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नेपाल में उभरते संकेतों के मायने – रघु ठाकुर

नेपाल में हाल ही में दो घटनाएं घटित हुई हैं जो आश्चर्यजनक और विचारणीय भी हैं। कुछ दिनों पहले एक जुलूस काठमांडू की सड़कों पर निकला जो माँग कर रहा था कि, नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाया जाना चाहिए और उसके कुछ अंतराल से एक और जुलूस निकला जो नेपाल में राजशाही की वापसी की माँग कर रहा था।

नेपाल में पिछले लगभग दो दशकों से लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार है, और नेपाल के स्व. महाराजा वीरेन्द्र के बाद राजशाही को समाप्त कर लोकतंत्र की बहाली के आंदोलन भारत की आजादी के आंदोलन के साथ जुड़ा हुआ है। 1940 के आसपास नेपाल के अधिकांश नेता जिन्होंने नेपाली कांग्रेस बनायी थी उनमें से स्व. कोइराला इत्यादि अन्य नेतागण जिनकी शिक्षा दीक्षा बनारस में हुई थी, कांग्रेस में शामिल थे। नेपाल में राजाशाही के विरूद्ध आँदोलन को गति देने में भी भारत का बहुत योगदान है और विशेषतः स्व. डा.राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण लोहिया के परम सहयोगी श्री बालकृष्ण गुप्ता आदि ने नेपाल में लोकतंत्र बहाली के आँदोलन को बहुत गति दी थी। भारत के समाजवादी आँदोलन और नेपाल के राजशाही के खिलाफ चलने वाले आँदोलन जिसकी अगुवाई 19वीं सदी के अंत तक लगभग नेपाली कांग्रेस ने की थी के बीच आंतरिक आत्मीय और परस्पर सहयेाग के संबंध रहे                   थे। स्व. चन्द्रशेखर जी के भी नेपाली कांग्रेस नेताओं के साथ अत्यधिक सहयेागी संबंध रहे और विशेषतः 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार भारत में बनी थी और स्व. चन्द्रशेखर पार्टी के अध्यक्ष बने थे तब भी उन्होंने नेपाली कांग्रेस के माध्यम से राजशाही के विरूद्ध आँदोलन को निरंतर सहयोग दिया था। श्री शरद यादव जब 1977 में सांसद चुनकर पहुंचे थे तब भी नेपाल के अनेक क्रांतिकारी साथी यद्यपि उनमें अधिकांश मार्क्सवादी थे दिल्ली में हम लोगों के सम्पर्क में आए थे और श्री दुर्गा शिवेदी सहित कई लोग उनके घर पर भी रूके थे। स्व. डी.पी. त्रिपाठी जो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे थे तथा एशियाई देशों में विशेषतः नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान इत्यादि देशों के राजनैतिक नेतृत्व के साथ उनके प्रगाढ़ रिश्ते थे,वे भी नेपाल में लोकतंत्र बहाली के वैचारिक सहयोगी थे। चूंकि 1950-60 के दशक में पाकिस्तान, बांगलादेश, बर्मा, अफगानिस्तान, नेपाल आदि के अधिकांश नेताओं के बेटे, बेटियों या बाद की पीढ़ी के नेता पढ़ने के लिए दिल्ली मुख्यतः आते थे, अतः स्व.डी.पी. त्रिपाठी से उनके संबंध थे। स्व. डी.पी. त्रिपाठी विद्यार्थी जीवन काल में मार्क्सवादी थे और जे.एन.यू. के अध्यक्ष रहते हुए उनकी अपनी एक पहचान बनी थी। यद्यपि बाद में वे कांग्रेस में स्व. राजीव गाँधी के कहने पर शामिल हुए और फिर निराश होकर वापस आए तथा आखिरी दिनों में एन.सी.पी. में रहे।

