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नायडूजी, इमरजेंसी के पाठ में इंदिरा की खूबियों को कैसे पढ़ेंगे? – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

26 जून,1975 को लागू आपातकाल की अनगिन कही-अनकही, सही-गलत और कपोल-कल्पित कहानियों के राजनीतिक-संस्करणों के ताजा प्रकाशन और प्रसारण में ’हिटलर’ और ’औरंगजेब’ जैसे पात्रों की एन्ट्री मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व की मनोदशा और मानसिक दीवालियापन के इंडेक्स को रेखांकित करती है। अपने चार साल के शासनकाल और उपलब्धियों पर आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के जहन में अचानक इमरजेंसी का धधक उठना चौंकाता है कि 43 साल पुरानी यह दास्तां क्यों ’हाय-हाय’ कर रही है? डर लगता है कि  राजनेताओं की इस बीमार मानसिकता के चलते हिटलर के बाद हलाकू, मुसोलिनी, इदी अमीन जैसे खूंखार राष्ट्राध्यक्ष भारत के गौरवशाली लोकतांत्रिक इतिहास के पन्नों में अलग-अलग रूपों में अवतरित नहीं होने लगें?

बकौल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, वो इमरजेंसी की निंदा राजनीतिक लाभ की खातिर नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी को सजग बनाने के लिए करते हैं।अलग अंदाज में यही बात उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू करते हैं। उनके मतानुसार ’आपातकाल, जो भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय है, पाठ्यक्रम का एक हिस्सा होना चाहिए,ताकि वर्तमान पीढ़ी को पता चल सके कि आपात काल क्या था? यह कैसे लगाया गया? क्यों लगाया गया? हमें लोगों को शिक्षित करना है, ताकि भविष्य में कोई इमरजेंसी थोप नहीं सके।’

अब सवाल यह है कि स्कूली पाठ्यक्रम में आपातकाल का अध्याय किस क्रम में और कैसे पढ़ाया जाएगा? उसका ’पर्सेप्शन’ क्या होगा? इमरजेंसी की काली शॉल में लपेट कर क्या कांग्रेस की उन सारी उपलब्धियों को गटर में बहा दिया जाएगा, जिसकी बदौलन मौजूदा केन्द्र सरकार ’पंछी बनूं, उड़ती फिरूं, मस्त गगन में’ की मदहोश करने वाली तरन्नुम में दुनिया भर के बाग-बगीचों में फर्राटे भर रही है? भाजपा 19 महीने के आपातकाल की खलनायक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मानती है। मोदी कहते हैं कि ’आपातकाल देश के स्वर्णिम इतिहास पर काला धब्बा है’ याने इन 19 महीनों के अलावा भारत की आजादी के 71 साल याने  858 महीनों के दरम्यान चारों दिशाओं में सुनहरापन बिखरा था। जब बात इंदिराजी पर केन्द्रित होगी तो यह सवाल भी उठेगा कि हरित क्रांति (1966), बैंक-राष्ट्रीयकरण (1969), भारत-पाक युद्ध (1971), बांगला देश की विजय (1971), पहला पोखरण परमाणु विस्फोट (1974) ऑपरेशन ब्लू-स्टार (1984) अथवा 1984 में ही खुद इंदिराजी की शहादत को इतिहास के कौन से पन्नों में और किस रूप में पढ़ाया जाएगा? क्या नई पीढ़ी के लिए यह जानना जरूरी नहीं है कि देश की मुख्य धारा को बदलने वाली इन घटनाओं का नायक कौन है? मोदीजी आपातकाल के साथ लोकतंत्र के स्वर्ण काल की चर्चा भी करते, तो सही अर्थों में लगता कि वो लोकतंत्र के पहरुए हैं।

अरुण जेटली का इंदिरा गांधी को ’हिटलर’ कहना कतई मुनासिब नहीं है। जेटली को पता ही होगा कि उनकी राजनीति इंदिरा गांधी की हिटलरशाही में जमींदोज लोकतंत्र के भग्नावेशों में ही परवान चढ़ी है। यदि जेटली इंदिराजी को हिटलर नहीं कहते तो प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व पर ’औरंगजेब’ की करतूतें चस्पां नहीं होतीं। यह एक व्यर्थ, हताशा भरा प्रयास है, जिसमें भाजपा अथवा मोदी-सरकार राजनीतिक-लाभांश ढूंढ रही है। जनता ने तो तीन साल बाद ही इंदिरा गांधी को सत्ता सौंप कर आपातकाल के अध्याय पर ताला जड़ दिया था। आपातकाल के बाद बीते 43 सालों में 24 सालों तक देश की सत्ता पर वह कांग्रेस काबिज रही है, जिसके आपातकाल के पाप की हंडिया सिर पर घुमाए भाजपा के नेता घूम रहे हैं। इन चौबीस सालों में भी भाजपाई प्रोपेगंडा के विपरीत लगभग पंद्रह वर्षों तक सरकार की कमान गांधी-नेहरू परिवार से इतर पीवी नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह जैसे मेधावी नेताओं के हाथों में रही है।

बहरहाल, इतिहास को लेकर गफलत पैदा करने का नया राजनीतिक चलन देश में नए-नए ’हिटलर’ और ’औरंगजेब’ पैदा कर रहा है। आपातकाल के उन्नीस महीनों को छोड़ कर इंदिराजी के कार्यकाल में हिन्दुस्तान में जम्हूरियत की शक्ल क्या थी, वह सत्ता के वर्तमान दौर में काबिज लालू यादव, नीतीश कुमार अथवा प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता के रूप में नजर आ सकती है। ये सभी नेता जम्हूरियत के उसी दौर के प्रॉडक्ट हैं, जब इंदिराजी सत्ता में काबिज थीं। इंदिरा गांधी की यह जम्हूरियत कांग्रेस की ही देन है, जिसके चलते सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री देश को ’कांग्रेस-मुक्त भारत’ बनाने का दम भर रहे हैं। ’कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसे अहंकारी नारे में भाजपा के मनोविज्ञान की निरंकुशता झलकती है कि लोकतंत्र को लेकर उसका असली स्वरूप क्या है? इमरजेंसी के बहाने भाजपा के सारथी अपने चुनावी-रथ को अमूर्त नारों की उस भूलभुलैया की ओर मोड़ना चाहते हैं, जहां जनता की मति भ्रमित हो जाए। वह विभ्रम, भय, आशंका, असमंजस के धुंध के पार झांक ही न पाए और ना ही समझ सके कि मोदी-सरकार की उपलब्धियों की असली शक्ल क्या है?

 

सम्प्रति-लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एवं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान सम्पादक है।यह आलेख सुबह सवेरे के 28 जून के अंक में प्रकाशित हुआ है।