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कश्मीरः 1990 के संकट का वह दौर- राज खन्ना

राज खन्ना

फ़िल्म ‘ कश्मीर फाइल्स ‘ देखें कि न देखें की जंग के बीच घाटी से कश्मीरी पंडितों के निष्कासन का मुद्दा गरम है। भाजपा पर फ़िल्म के नाम पर राजनीति करने के तो दूसरी ओर विरोध करने वालों पर सच से मुंह छिपाने के जबाबी प्रहार हो रहे हैं। इस त्रासदी को रोकने में तत्कालीन सरकारों और उनके प्रमुख किरदारों की नाकामी चर्चा के केंद्र में हैं। तब केंद्र में जनता दल की विश्वंनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई वाली सरकार थी। भाजपा और वाम मोर्चे सहित कुछ अन्य दलों का इस सरकार को समर्थन था। जगमोहन राज्यपाल और फारुख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। विश्वंनाथ प्रताप सिंह ने 2 दिसम्बर 1989 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। छह दिन बाद 8 दिसम्बर 1989 को उनकी सरकार के गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी डॉक्टर रुबिया सईद का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया। पांच आतंकवादियों की रिहाई के एवज में 13 दिसम्बर को रुबिया की वापसी हुई। 19 जनवरी 1990 को जगमोहन ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद की शपथ ली। उस पूरी रात राजभवन के टेलीफोन की घण्टियाँ मदद की पुकार के लिए बजती रहीं। कश्मीरी पंडितों को अगली सुबह घाटी छोड़ देने का फरमान आतंकवादी जारी कर चुके थे। उस डरावनी सुबह से अगले दो महीनों के बीच या बाद में भी पलायन के लिए मजबूर लगभग पचहत्तर हजार कश्मीरी पंडितों के परिवारों के लाखों सदस्यों पर जो कुछ गुजरी या आज भी गुजर रही है, उसकी पीड़ा अकथनीय है। आगे की सरकारें और मौजूदा भाजपा सरकार भी उन्हें घाटी वापस नहीं भेज पायी हैं।

चूंकि यह त्रासदी विश्वंनाथ प्रताप सिंह की सरकार के कार्यकाल में हुई, इसलिए उस सरकार को इसका जिम्मेदार मानते हुए उसे समर्थन देने वाली भाजपा से विपक्षी जबाब मांगते हैं। जगमोहन तब वहाँ के राज्यपाल थे। बाद में 1996 में भाजपा से जुड़ें। लगातार तीन बार दक्षिण दिल्ली से लोकसभा के लिए चुने गए। अटलजी की सरकार में मंत्री भी रहे। इसलिए भी भाजपा पर हमले तेज हैं। आतंकवादियों के आगे केंद्र-प्रांत की सरकारें क्यों लाचार साबित हुईं ? यह सब विश्वंनाथ प्रताप सिंह की सरकार और जगमोहन के राज्यपाल बनने के साथ ही क्यों घटित हुआ ? इसकी वजहें तात्कालिक थीं अथवा अलगाववादी इसकी तैयारी गुजरे कई वर्षों से कर रहे थे और क्या केंद्र-प्रांत की सरकारें उस ओर से उदासीन थीं ?

करियर की शुरुआत जगमोहन ने आइ.ए.एस अधिकारी के रूप में की। इमरजेंसी में वे दिल्ली विकास प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन थे। तब दिल्ली के सुंदरीकरण के लिए तुर्कमान गेट और झुग्गी-झोपड़ियों पर बुलडोजर चलवाने के कारण वे सुर्खियों में आये थे। उन्हें संजय गांधी की काफी निकटता हासिल थी। लेकिन इससे भी पहले 1971 में दिल्ली के मास्टर प्लान के सफल क्रियान्वयन और निर्माण से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए इंदिराजी की सरकार उन्हें पद्मश्री दे चुकी थी। इंदिराजी की ही सरकार ने 1977 में जगमोहन को पद्मभूषण से अलंकृत किया। 39 वर्षों के अंतराल पर 2016 में नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मविभूषण दिया। 17 फरवरी 1980 से 25 अप्रैल 1984 की अवधि में दिल्ली में लेफ्टिनेंट गवर्नर के दो और गोवा का एक कार्यकाल उनके हिस्से में आया। इंदिरा जी का उनके प्रति भरोसा आगे भी कायम रहा। 26अप्रैल 1984 को वे पहली बार जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बने। 11जुलाई 1989 तक वह इस पद पर रहे। यह वह अवधि थी जब केंद्र में इंदिराजी और फिर राजीव गांधी की सरकार थी। इन वर्षों में कश्मीर में हालात लगातार बिगड़ रहे थे।

