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चन्द्रशेखर की सरकार क्यों बनी ; क्यों गिरी ?- राज खन्ना

   (पुण्यतिथि 08 जुलाई पर विशेष)

चन्द्रशेखर की पहचान उनके बेबाक- बेलौस लहजे से जुड़ी हुई थी। एक निर्भीक-निडर नेता जिसकी अपनी शैली थी और अपना अंदाज। पहले प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और फिर कांग्रेस में रहते हुए राजनीतिक लाभ-हानि का जोड़-घटाव उन्हें इस अंदाज़ से अलग नही कर पाया। जो सही समझा वह बोले। इंदिराजी की लोकप्रियता और वर्चस्व के दिनों में भी उनकी नाराजगी से बेपरवाह रहे। एवज में उन्नीस महीने की जेल भुगती। जनता पार्टी की अगुवाई की। अपनी सरकार थी। पर इंदिराजी से कोई खुन्नस नही रखी। जनता पार्टी की टूट-पराभव के बाद उनका अगला ठिकाना जनता दल था। उस जनता दल की टूट के बाद उसके एक छोटे धड़े की अगुवाई करके वह देश के प्रधानमंत्री बन गए। कांग्रेस के समर्थन से। सिर्फ चार महीने के लिए। अगले तीन महीने कामचलाऊ प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें काम करने का मौका मिला। उनकी छवि ऐसे नेता की थी , जो किसी के आगे झुकता नही । विचारों-वसूलों की कीमत पर किसी से समझौता नही करता। विवादों की फिक्र नही और विवादास्पद लोगों से अपने रिश्तों की सार्वजनिक स्वीकृति में संकोच नही। विपरीत धारा में बहने से परहेज नही और ऐसे में जनभावनाओं की भी चिंता नही। आखिरी दौर में उनका दल निस्तेज था। खुद भी लगभग अकेले। लेकिन इसने उन्हें तनिक भी नही बदला। कोई हताशा-निराशा नही। अकेले ही सड़क से संसद तक चन्द्रशेखर जहां भी खड़े हुए, वहाँ वह अलग दिखे। गौर से सुने गये और अपने को प्रासंगिक बनाये रहे। राजीव गांधी का सीधे प्रधानमंत्री बनना अलग प्रसंग से जुड़ा है। पर जमीन से जुड़े वह देश के इकलौते नेता थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक सफ़र के चौथे दशक में सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। पर चार महीने की इस कुर्सी ने उनकी राजनतिक छवि पर अनेक सवाल खड़े किए। विरोधियों को प्रहार के अवसर दिए। इस सरकार के पास सिर्फ 64 सांसद थे। उस कांग्रेस का समर्थन था, जिसने सिर्फ दशक भर पहले चौधरी चरण सिंह को समर्थन देने के बाद संसद का सामना करने का भी मौका नही दिया था। फिर चन्द्रशेखर ने क्यों बनायी सरकार ? अपनी आत्मकथा में उन्होंने इसके कारण बताए…….

” मैंने सरकार बनाने की जिम्मेदारी इसलिए स्वीकार की, क्योंकि उस समय देश की हालत बहुत खराब थी। दो तरह के दंगे-फसाद चल रहे थे – साम्प्रदायिक और सामाजिक। मैंने 11 नवम्बर 1990 को शपथ ली। उस समय 70-75 जगहों पर कर्फ्यू लगा हुआ था। युवक आत्मदाह कर रहे थे। वे मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ़ भड़क गए थे। दूसरी तरफ साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। मुझे सरकार चलाने का अनुभव नही था लेकिन मेरा विश्वास था कि अगर देश के लोगों से सही बात की जाए तो जनता देश के भविष्य के लिए सब कुछ करने को तैयार रहेगी। कठिनाइयों के बावजूद मुझे विश्वास था कि कोई न कोई रास्ता निकल सकता है। भले ही अस्थायी ही हो। मुझे इसमें संदेह नही था कि मेरी सरकार अधिक दिनों चल सकेगी। मेरे जीवन की विडम्बना रही है। मैंने काफी आत्मविवेचन किया लेकिन आज तक उत्तर नही मिला। मैंने इस बात की कभी परवाह नही की, कि कौन किस पद पर है ? कभी व्यक्तिगत कारणों से किसी पर आक्षेप भी नही किया। लेकिन लोगों को मुझसे घबराहट होती रहती है। न जाने क्यों? प्रधानमंत्री का पद मैंने कर्तव्य भावना से स्वीकार किया। उस समय वीपी की सरकार देश को जिस रास्ते पर ले जा रही थी, वह खतरनाक रास्ता था। देश विनाश की ओर जा रहा था। मैं उसको बदल सकता हूँ, इसका मुझे विश्वास था। तात्कालिक समस्याओं का हल असम्भव नही लगा। मैं चार महीने पूरी तौर पर और तीन महीने कामचलाऊ प्रधानमंत्री रहा। इन सात महीनों में मैंने महसूस किया कि प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी का काम इतना बड़ा नही है कि इस पद पर आसीन व्यक्ति के पास दूसरे कामों के लिए बिलकुल समय न रहे।”

