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कोरोना काल में आत्महत्याओं की ओर बढ़ता भारत – रघु ठाकुर

रघु ठाकुर

कोरोना महामारी के संक्रमण की चेन को काटने के लिए लगभग सारी दुनिया में लाकडाउन को कारगर तरीका माना गया।यद्यपि लाकडाउन से कोई विशेष लाभ हुआ हो आंकड़े ऐसा कोई संकेत नहीं करते परन्तु लाकडाउन से अन्य कई प्रकार की समस्याएँ भी हमारे देश में पैदा हुई है।

कोरोना प्रभाव के उपरान्त प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बेरोजगारी का भयावह चित्र सामने आया है, बहुत सारे सरकारी और गैर सरकारी उद्यमों से लाखों लोगों को छंटनी कर बाहर निकाल दिया गया। क्योंकि सारे काम काज बंद थे और घरों पर बैठाकर वेतन देना शायद उद्योगपतियों को मंजूर नहीं था। बहुत सारे निजी उद्योगों में और उनके कार्यालयों में कर्मचारी की छंटनी के साथ-साथ जो कर्मचारी काम पर बचे है उनके वेतन भी आधे कर दिए गए है और एक प्रकार से हजारों कर्मचारी ऐसी अप्रत्यक्ष बदलाव व छंटनी के शिकार हुए है। मेरे एक मित्र के भाई जो मुंबई में नौकरी करते थे और उन्हें 30 हज़ार रूपये प्रतिमाह मिलता था लाकडाउन के बाद जब अपने काम पर वापिस पहुंचे तो प्रबंधक ने बता दिया कि उन्हें आधा वेतन यानी 15000 रूपये ही दिया जाएगा। अब उनके सामने संकट है कि, 15000 रूपये में मुंबई में अपने परिवार का गुजारा कैसे करे और उन्होंने मुंबई नहीं जाने का निर्णय कर लिया। ऐसी कितनी घटनाएं महानगरों से लेकर नगरों तक घटी है। जिनका कोई सही लेखा जोखा न सरकार के, न मीडिया, न किसी अन्य के पास है।

हस्त कौशल के काम वाले याने बेल्डिंग पेटिंग मशीन सुधारने वाले घरेलू काम वाले अखबारों के हाकर सुरक्षा पहरी गेटमेन लिफ्टमेन जैसे कई करोड़ छोटे-मोटे काम धन्धे वाले लोग है, जिनके काम इस लाकडाउन काल में लगभग बंद हो चुके है।अखबारों को खरीदना लोगों ने कम कर दिया है और उसकी पूर्ति सोशल मीडिया अपने झूठ या सच से कर रही है। इन 3-4 माह में तकनीक और मशीन पर निर्माता और उपभोक्ता दोनों का रूझान तेजी से बड़ा है। सरकार और प्रचार तंत्र ने तो आम आदमी को भयभीत कर छोटे स्तर पर मशीनीकरण के द्वारा छंटनी के लिए प्रेरित किया है। घरों में काम करने वाली बाईयों की संख्या समूचे देश में लगभग एक करेाड़ के आस-पास थी और अब वह कुछ हज़ार तक सिमट गई है। क्योंकि सभ्य और संपन्न लोगों के लिए ये बाईयां अब कोरोना कैरियर बन गई है। तथा रोटी बनाने से लेकर बर्तन माँजने तक घर की सफाई से लेकर कपड़े धोने तक सब कामों के लिए मशीनों ने बाईयों को विस्थापित कर दिया है व उनका विकल्प बन गई है।