शेख अब्दुल्ला की 6 सितम्बर 1982 को मृत्यु के बाद उनके पुत्र फारुख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस का उन्हें समर्थन था। लेकिम जल्द ही कांग्रेस से उनके रिश्ते बिगड़ने लगे। 1983 के विधानसभा चुनाव में दोनो के बीच खटास काफी बढ़ गई। इस मध्य वहाँ राष्ट्र विरोधी गतिविधियां बढ़ने लगी थीं। पंजाब के उग्रवाद ने ऐसे तत्वों का हौसला और बढ़ाया। 2जुलाई 1984 को राज्यपाल जगमोहन ने फारुख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त कर दी। जी.एम.शाह की अगुवाई में गठित कराई गई अगली सरकार भी 7 मार्च 1986 को बर्खास्त की गई। यह बर्खास्तगी राजीव गांधी और फारुख अब्दुल्ला के समझौते की देन थी। एक बार फिर फारुख अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जम्मू-कश्मीर के 1987 के विधानसभा चुनाव भारी पैमाने पर धांधली-बेईमानी के लिए याद किये जाते हैं। इन चुनावों ने मुख्यधारा के दलों और उनके नेताओं की रही-सही विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचाया। अलगाववादी ताकतें और मजबूत हुईं। सरकार अपना इकबाल खो चुकी थी। पुलिस-प्रशासन उग्रवादियों के आगे लाचार थे। 1989 के दूसरे भाग में घाटी सुलग रही थी। केंद्र-प्रांत की सरकारें और राज्यपाल जगमोहन उस समय क्या कर रहे थे ? अपनी किताब ‘ My Frozen Turbulence In Kashmir ‘ में जगमोहन ने काफी विस्तार से तब के वहाँ के खराब हालात और उनसे निपटने में बरती गई उदासीनता का जिक्र किया है।

जगमोहन के अनुसार नेशनल कांफ्रेंस की सरकार और कांग्रेस के नेता दोनो ही, घाटी में चल रही देश विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध लड़ने की बातें तो करते थे लेकिन जमीन पर कुछ नहीं था। इस उदासीनता का विस्तार केंद्र सरकार तक था। 10-11अक्टूबर 1988 को राष्ट्रपति की अध्यक्षता में सम्पन्न राज्यपालों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और गृहमंत्री भी मौजूद थे। जगमोहन के मुताबिक उन्होंने कश्मीर की विस्फोटक स्थिति की ओर ध्यान खींचा। सभी सहमत और चिन्तित थे। लेकिन कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया। राष्ट्रपति को जनवरी 1989 और फरवरी 1989 में भेजी गई रिपोर्टें , जो कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के संज्ञान में थीं, में एक बार फिर नियंत्रण के बाहर होती स्थिति , अलगाववादी ताकतों के विस्तार और मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला की उदासीनता की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया। 8अप्रैल 1989 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी को राज्यपाल जगमोहन ने सीधे भेजे पत्र में लिखा,” स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। लगातार पांच दिन से बड़े पैमाने पर हिंसा, फायरिंग, हड़ताल चल रही है। हम उस मुकाम पर हैं, जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं लगती। मुख्यमंत्री अलग-थलग पड़ चुके हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक दोनो ही मोर्चों पर वह विफल हैं। केवल संवैधानिक क्रियाओं का सम्पादन शेष है। प्रभावी हस्तक्षेप जरूरी है। शायद आज कुछ मुमकिन हो सके। कल तक बहुत देर हो जाएगी! ” 14 मई 1989 को उन्होंने राजीव गांधी को लिखा, ” 8 से 13 मई के बीच 14 बम विस्फोट ,6फायरिंग-क्रास फायरिंग की घटनाओं में 4 मौतें हुईं। 14 घायल हुए। गुलमर्ग-श्रीनगर के बीच एक बस पर हुई फायरिंग में चार टूरिस्ट घायल हुए। मौजूदा प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा स्थिति संभालने में अक्षम है। हड़ताल के दौरान पृथकतावादियों के प्रतिरोध के लिए राजनीतिक मोर्चे पर कोई नजर नहीं आता। दुःखद यह है कि ऐसे तत्वों की हर सफलता उनकी ताकत का विस्तार कर उनकी शत्रुता का रुख केंद्रीय अधिकारियों की ओर मोड़ रही है। मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला को मैंने अपनी चिंता से अवगत करा दिया है।” जगमोहन ने लिखा कि दुर्भाग्य से उनकी स्पष्ट और चिन्हित चेतावनियों की उपेक्षा की गई। हर समस्या के निपटारे का तय समय होता है। शरीर के संक्रमण का इलाज बीमारी के लाइलाज होने से पहले करना पड़ता है। लापरवाही करने पर खामियाजा भुगतना पड़ता है।