नेपाल में राजशाही हटने के बाद प्रथम दौर में नेपाली कांग्रेस के श्री कोइराला के नेतृत्व में सरकार बनी परन्तु कुछ समय के पश्चात् मार्क्सवादी सरकार में आए और सी.पी.एम. की ओर से श्री प्रचंड पहले प्रधानमंत्री बने। परन्तु ऐसा लगता है कि, नेपाली कांग्रेस अपने परिवार के बोझ में दब गई और जन विश्वास खो बैठी। साम्यवादियों को चीन से निरंतर समर्थन मिलता रहा है, तथा आर्थिक और शस्त्र सहयोग भी मिलता रहा, जिसके परिणामस्वरूप वह (माक्र्सवादी पार्टी) सत्ता में आ सकी। परन्तु मार्क्सवादी पार्टी का नेतृत्व भी भ्रष्टाचार के आरोपो में घिरा रहा और इस प्रकार के आरोप बाहर से तो लगे ही साथ ही पार्टी के भीतर से भी लगे। जिसके परिणामस्वरूप प्रचंड को हटना पड़ा। भटराई और अधिकारी नेतृत्व में आए परन्तु आपसी टकराव रूक नहीं सका और यद्यपि अभी कुछ दिनों पहले तक वहाँ मार्क्सवादी पार्टी के ओली के नेतृत्व में सरकार थी, परन्तु वह भी, आपसी मतभेद के कारण असमय पतन का शिकार हो चुकी है, तथा, प्रधानमंत्री श्री ओली ने संसद को भंग कर पुनः चुनाव कराने की सिफारिश की जिसे मंजूर कर राष्ट्रपति ने मार्च-अप्रैल में संसद के चुनाव कराने का निर्णय किया है। यद्यपि, मार्क्सवादी पार्टी के अंदर से ही इस पर मतभेद हुए है। तथा प्रचंड गुट ने अलग साख बना ली है।

2014 में भारत में भाजपा सरकार बनने के बाद दिल्ली में नेपाल को पुनः हिन्दू राष्ट्र के रास्ते पर वापस ले जाने की कुटिल चालें शुरू की गई है। चूंकि राजा वीरेन्द्र के जमाने तक नेपाल हिन्दू राष्ट्र था। उनकी मौत के बाद साम्यवादी सरकार ने नेपाल का हिन्दू राष्ट्र का तमगा समाप्त कर दिया था और उसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा दिया था। आरंभिक दौर में तो भारत सरकार ने अपनी कूटनीतिक चालों के माध्यम और आर्थिक दबाव के आधार पर नेपाल की सरकार पर दबाव बनाया कि नेपाल में हिन्दू राष्ट्र बहाल हो परन्तु नेपाल की जनता में इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई और नेपाल ने इसे अपने देश के आंतरिक मामलों में भारत का हस्तक्षेप मानकर न केवल तीव्र विरोध किया बल्कि नेपाल में भारत विरोधी जन भावना भी बनी। वैसे भी नेपाल में वहाँ की मार्क्सवादी पार्टी भारत के विरोध की भावना को हवा देती रही है और कोई भी ऐसा अवसर अगर किसी सही या गलत निर्मित से उसे प्राप्त हुआ तो उसे भुनाने से पीछे नहीं रही। हो सकता है कि चीनी आर्थिक और सामाजिक सहयोग इसका कारण रहा हो।

परन्तु पिछले कुछ दिनों से स्थितियां बहुत बदली है। अब नेपाली जनता और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का बड़ा हिस्सा जो पहले ही कई गुटों में सत्ता के खेल में बँट चुका है, चीनी हस्तक्षेप से बचना चाह रहा है। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया है और नेपाल को भारत का आर्थिक सहयोगी तथा देश के विकास में सहयोग का हाथ भी बढ़ाया है। जाहिर है कि भारत का प्रभाव नेपाल की सत्ता पर बढ़ा है, और उसके कई परिणाम दिखेंगे।

परन्तु यह भी बहुत स्पष्ट है कि नेपाल की जनता में भी वहाँ की शासक पार्टी और साम्यवादी पार्टी के खिलाफ तेजी से जनमत बदला है, 2008 में नेपाल में गणतांत्रिक राज्य की स्थापना हुई थी और बार-बार देश में लोकतांत्रिक सरकारों की असफलताओं से निरंतर हो रहे मोह भंग ने हिन्दू राष्ट्र और राजशाही के लगभग मृत विचार में हल्की सी जान फूँकी है और इस थोड़ी सी प्राणवायु से नेपाल में यह परिवर्तन आया है कि राजधानी की सड़कों पर सैकड़ा की संख्या में लोग लगभग प्रतिदिन राजशाही और हिन्दू राष्ट्र के पक्ष में रैली निकालने में सफल हुए है। नेपाल की जनता की ओर से कोई विरोध नहीं हुआ। इसे कोई मामूली घटना नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह नेपाली मानस के बदलाव की शुरूआत हो सकती है।

