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गुलामनबी के बयान पर गैर जरूरी ‘राजनीतिक पकौड़ेबाजी’ – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलामनबी आजाद यह बयान मौजूदा राजनीतिक हालात पर पुनर्विचार की मांग करता है कि चुनाव अभियान में अब कांग्रेस के हिन्दू-उम्मीदवार उन्हें चुनाव अभियान में अपने प्रचार-प्रसार के लिए बुलाने में कतराने लगे हैं। लखनऊ में अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की 201वीं जयंती के तहत यूनिवर्सिटी के भूतपूर्व छात्रों के समारोह में अभिव्यक्त आजाद के यह ’ऑब्जर्वेशन’ खरा और समयसिद्ध है। भाजपा के प्रवक्ताओं ने गुलामनबी के वक्तव्य  को विवादों के कढ़ाव में डालकर राजनीति के पकौड़े तलना भले ही शुरू कर दिया है, लेकिन उनके ’ऑब्जर्वेशन’ का गहराई से परीक्षण और उपचार किया जाना जरूरी है। आजाद की बात को महज इसलिए अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि यह एक मुसलमान नेता का भाषण है। इसमें यह चेतावनी भी अन्तर्निहित है कि देश के सामाजिक मनोविज्ञान में दरारें गहराने लगी हैं, जो देश की सेहत के लिए हानिकारक हैं।

गुलामनबी जब यह दर्द व्यक्त करते हैं कि अब हिंदू उम्मीदवार उन्हें कम बुलाने लगे हैं, तो इसके यह मायने नहीं है कि कांग्रेस में गुलामनबी आजाद की हैसियत कम हुई है अथवा उनके चाहने वालों की संख्या में कमी आई है। कांग्रेस में उनका रूतबा बरकरार है। दिक्कत यह है कि देश के माहौल में सांप्रदायिक वैमनस्य और बंटवारे की राजनीतिक परिस्थितियां ने फिजा को बदल दिया है। यह देश की राजनीति के लिए भी आत्मघाती है और प्रजातंत्र के लिए भी नासूर हैं।

समाज के अंतर्प्रवाहों में सांप्रदायिक राजनीति के जीवाणु की सक्रियता नई बात नहीं है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उनके समुदाय के लोगों को लगभग सभी दलों द्वारा प्रत्याशी बनाने की परंपरा पुरानी है। लेकिन पिछले उप्र विधानसभा चुनाव के बाद यह माहौल घनीभूत हुआ है कि मुसलमानों का साथ किसी भी प्रत्याशी के लिए मुनासिब नहीं है। मुसलमानों की राजनीतिक अस्पृश्यता का यह दौर अभी भी खत्म नहीं हुआ है। भाजपा ने उप्र के चुनाव में घोषणा करके एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया था। उप्र की लगभग बीस प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी को टिकट नहीं देने के बावजूद भाजपा ने भारी बहुमत से वहां सरकार बनाई थी।

देश की राजनीति में उप्र के नतीजे टर्निंग-पॉइंट थे, जबकि भाजपा से इतर दलों को यह महसूस हुआ कि उनकी राजनीति में मुस्लिम एलीमेंट चुनाव में उनके लिए घातक साबित हो सकता है। गुलामनबी का कथन यही इशारा कर रहा है कि हिन्दू-मुसलमान के विभाजन ने महामारी बनकर देश की राजनीति को दबोच लिया है।  नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लोगों को यह लगने लगा था कि देश में प्रजातांत्रिक मूल्यों में इजाफा होगा और देश नई ऊंचाइयां हासिल करेगा, लेकिन जात-पात, सांप्रदायिक वैमनस्य की घटनाओं ने लोकतंत्र को जबरदस्त तरीके से आहत किया है। जनवरी 2018 में जारी ब्रिटेन के मीडिया संस्थान ’द इकोनॉमिस्ट’ समूह की ’इकोनॉमिक इंटेलीजैंस यूनिट’ की रिपोर्ट में भारतीय लोकतंत्र के अवमूल्यन की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। रिपोर्ट मोदी-सरकार के मुरीदों के लिए को पसंद नहीं आएगी। वो इसे भारतीय राष्ट्रवाद की नाफरमानी करने वाला दस्तावेज भी निरूपित कर सकते हैं। रिपोर्ट मे सख्त  भाषा का इस्तेमाल करते हुए लिखा गया है कि रूढ़िवादी धार्मिक विचारधाराओं के उभार और धार्मिक उन्माद के बढ़ते उभार और उन्माद के तनाव के कारण वैश्‍विक लोकतंत्र सूचकांक में दस सीढ़ी नीचे खिसक कर भारत 42 पायदान पर आ गया है। इसके पूर्व 165 राज्यों के स्क्रीनिंग में पिछले साल भारत 32वीं पायदान पर था।

इस रिपोर्ट का बुनियादी बिंदु चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद हैं, जिनकी कसौटियों पर भारत को लोकतंत्र पिछड़ रहा है। यह रिपोर्ट देश के राजनीतिक कर्णधारों को सोचने पर बाध्य करती है कि लोकतंत्र  के फोकस में राष्ट्रवाद के नाम पर नागरिक-व्यवहार कैसा होना चाहिए? यह सवाल जहन के  किनारों को ज्वार-भाटों की तरह झंझोड रहा है। हिंदुत्व के नाम पर एक अनबुझी कट्टरता ने राष्ट्वाद के प्रेरक तत्वों को अराजक बना दिया है। कट्टरता का कुहासा अंधेरा धारण करके लोकतंत्र की रोशनी को लपेट रहा है। ’द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट फिरकापरस्ती को लोकतंत्र के लिए सबसे घातक मुद्दा निरूपित करती है।

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एनं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह आलेख सुबह सवेरे के 19 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह सम्पादक भी रह चुके है।