जगमोहन का कार्यकाल 11 जुलाई 1989 को समाप्त हो गया। गांधी परिवार का एक दूसरा प्रस्ताव उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। राजीव गांधी ने 1989 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली से उन्हें कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने की पेशकश की। जगमोहन ने विनम्रता से उसे ठुकरा दिया। लगभग छह माह के अंतराल पर 19 जनवरी 1990 को एक बार फिर वे जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे। एक दिन पहले फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे। केंद्र की सरकार बदल चुकी थी। विश्वंनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थे। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के पहले कार्यकाल में अगर उन्होंने जम्मू क्षेत्र में काफी लोकप्रियता हासिल की थी,तो घाटी में नाराजगी भी उनके खाते में थी। पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के वे सीधे निशाने पर थे। विश्वंनाथ प्रताप सिंह ने जगमोहन को यह जिम्मेदारी क्यों दी ?

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की किताब ‘ विश्वंनाथ प्रताप सिंह – मंजिल से ज्यादा सफर ‘ में तत्कालीन प्रधानमंत्री का इस सवाल पर जबाब दर्ज है। आगे के अंश उक्त किताब से साभार (पृष्ठ 334)

सवाल – जम्मू-कश्मीर की विकट स्थिति में जगमोहन को राज्यपाल बनाने की पृष्ठभूमि क्या थी?

जबाब – हमे राज्यपाल के लिए सही व्यक्ति की तलाश थी। कई नाम आये थे। उनमें एक रिटायर जनरल भी थे। मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने जगमोहन को चुना। यह बात चंद्रशेखर तक पहुँची। वे मिलने आये और कहा कि जगमोहन को मत भेजो। यह भ्रम है कि भाजपा ने जगमोहन का नाम सुझाया था। सच यह है कि भाजपा की ओर से एक रिटायर सैनिक अधिकारी का नाम आया था।

सवाल – उन्होंने कुछ कारण दिए होंगे ?

जबाब -उनका कहना था कि परिस्थिति और खराब हो जाएगी। जगमोहन को भेजना गलत होगा। मैंने गृहमंत्री को बताया कि चंद्रशेखर को एतराज है, इसलिए जगमोहन को मत भेजिए। लेकिन दोपहर में उन्होंने जगमोहन को राज्यपाल बनाने की घोषणा कर दी। मेरे सामने धर्मसंकट था। अपने गृहमंत्री के फैसले को बदलने से उनकी किरकिरी होती।

सवाल – कश्मीर में आतंकवाद कैसे फैलता गया ?

जबाब – इसका एक कारण चुनाव में वहाँ हुई गड़बड़ियां थीं। चुनाव की विश्वसनीयता नही बची थी। कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस का गठबंधन हो जाना भी आतंकवाद को बढ़ाने में मददगार हुआ। वहाँ विपक्ष के लिए कोई राजनीतिक दल नही बचा था। विपक्ष की भावनाओं को प्रकट करने के लिए कोई मंच शेष नहीं था। इसलिए जो विरोध में थे,वे अतिवादी हो गए। जब वहाँ चुनाव में धांधली होने लगी और लोग बेइज्जत होने लगे, तो नौजवान बदला लेने के लिए सीमा पार चले गए। एक नौजवान चुनाव में उम्मीदवार बना। शासक दल के इशारे पर उसे थाने में बुलाकर बेइज्जत किया गया। वह थानेदार से बदला लेने के लिए उस पार चला गया, जहाँ उसका सम्पर्क आई.एस.आई.से हुआ और आई.एस.आई.ने उसका इस्तेमाल आतंकवाद फैलाने में किया। उस घटना से एक सिलसिला शुरू हो गया। जे.के.एल.एफ. और मदरसों का इस्तेमाल करके आई.एस. आई.ने आतंकवाद को विस्तार दिया। यह वैसे ही हुआ जैसे शरीर कमजोर होने पर रोगों का हमला हो जाता है।”