देश भर में लगभग 70-80 लाख से लेकर एक करोड़ सुरक्षा पहरी थे परन्तु अब उच्च मध्यवर्गीय लोग और खाते पीते मध्यवर्ग के लोग सुरक्षा के लिए स्वचालित मशीनों, दरवाजों के खोलने लगाने के लिए रिमोट चेतावनी के लिए अलार्म, गाड़ियों के नम्बर जाँचने के लिए सेंसर मशीने, घरों को सैनेटाइज़ करने के लिए आटोमेटिक मशीने इस्तेमाल करने की दिषा में आगे बढ़ रहे है। परन्तु इन सब का प्रभाव बेरोजगारी और बड़े पैमाने पर होने वाली आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहा है। पिछले तीन दशक से किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं शुरू हुई थी और सरकार के आँकड़ों के अनुसार पिछले 12-13 वर्षों में लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्यायें की थी यानी औसतन 25 हज़ार किसान प्रतिवर्ष। किसानों की आत्महत्या का बड़ा कारण कर्ज न चुका पाना था और कहीं -कहीं पारिवारिक और अन्य दबाव भी कारण बने थे। परन्तु इस लाकडाउन के दौर में देश में कितनी आत्महत्याओं की घटनाएं हुई है इसका तो कोई सरकारी आँकड़ा सामने नहीं आया है। परन्तु एक राष्ट्रीय अखबार जिसकी प्रसार संख्या उनके अनुसार करोड़ों में है ने 04 जुलाई के अपने सागर संस्करण में एक समाचार छापा कि जनवरी और फरवरी में यानी दो माह में सागर में कुल 85 लोगों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्याएं की थी और मई में अकेले 106 लोगों ने और जून में 88 लोगों ने आत्महत्यायें की। अब अगर इस आधार पर देश की गणना करें कि अगर दो लाख की आबादी के शहर में जनवरी से जून के बीच लगभग 400 लोगो ने आत्महत्यायें की है और मार्च से जून के चार माह में लगभग 300 लोगों ने। अगर देश की 130 करेाड़ की आबादी का आंकलन इस आधार पर किया जाए तो इन मार्च से जून के 4 माह में देश की 130 करोड़ आबादी में लगभग 20 लाख लोगों ने आत्महत्यायें की होगी। अगर नगर को आधार माना जाए तो सागर नगर जिसका उल्लेख मैंने किया है उसकी आबादी लगभग डेढ़ से दो लाख होगी और डेढ़ से दो लाख आबादी वाले नगर देश में लगभग 10 हज़ार के आस-पास होंगे-यानी अगर नगर को आधार माना जाए तो देश में इस कोरोना के महीनों में लगभग 30 लाख लोगों ने आत्महत्यायें की होगी। अब कल्पना करे कि किसान की आत्महत्यायें देश में औसतन 25 हज़ार प्रतिवर्ष हुई है जबकि अगर यह कोरोना महामारी साल पूरा कर लेती है तो केवल एक वर्ष में 20-30 लाख लोग आत्महत्यायें करेंगे।

इन आत्महत्यायों के मुख्य कारण बेरोजगारी गरीबी और अवसाद (डिप्रेशन) है। महीनों से घरों में बंद इंसान इतना एकांकी हो चुका है कि वह एक प्रकार से साहस विहीन हो गया है और अपने भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला करने के बजाय वह आत्महत्या का रास्ता चुन रहा है। आए दिन समाचार पत्रों में बेरोजगारी के कारण या अवसाद से आत्महत्याओं के समाचार छपते है, परन्तु इन पर देश की और सरकार की नज़र भी नहीं पड़ती। पिछले दिनों दो-तीन घटनाओं ने मुझे भारी मानसिक पीड़ा दी। एक बिलासपुर के सुप्रसिद्ध कैंसर चिकित्सा डा.राहालकर की पत्नी श्रीमती अलका राहालकर जो स्वतः भी डा. थी ने इंजेक्शन लगाकर आत्महत्या कर ली।बताया जाता है कि वे पति राहालकर जो कुछ समय से हृदय रोग से पीड़ित थे और कुछ समय पूर्व ही बाहर से इलाज कराकर लौटे थे के जीवन के प्रति चिंतित थी। उनका एक ही बेटा है जो विदेश में नौकरी में है। डा.अलका राहालकर इस भय से भयभीत थी कि अगर इस परस्थिति में पति की मृत्यु हो गई तो वे अकेले कैसे भावी जीवन गुजारेंगी तथा इसी अवसाद में उन्होंने आत्महत्या कर ली दिल्ली के एक पत्रकार जो एक प्रसिद्ध दैनिक में कार्यरत थे तरूण सिसोदिया जिन्हे कोरोना पाजिटिव पाया गया था तथा जो इलाज के लिए एम्स में भर्ती थे तथा कुछ समय पूर्व ही उन्हें उनके अखबार की नौकरी से हटा दिया था तो उन्होने दिल्ली में एम्स की चौथी मंज़िल से कूदकर आत्महत्या कर ली। चूंकि वे कुछ दिनों से बेरोजगार थे और अपने भविष्य के प्रति आकांत थे अतः भयभीत होकर उन्होंने ऐसा कदम उठाया।

