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जेनेरिक दवायें लिखना अनिवार्य बनाने से लोगो को मिलेगी बड़ी राहत -डा.संजय शुक्ला

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह संकेत दिया है कि देष में शीघ्र ही ऐसा कानून बनाया जायेगा जिसके तहत डाक्टरों को महंगी ब्रांडेड दवाओं की जगह सस्ती जेनेरिक दवायें लिखना अनिवार्य होगा। श्री मोदी के इस घोषणा के बाद भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद(एम.सी.आई.)ने एक आदेश जारी कर डाक्टरों के लिए जेनेरिक दवायें लिखना अनिवार्य कर दिया है। परिषद ने सभी राज्य सरकारों, राज्य मेडिकल बोर्डों, अस्पतालों और मेडिकल कालेजों से कहा है कि वे अपने अधीनस्थ पंजीकृत व सेवारत डाक्टरों को उक्त आदेश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराए यदि कोई चिकित्सक इसका उल्लंघन करते पाया गया तो उसके विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। खबरों के अनुसार ऐसी कार्रवाई के अंतर्गत डाक्टर का लाइसेंस (पंजीयन) भी रद्द किया जा सकता है।

हालांकि एम.सी.आई. ने इस प्रकार की अधिसूचना बीते साल 2016 में ही जारी करते हुए मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (प्रोफेशनल कंडक्ट, एटीकेट एंड इथिक्स) रेग्युलेशन 2002 की धारा 1.5 में बदलाव करते हुए डाक्टरों को जेनेरिक दवायें लिखने का परामर्श दिया था लेकिन अब प्रधानमंत्री के रूख के बाद एम.सी.आई. ने इस पर सख्ती दिखाई है। यह पहला मौका नहीं है जब सरकार ने महंगे उपचार पर नकेल कसी हो इसके पहले हृदय के धमनियों को खोलने के लिए लगाए जाने वाले ‘स्टेंट’ की कीमतों को लगभग 5 से 8 गुना कम कर दिया था तथा जरूरी 700 दवाओं के दाम भी तय कर दिये गये थे। बहरहाल सरकार के इस निर्णय से दवा बाजार एवं डाक्टरों में भारी खलबली मची हुयी है लेकिन इन निर्णय से देश के आम लोगों को राहत की आस बंधी है।रोगों के उपचार में दवाओं का खर्च लगभग 70 फीसदी तक रहता है यदि डाक्टर ब्रांडेड की जगह मरीजों को जेनेरिक दवाईयां लिखेंगे तो निश्चय ही लोगों को दवाईयों के खर्च में काफी राहत मिल सकेगी यह तब संभव है जब स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत सभी लोग इस निर्णय के प्रति अच्छी नीयत और दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करें।

चिकित्सा क्षेत्र से इतर लोगों को ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के अंतर को समझना जरूरी होगा। दरअसल जब दवा कंपनियां वर्षों के अनुसंधान तथा भारी-भरकम खर्च के बाद कोई नई दवा (फार्मूलेशन) का ईजाद करती है तब वह इस दवा का पेटेंट कराती है और इसे ही ब्रांडेड दवा कहा जाता है। दवा निर्माता कंपनी शोध-अनुसंधान तथा पेटेंट की लागत को इन दवाओं की कीमतों में जोड़ती है फलस्वरूप ये दवाऐं महंगी होती है, लेकिन जब दवा की पेटेंट अवधि खत्म हो जाती है तब दूसरी कंपनियां इसी रासायनिक संगठन या फार्मूलेशन से समान दवाईयां बनाती है जिसे फार्मूलेशन यानि जेनेरिक नाम से बाजार में उतारा जाता है।चूंकि बाद में दवा कंपनियों को इस फार्मूलेशन के शोध-अनुसंधान तथा पेटेंट पर भारी भरकम खर्च नहीं करना पड़ता इसलिए जेनेरिक दवाईयां ब्रांडेड दवा की तुलना में 80 से 85 फीसदी सस्ती होती है।ये दवाईयां भी ब्रांडेड दवाओं जितना असरकारक होती है बशर्तें इनका निर्माण उच्चगुणवत्तायुक्त अंतर्राष्ट्रीय मानकों में किया जाय,लेकिन आमतौर पर डाक्टर अपने मरीजों को ब्रांडेड दवाईयां ही लिखता है। भारत में दवा बाजार कुल एक लाख करोड़ रूपये का है जिसमें 80 फीसदी हिस्सेदारी जेनेरिक दवाओं का है तथा देश से हर साल 45 हजार करोड़ रूपयों के जेनेरिक दवाओं का निर्यात अमेरिका सहित अन्य देशों को होता है। हालांकि बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह दावा करती है कि हमारी ब्रांडेड दवायें उच्च कोटि की है तथा तुरंत असरकारक है लेकिन यह महज व्यवसायिक सोशेबाजी ही है।

चूंकि ब्रांडेड दवाओं में भारी मुनाफा रहता है इसलिए दवा कंपनियां और उनके प्रतिनिधि डाक्टरों को ब्रांडेड दवाईयां लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। विचारणीय तथ्य यह है कि भले ही चिकित्सक समाज इसे खुले तौर पर स्वीकार न करें लेकिन असलियत यह भी है कि ब्रांडेड दवाईयां लिखने के एवज में दवा कंपनियां डाक्टरों को महंगे उपहार तथा विदशों की सैर कराकर उपकृत करती हैं। शायद यह भी एक कारण है जिसके चलते डाक्टर अपने मरीजों केा जेनेरिक दवाईयों के स्थान पर महंगे ब्रांडेड दवाईयां लिखते हैं यानि निरीह मरीज जांच और दवाईयां दोनों के नाम पर आर्थिक शोषण का शिकार होता है। हालांकि एम.सी.आई. तथा राज्य चिकित्सा परिषदों ने दवा कंपनियां तथा डाक्टरों के इस नापाक व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं तथा डाक्टरों के विरूद्ध कार्रवाईयां भी हुई है बावजूद यह गोरखधंधा अप्रत्यक्षरूप से अब भी बदस्तूर जारी है। इसी के चलते कुछ दवा कंपनियां और डाक्टरों के संगठन देश में जेनेरिक दवाओं के विक्रय की बाध्यता का विरोध कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि डब्ल्यू.एच.ओ. के मुताबिक यदि डाक्टर अपने मरीजों को जेनेरिक दवाईयां लिखते हैं तो भारत जैसे विकासशील देश में स्वास्थ्य के खर्च पर लगभग 75 फीसदी कमी लाई जा सकती है। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘लैनसेट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल खराब स्वास्थ्य और महंगी दवा के कारण 3.9 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे पहुंच जाते है, ग्रामीण भारत में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत से भी ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार महंगे इलाज और दवा के खर्च के कारण लगभग 47 फीसदी लोगों को अपनी संपत्ति बेचने या गिरवी रखने के लिए मजबूर होना पड़ता है, इसका प्रतिकूल असर राजकोषीय भार के रूप में देश के सामने है। बहरहाल भारत जैसे कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश में जहां बढ़ती महंगाई तथा नये और पुराने रोगों की बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर बाजार में जेनेरिक दवाईयों की उपलब्धता आम आदमी की सेहत और जेब दोनो को राहत पहुंचा सकता है जरूरत केवल प्रतिबद्धता और समर्पण की है।

 

सम्प्रति – लेखक डा.संजय शुक्ला शासकीय आयुर्वेदिक कालेज रायपुर में लेक्चरर है।