इस नाजुक मोड़ पर केंद्र और राज्यपाल अलग-अलग रास्ते पर नजर आते हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी एक राय नहीं हो पाते। निलंबित विधानसभा के भंग करने के राज्यपाल के फैसले पर विश्वनाथ प्रताप सिंह का कहना था कि जगमोहन ने सारे लोकतांत्रिक रास्ते बंद कर दिए। रह गई पुलिस और सेना। उन्होंने गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद से कहा आज ही रात में राज्यपाल से इस्तीफा लीजिए। मुफ़्ती का जबाब था ,” यह करना इस समय ठीक नहीं होगा। इससे आतंकवादियों को बल मिलेगा। वे जो बगावत पर उतर आए हैं उन्हें नैतिक जीत हासिल हो जाएगी। मैंने मान लिया।” केंद्र द्वारा कश्मीर के मसले पर सात सदस्यीय सर्वदलीय समिति के गठन और जॉर्ज फर्नांडीज को कश्मीर मामलों का मंत्री नियुक्त किये जाने को जगमोहन ने विनाशकारी बताया। उन्होंने लिखा कि इस सर्वदलीय समिति के दौरे के परिणाम भयंकर थे। इससे पाकिस्तान समर्थक और कश्मीर को अलग करने की सोच वाली शक्तियाँ संगठित हो गईं। कश्मीरियों को यह प्रकट हो गया कि केन्द्र सरकार पूरी तौर पर मेरी पीठ पर नहीं है।” राजीव गांधी इस समिति के सदस्य थे और कश्मीर के दौरे में साथ थे। जगमोहन ने लिखा ,” राजीव गांधी ने जो हानि पहुँचाई उसकी कोई पराकाष्ठा नहीं थी।” 10 मार्च 1990 को सैफ़ुद्दीन चौधरी, माकपा के विप्लव दास गुप्ता, भाकपा के ए.एस. फारुखी और ए.एस. मल्होत्रा तथा भाजपा के जसवंत सिंह और केदारनाथ साहनी ने एक सयुंक्त बयान में बैठक की आम सहमति को भंग करने और गोपनीय बातों को सार्वजनिक करने के लिए राजीव गांधी की निंदा की। कहा कि इससे दौरे का लाभ ही समाप्त हो गया। इस दौरे में राजीव गांधी और जसवंत सिंह के बीच झड़प भी हुई। विश्वंनाथ प्रताप सिंह के अनुसार , ” मेरी मंशा इस समिति के जरिये राष्ट्रीय सहमति बनाने की थी। लेकिन यह बात सही है कि वहाँ राजीव गांधी से जिस सकारात्मक भूमिका की उम्मीद थी,उन्होंने नहीं निभाई। उनके व्यवहार से प्रतिनिधिमंडल के कई लोग निराश हुए। कई सदस्य जो वहाँ गए थे,राजीव गांधी के व्यवहार पर उन्होंने काफी नाराजगी जाहिर की। ” राज्यपाल जगमोहन से इस्तीफा मांगने की निर्णायक वजह कुछ दिनों बाद जनाजे की भीड़ पर फायरिंग की एक घटना बनी। लेकिन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख की सलाह पर प्रधानमंत्री एक बार फिर ठिठके। देशमुख ने उनसे कहा कि जगमोहन को राज्यपाल से हटाकर आप शहीद बना देंगे। उन्हें राज्यसभा में नामित कर दीजिए। सरकार की मेहरबानी से राज्यसभा में पहुँचने के कारण वह शहीद नहीं माने जाएंगे। जगमोहन को राजी किया गया। 10 नवम्बर 1990 को राज्यपाल पद से वह मुक्त हुए। घाटी में और सीमा पार खुशी और राहत के स्वर थे। जम्मू संभाग में गुस्सा और हड़ताल थी। देश के अन्य तमाम हिस्सों में भी इसकी प्रतिक्रिया थी। सार्वजानिक रूप से प्रधानमंत्री विश्वंनाथ प्रताप सिंह ने यही कहा कि जगमोहन ने त्यागपत्र खुद दिया। क्या जगमोहन को राज्यसभा भेजने का फैसला सही था ? विश्वंनाथ प्रताप सिंह का उत्तर था, ” मैं उसे उचित फैसला नहीं मानता। लेकिन वैसा करना उस समय जरूरी था। नहीं तो भाजपा जगमोहन को शहीद बनाकर देश भर में घुमाती।”

अनिर्णय – अविश्वास-उदासीनता। ऊपर से राजनीति के दांव-पेंच। फिर संकट तो बढ़ना ही था ! कीमत आज तक चुकाई जा रही है।

 

सम्प्रति- लेखक श्री राजखन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों,पत्रिकाओं में निरन्तर छपते रहते है।श्री खन्ना इतिहास की अहम घटनाओं पर काफी समय से लगातार लिख रहे है।