हालांकि 1-2 माह पूर्व जब वे नौकरी में थे तब उन्हेांने स्वतः अपने अखबार में अवसाद से होने वाली आत्महत्या के बारे साहसिक संदेश में लिखा था जिसमें कहा गया था कि आत्महत्या नही कर वरन मुकाबला करना चाहिए, परन्तु बेरोजगारी के भय उससे पैदा हुये अवसाद को वह स्वतः बर्दास्त नहीं कर सके और उन्होंने जीवन से पलायन कर दिया। यद्यपि भारत सरकार ने औपचारिक रूप से 20 लाख करोड़ का पैकेज देने का झुन झुना देश को पकड़ाया है। परन्तु इस पैकेज में बेरोजगारों के लिए कोई घोषणा नहीं है। और उनके सामने शायद फाँसी का फन्दा और आत्महत्या ही उसका हल है। मैं आत्महत्याओं के घोर विरूद्ध हूं और इसे कमजोरी और पलायन मानता हूं। परन्तु जैसे वातावरण का निर्माण कोरोना काल में हुआ है उसमें व्यक्ति नितांत अकेला हो गया है। हालात यह है कि सामान्य बीमारियों के लिये सरकारी अस्पतालों में इलाज बंदी है और निजी अस्पतालों में लूट है।

दिल्ली में कितने ऐसे प्रकरण हुये है। जिनमें कोरोना से मरने वालों के इलाज पर 15-15 लाख रूपया अस्पतालों ने वसूल लिया है। यहाँ तक कि पहले 25-30 हज़ार रूपया सामान्य ए.सी. बड़े कमरों का किराया था और अभी भी भारत सरकार के गृह मंत्री की सदारत में बनी हुई कमेटी जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री भी मेम्बर हैं ने निजी अस्पतालों में मरीज के इलाज के तीन रेट तय किये है, सामान्य बेड किराया 8000, रू. प्रति दिन, वातानुकूलित कक्ष का 15 हज़ार और आई.सी.यू. का 25 हज़ार रू. प्रतिदिन। जो सरकारी मरीज है यानि सत्ताधीशों या अफसरशाही के नजदीकी जन-रिश्तेदार या फिर रसूख वाले लोग उन्हें तो सरकार की ओर से मुफ्त इलाज मिल जाता है तथा उनका बिल सरकारी खजाना चुकाता है। मुझे तो लगता है इस कोरोना काल में निजी अस्पतालों के सरकारी मरीजों के ऊपर खर्च-सैनेटाईजर और मास्क की बिक्री के नाम पर हुई लूट की अगर जाँच हो तो शायद इस दशक का सबसे बड़ा घोटाला होगा।

अवसाद की घटनायें और भी तेजी से बढ़ रही है क्योंकि घर में बंद लोग वर्क फ्राम होम में घरों से काम करने वाले लोग समाज से लगभग कट गये हैं। अब उनका कोई सामाजिक संवाद नहीं बचा है। और वह अकेले में घुटते डिपरेशन में चले जाते है। और आत्महत्या कर लेते है। यह जो नया डिजिटिलाईजेशन तकनीकी और मशीनी दौर कोरोना महामारी के नाम पर शुरू हुआ है यह बेरोजगारी का समुद्र और आत्महत्याओं की बाढ़ लेकर आने वाला है। क्या भारत के सत्ताधीश नीति नियंत्रक और जनता के भाग्य विधाता अपने दायित्वों को महसूस करेंगे ? आखिर में मैं उन सभी लोगों से अपील करूंगा जो कोरोना की बीमारी से तो बच गये परंतु लाकडाउन के आनुशांगिक परिणामों के शिकार हो रहे कि हिम्मत रखो-संघर्ष करो, मरो मत जीना सीखो और लड़ते-लड़ते जीना सीखो। कोरोना महामारी के इन परिणामों के निदान का एक ही मंत्र है जो डाक्टर लोहिया का दिया हुआ नारा था ’’और जो कई दशकों तक समाजवादियों का नारा था ‘‘जीना है’’ तो मरना सीखो कदम-कदम पर लड़ना सीखो’’।

 

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर देश के जाने माने समाजवादी चिन्तक है।प्रख्यात समाजवादी नेता स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक भी है।  

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