्तीसगढिय़ा नेता की बननी चाहिए और वह बनी भी। जाहिर है इसके पीछे उनका राजनीतिक स्वार्थ भी है यानी अपनी व पार्टी की सत्ता कायम रखने वोटों की राजनीति करना जिसका एक हथियार जनता को भावात्मक रूप से अपने से जोडना व प्रभावित करना है और ऐसा कोई मौका भूपेश बघेल चूकते नहीं है। तमाम उदाहरण सामने हैं।

दरअसल यह छवि ही उनका तुरूप का इक्का है जो चुनाव में उनके बहुत काम आएगा। लेकिन इसके साथ ही एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में उनकी साफ सुथरी छवि व प्रशासनिक क्षमता अधिक महत्वपूर्ण है। सत्ता के पिछले साढे तीन वर्षों में भूपेश बघेल सरकार ने अपनी नीतियों व सुशासन से समूचे देश का ध्यान आकर्षित किया है। सरकार ने दर्जनों ऐसी योजनाएं बनाईं जिसके केंद्र में आम आदमी है। उसकी चिंता का यह आम आदमी सर्वहारा वर्ग से है, किसान है, श्रमिक है , खेतीहर मजदूर है , गरीब है, महागरीब है,आदिवासी है व सरकारी कर्मचारी भी। सरकार ने इनके लिए कुछ किया है। पर यकीनन अभी बहुत कुछ होना बाकी है। इन दिनों विभिन्न स्तरों पर आंदोलन की गर्जनाएं सरकार के लिए चेतावनी की तरह हैं। हालांकि सरकार ने पिछले चुनाव में जनता से किए गए लगभग सभी वायदे पूरे कर दिए हैं और राज्य में एक नई अर्थ व्यवस्था को जन्म देने की कोशिश की है। आर्थिक मोर्चे पर केंद्र की बेरुखी व वित्तीय संकटों के बावजूद सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की जो योजनाएं बनाई वे बेजोड़ हैं। इन पर काम चालू है। यदि इनका केवल पचास फीसदी लाभ ग्रामीण आबादी को मिल जाए तो जल्दी ही छत्तीसगढ़ देश के सर्वाधिक समृद्ध व खुशहाल राज्यों में गिना जाएगा। वैसे भी बघेल के छत्तीसगढ़ माडल को राष्ट्रव्यापी सराहना मिली है। यह भी कम बडी बात नहीं हैं कि प्रदेश में बेरोजगारी दर अन्य राज्यों की तुलना में बहुत कम है। सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकानामी संंगठन के ताजा आंकडों के अनुसार छत्तीसगढ़ 0.6 प्रतिशत के साथ सबसे कम बेरोजगारी वाले राज्यों में पहले स्थान पर है। यानी लगभग हर हाथ को काम मिला हुआ है। ग्रामीण रोजगार के मामले में देश के किसी नीति निर्धारक के ध्यान में नहीं आया कि गाय के गोबर व गोमूत्र को भी कामधंधे से जोडा जा सकता है। पर बघेल व उनके विचारकों ने यह किया है। जाहिर है इस अभिनव कदम की भी खूब चर्चा है।

अगले माह जन-यात्रा के समापन के बाद मुख्यमंत्री के पास फीडबैक रहेगा कि सरकार के अब तक के कामकाज पर गांवों की जनता का क्या रूख है और सरकार की लोककल्याणकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर कैसी चल रही है। हालांकि उनका अब तक का अनुभव बताता है कि राजस्व मामलों को छोडकर बाकी सब व्यवस्थित है। यानी योजनाएं ठीक चल रही है। ध्यान रहे भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह लगातार पन्द्रह वर्ष शासनाध्यक्ष रहे। शायद ही कोई साल ऐसा रहा होगा जब भरी गर्मी में वे गावों के जनसंपर्क अभियान पर न निकले हों। उन्होंने भी चौपालें लगाई, ग्रामीणों से सीधे संवाद किया, उनकी समस्याएं सुनीं, मौके पर अधिकारियों व कर्मचारियों को सस्पेंड भी किया, किसी गांव में राजमिस्त्री की तरह सिर पर गमछा लपेटकर ईंटेंं भी चुनीं व अचानक किसी स्कूल में पहुंचकर बच्चों के बीच बच्चे बने व क्लास भी ली। लेकिन इस वर्जिश के बावजूद जो काम होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। उनके प्रत्येक दौरे में हजारों की संख्या में ग्रामीण व्यथा के जो आवेदन मिले , वे लापरवाह अफसरशाही के चलते रद्दी की टोकरी में जाते रहे। नतीजा पिछले चुनाव में सामने आ गया। उनके दस साल तो ठीक गए थे पर अंतिम पांच वर्षों ने कबाडा कर दिया। यदि उन्होंने , घेर कर रखने वाले उनके गिरोह ने, मंत्रियों व अफसरों ने थोड़ा भी ध्यान दिया होता उनकी पार्टी का इतना बुरा हश्र नहीं होता कि उबरना भी मुश्किल हो जाए। भाजपा को सत्ता से बेदखल हुए साढे तीन वर्ष बीत गए हैं पर उसका बुरा वक्त थमा नहीं है। भूपेश बघेल के राजनीतिक हथियारों ने उसे बेबस कर रखा है।

लेकिन दुश्मन कितना भी कमजोर क्यों न हो, वह सारी ताकत जुटाकर उठने की कोशिश जरूर करता है। इसलिए कांग्रेस सरकार व संगठन को अधिकाधिक विश्वसनीय बनने की जरूरत है। दृढता के साथ काम करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री को इस बात की जरूर चिंता करनी चाहिए कि कांग्रेस के 71 में से लगभग 40 विधायक अच्छे कामकाज की कसौटी पर खरे क्यों नहीं उतर पाए हैं। आखिरकार उनकी निष्क्रियता का प्रभाव सरकार व संगठन पर पडता है। मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से उनके खराब परफॉर्मेंस की पुष्टि भी की है। अतः करीब डेढ माह तक गांव खेडों की अपनी यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री जो कुछ देखेंगे, सुनेंगे और जो आवेदन लिखित में मिलेंगे उन सभी का निपटारा निर्धारित अवधि करना होगा। यह अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि जनता के आवेदन रद्दी की टोकरी में नहीं जाने चाहिए और एक निश्चित समयावधि में उनका निराकरण होना चाहिए। उनके भौतिक सत्यापन के लिए पुनः गांवों की ओर लौटने की बात कहकर बघेल ने संकेत दिया है कि बचे हुए 16-17 महीनों में सरकार का फोकस योजनाओं की मानिटरिंग पर रहेगा। अगर ऐसा होता है तो यह सरकार , पार्टी संगठन व जनता के हित में रहेगा।

सम्प्रति-लेखक श्री दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित पत्रकार है।श्री मुक्तिबोध कई प्रमुख समाचार पत्रो के सम्पादक रह चुके है।