सरकार को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा? चन्द्रशेखर जी ने लिखा ,” मेरी सरकार गिराने के लिए ख़ुफ़िया पुलिस का बहाना बनाया गया। वह अकेला कारण नही था। आखिरी और निर्णायक कारण कई हो सकते हैं। ब्रिटेन के एक अखबार ने लिखा कि ये जो सरकार है, उसके बारे में शुरु से धारणा थी कि यह कांग्रेस की बैसाखी पर है, इसलिए कुछ फैसले नही लेगी, लेकिन सरकार जिस तरह से फैसले ले रही है, ऐसा लगता है कि जवाहरलाल नेहरु के बाद यह सबसे प्रभावी सरकार है। सरकार बनने के तुरन्त बाद मैं कलकत्ता गया। एक उद्योगपति के पिता की मूर्ति का अनावरण था। वहां इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि मैं उस पूंजीपति के यहां खाना खाने क्यों गया ?, मैंने कहा कि उनके पिता को जानता था, वे अशोक मेहता के दोस्त थे। उनके घर पहले भी गया हूँ और अब भी जाऊंगा। जब मैं जा रहा था तो उन सज्जन ने कहा चन्द्रशेखर जी आपकी सरकार में रिश्वत चल रही है। उस समय मैं और देवीलाल दोनो ही केवल सरकार के थे। मैंने उनसे कहा कि निजी बातचीत अलग है लेकिन जब प्रधानमंत्री को जानकारी दे रहे हैं तो पूरी जानकारी दें। पता लगाया गया। एक सज्जन ने रिश्वत ली है। उनका कहना था कि हमारी सरकार का काम वही चला रहे हैं। मैंने वहीं सभा में कहा कुछ लोग सरकार के नाम पर रिश्वत ले और दे रहे हैं। वे अपनी जिम्मेदारी पर काम करें। इसका परिणाम उन्हें भुगतना होगा। इसके बाद वह विशिष्ट व्यक्ति आये। वे चाहते थे, इस अध्याय को भुला दिया जाए। राज्यपालों की नियुक्ति के सवाल पर मतभेद उभरे। मैं हितेंद्र देसाई को राज्यपाल बनाना चाहता था। कांग्रेस ने कहा कि इससे उनका गुजरात का गणित गड़बड़ा जाएगा। अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष पद से रामधन को हटाने के लिए कहा गया। उसके लिए महावीर प्रसाद और सुखदेव प्रसाद के नाम दिए गए। मैंने कहा कांग्रेस में और योग्य व्यक्ति हैं, उनके नाम दीजिए अन्यथा रामधन ही अध्यक्ष रहेंगे। ब्रिटेन में उच्चायुक्त की नियक्ति जरूरी थी। विद्याचरण शुक्ल ने एक लिस्ट बनायी थी। उसमें राम निवास मिर्धा का नाम था। राजीव गांधी भी उनके नाम पर सहमत थे। बाद में वहाँ राजस्थान के गणित का सवाल उठा। मैंने बिना सलाह किये राष्ट्रपति की सहमति से लक्ष्मीमल सिंघवी को भेजा। कैबिनेट सेक्रेटरी के सवाल पर भी मतभेद हुआ। जिस पहले का नाम सुझाया गया, मेरी राय में वह लोगों को साथ लेकर काम नही कर सकते थे। जो दूसरा नाम आया, वह एक नामी-गिरामी औद्योगिक घराने के सम्पर्क में थे। मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी भी उनके पक्ष में थे। पर मैं उन्हें कैबिनेट सेक्रेटरी नियुक्त नही कर सकता था। मैंने वरिष्ठता के आधार पर ही हर नियुक्ति की।

चन्द्रशेखर के अनुसार पुलिस की जासूसी का बहाना उन्हें दबाव में लेने के लिए बनाया गया। यह बहाना बनाने वालों ने यह नही सोचा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा! लोकसभा में जबाब देने के लिए मैं खड़ा हुआ, उस समय देवीलाल जी ने मुझसे कहा कि राजीव गांधी जी बात करना चाहते हैं। मैं जाऊं? मैंने कहा जरुर जाइये और अपनी प्राइममिनिस्टरी की बात करके आइएगा। मेरे दिन इस पद पर पूरे हो गए। लोकसभा में भाषण करने के बाद मैंने अपनी सरकार का इस्तीफ़ा सौंप दिया। उसी रात मेरे पास प्रस्ताव आया कि आप दोबारा शपथ लीजिए। आपकी सरकार में कांग्रेस भी शामिल हो जाएगी। मैंने कहा कि मेरा काम हो गया। यह प्रस्ताव शायद इसलिए आया क्योंकि लोग तुरंत चुनाव नही चाहते थे।

 

सम्प्रति- लेखक श्री राजखन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों,पत्रिकाओं में निरन्तर छपते रहते है।

 

 

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