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अशोक पांडे : राजनीति में राजनीति से हट कर – राज खन्ना

                स्वं अशोक पांडे

उनके दल जुदा थे। पर दिल एक था। जो सुलतानपुर को जानते हैं उन्हें अशोक पांडे और राम सिंह के साथ का बखूबी पता है। दस दिन पहले यह साथ राम सिंह जी के निधन के साथ छूटा था। रविवार की सुबह अशोक पांडे अपने पुराने साथी का साथ उस लोक में निभाने के लिए चल दिए।

पूर्व विधायक अशोक पांडे पिछले कुछ महीने से अस्वस्थ चल रहे थे। अपने साथी राम सिंह के निधन के बाद से वह बेहद गमगीन थे। महीने भर पहले ही अपनी माँ को खोया था। ख़राब सेहत के बावजूद वह स्व.राम सिंह की अंतिम यात्रा के हर पल उनके साथ थे। अशोक जी की वहां मौजूदगी उनकी सेहत को लेकर फिक्रमंद उन्हें चाहने वालों को राहत दे रही थी। पूछने वालों को यही बता रहे थे कि अब ठीक हूँ। दोस्तों को फिक्रमंद देखना उनके मिजाज में नहीं था। कभी कमजोर नहीं रहे। इस लिए कमजोर दिखना भी नहीं चाहते थे। पर किसी को भरोसा नहीं था कि सफर थमने के इतने नजदीक है।

अशोक जी की पृष्ठभूमि कांग्रेसी थी। पिता स्व.ऋषि देव पांडे कांग्रेस के बड़े नेताओं में थे। बीच में कुछ साल अशोक जी भी कांग्रेस में रहे। लेकिन वह मूलतः समाजवादी थे। छठवें दशक के आखिरी हिस्से में इलाहाबाद विश्विद्यालय में पढ़ाई के दौरान युवजन सभा के जरिये छात्र राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी की।लोहिया जी को पढ़ा- गुना। छोटे लोहिया जनेश्वर जी का संरक्षण मिला और स्व.मोहन सिंह का साथ। सच के हक में और अन्याय के विरोध  में लड़ना छात्र जीवन में ही सीखा। कानून की पढ़ाई के दौरान लखनऊ विश्विद्यालय में स्व.रवीन्द्र सिंह के साथ इस संघर्ष को और धार मिली। अंग्रेजी हटाओ- हिंदी लाओ आंदोलन की वह अगली कतार में थे। चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्रित्व के दौरान छात्र संघों पर पाबंदी के खिलाफ हुए छात्रों के बड़े आंदोलन के वह आगे -आगे थे। लखनऊ विश्विद्यालय में आगजनी और पी ए सी विद्रोह की वारदात के बाद जो छात्र नेता महीनो जेल में रहे उनमे अशोक पांडे प्रमुख थे। संघर्ष का उनका  जज्बा उनके बाकी राजनीतिक- सार्वजनिक जीवन में भी कायम रहा। कदम- कदम पर जूझे। पुलिस-पी ए सी की लाठियां भी सहीं और जेल भी गए।

1989 में जनता दल के टिकट पर वह चांदा से विधायक रहे। लंबे समय तक सुलतानपुर जिला सहकारी बैंक के सभापति रहे। 2009 का लोकसभा चुनाव वह सपा के टिकट पर हार गए।  बहुत सी और संस्थाओं से भी उनका नाता रहा। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव उन्हें पद- ओहदा भले न दे पाये हों लेकिन समाजवादियों को पता है कि उन्होंने पांडे जी को हमेशा सार्वजनिक रूप से सम्मान दिया। निधन की खबर मिलते ही मुलायम सिंह यादव का छोटे बेटे शिवम् के पास फोन आया। उन्हें नहीं पता था कि पार्थिव शरीर लखनऊ से सुल्तानपुर ले जाया जा चुका है। वह चाहते थे कि लखनऊ में पार्टी कार्यालय में श्रद्धांजलि के लिए शव रखा जाये। उन्हाने अपने साथी के योगदान को याद किया । 1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे।अजीत सिंह और उनके मध्य हुए चुनाव में अशोक पांडे नेता जी के खुलकर साथ थे।नेता जी ने इसे कई मौकों पर दोहराया। लेकिन अशोक पांडे की शख्सियत उनकी राजनीतिक कामयाबियों से बड़ी थी। परंपरागत राजनीतिक ढाँचे और नेताओं से कुछ अलग वह दिखते थे। इसीलिये वह अपना अलग  स्थान बना गए और एक  कोना सूना छोड़ गए। उस दौर में जब राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता निजी विद्वेष की हदों को पार कर चुकी है। मजहबी-जातीय उन्माद चरम पर है। जुबान बेलगाम है। संस्कार- शिष्टाचार सब किनारे है।शिष्ट-शालीन-ईमानदार अशोक जी रह-रह कर याद आएंगे। उनका लंबा राजनीतिक- सार्वजनिक जीवन बेदाग रहा।  जाति की राजनीति से खुद को हमेशा दूर रखा। इसकी क़ीमत भी चुकाई। लेकिन उसका मलाल नहीं किया।

राज खन्ना

अपनी क्षमताओं से बढ़कर लोगों की मदद की और इसमें उनके लिए कोई पराया नहीं था। सबका आदर करने वाले और सबका आदर पाने वाले वह जिले के गिने- चुने लोगों में शामिल थे।उनसे भी उनके दिल मिलते थे जो राजनीति की धारा में अलग राह पर थे। राजनीति से दूर रहने वालों के भी वह बेहद पास थे क्योंकि रिश्तों में  राजनीति को उन्होंने कभी आड़े आने नहीं दिया। राजनीति ने उन्हें सक्रिय वकालत से दूर किया लेकिन बार के नए- पुराने साथियों के बीच वह हमेशा बेहद लोकप्रिय रहे। नेताओं से दूरी रखने वाली सामाजिक संस्थाओं को अपने कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी जरूरी लगती थी। उनके दोस्तों, उन्हें पसंद करने वालों और उनका साथ चाहने वालों की बड़ी जमात सदमे में है। दस दिन के भीतर जिले के राजनीतिक-सामजिक जीवन की यह दूसरी बड़ी क्षति है। मेरी यह दूसरी कठिन- त्रासद परीक्षा। एक साथी की यादो के बीच दूसरे के भी यादों में सिमटने का दुःख।

छात्र आंदोलन के दौरान जब वह लख़नऊ जेल में थे तब मेरी लिखी चिट्ठियां उन्होंने बहुत वर्षों तक संजो कर रखी थीं। चार दशक से कुछ अधिक अंतराल पर एक बार फिर उन्हें चिट्ठी लिख रहा हूँ। तब जब कहीं दूर जा चुके हैं। शब्दों की तलाश है।कभी निराश नहीं किया। अब दूर से पास हैं। शायद वहीँ से पढ़ें..।

 

सम्प्रति – लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।उन्होने इस आलेख में स्वं अशोक पांडे से जुड़ी स्मृतियों का जिक्र करते हुए उन्हे अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है।