पिछले दिनों में ‘‘द इकानामिस्ट’’ जो लंदन से निकलने वाला एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र/ पत्रिका है और जो यूरोपीय मानस का प्रवक्ता जैसा माना जाता है के एक संपादकीय लेख का जिक्र अपने लेख में कर पहली बार भारत और दुनिया को सावधान करने का प्रयास किया था। ‘‘द इकानामिस्ट’’ ने यह निष्कर्ष निकाला था कि, लोकतांत्रिक चुनी सरकारों के बजाय तानाशाही की सरकारें वे चाहे किसी भी प्रकार की तानाशाही वाली हो यानी चाहे वह सैन्य तानाशाही वाली, धार्मिक तानाशाही वाली, या व्यक्ति तानाशाही वाली हो ज्यादा बेहतर काम कर रही है। उनके निष्कर्ष निकालने का एक आधार यह रहा है कि लोकतांत्रिक सरकारों के ऊपर जन संतुष्टिकरण का और जनमत को प्रभावित करने के लिए उन्हें लोकप्रिय नारों और वायदों की बाध्यता होती है, जिससे विकास अवरूद्ध होता है। ‘‘द इकानामिस्ट’’ चीन और रूस को भी लोकतांत्रिक सरकारों से बेहतर माना है। क्योंकि वे सत्ता और ताकत के बल पर मजदूर आंदोलन से लेकर जन आंदोलन आसानी से कुचल सकते हैं और अपने निर्णयों को क्रियान्वित करा सकते है।

दरअसल वैश्विक पूँजीवाद अब लोकतांत्रिक सरकारों और लोकतांत्रिक प्रणाली से मुक्त होना चाहता है, क्योंकि लोकतंत्र उसकी लूट में बाधा है। लोकतंत्र का एक अपरिहार्य सपना आजादी, मत और उसके साथ-साथ समता की आकांक्षा होती है। और समता या आकांक्षा का वह विस्फोटक सपना है जो कभी न कभी वैश्विक पूँजीवाद और कार्पोरेट सत्ता को नष्ट कर सकता है। इसलिए ‘‘द इकोनामिस्ट’’ के माध्यम से पूँजीवाद ने यह नया दर्शन शुरू किया है। नेपाल में उठ रहे राजतंत्र और हिन्दू राष्ट्र के स्वर भी राजतंत्री तानाशाही को वापस लाने की शुरूआत है। मार्क्सवाद ने वैसे भी सिद्धांत के रूप में सर्वहारा की तानाशाही का फोरी पड़ाव स्वीकार किया है और उसी का परिणाम है कि आज रूस और चीन में या साम्यवादी देशों में एक दलीय और व्यक्ति तानाशाही के रूप में सरकारें स्थापित हो रही है जो अब साम्यवाद के नाम पर कार्पारेट और पूँजीवादी तानाशाही बन चुके है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने तो, संसद से यह प्रस्ताव पारित कराया है कि 2036 तक वे पद पर बने रह सकते है, तथा उसके बाद उन पर या उनके परिजनों पर कोई मुकदमा भी नही चल सकेगा, चीनी राष्ट्रपति को भी बदला जाना आसान नहीं है। याने देर सवेर दुनिया में मार्क्सवादी मित्रों को इस प्रकार की कार्पारेट तानाशाही से कोई परेशानी नहीं होती बशर्ते वे उनकी पार्टी और विचारधारा के नाम पर हो। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप राजशाही और मजहबी तानाशाही के विचार भी पुनः मजबूत हो सकते है क्योंकि अंततः तानाशाही तो तानाशाही है जो लोकशाही को खत्म कर किसी न किसी आवरण में पूँजीशाही को सुरक्षित और स्थापित करेगी। नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत के द्वारा दिया गया वक्तव्य कि हमारे देश में कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र है को इसी अभियान का एक चरण मानना चाहिये जो प्रारंभिक तौर पर भारत में तंत्र की ओर से बहस के लिये व विचार निर्माण के लिये फेंका गया है।

भारत को भी और विशेषतः भारत के समाजवादियों, साम्यवादियों और धर्म निरपेक्षता वादियों को पड़ोसी देश नेपाल के परिवर्तनों के उभरते संकेतों को समझकर अभी से सावधान होना चाहिए। पड़ोसी के घर में आग की चिनगारी अगर बुझाई नहीं गई तो पड़ोसी का घर तो जलेगा परन्तु अपना घर भी सुरक्षित नहीं रह सकेगा।

 

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर देश के जाने माने समाजवादी चिन्तक है।प्रख्यात समाजवादी नेता स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक भी है।  

 

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