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कोरोना की कराहों में सेना के जरिए ‘वाह-वाह’ की तलाश…- उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

देश में कोरोना से लड़ने वाले भारत के कर्मवीर योद्धाओं के वंदन अभिनंदन के प्रसंग में भारतीय सेना की गैरजरूरी पहल के बाद लोगों के जहन में सेना के राजनीतिकरण से होने वाले नुकसान की आशंकाएं फिर आकार लेने लगी हैं। मौजूदा हालात में सेना की सलामी का गैर जरूरी आयोजन कितना जरूरी था?…इस पहल का सबब क्या है?…यह पहल लोकतंत्र और संविधान की लक्ष्मण रेखाओं के दायरों में कितनी वाजिब और जायज है? इन सवालों के सिरे की चिंगारियां महत्वाकांक्षाओं के राजनीतिक बारूद के किनारों पर भी खुलती हैं, जो खतरनाक हो सकते हैं। इस खतरे को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि कोरोना के वायरस की तरह राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का वायरस कहीं सेना के स्वास्थ्य पर कहर बनकर नहीं टूट पड़े?
सत्तर सालों में अनेक विरोधाभासों के बावजूद भारत में जिस तरीके से हमारे राजनीतिक पूर्वजों ने आजादी के बाद लोकतंत्र की परवरिश की, वह बेमिसाल है। लोकतंत्र की अद्भुत ताकत की वजह से ही भारत रक्षा और राजनीति से जुड़े कई हादसों का सामना करने में सफल रहा है। पड़ोसी मुल्कों में फलने-फूलने वाली राजनीतिक तानाशाही और सेना के हस्तक्षेप की प्रवृत्तियों के असर से भारत हमेशा अछूता रहा है। लोकतंत्र का स्थायी भाव भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती है। अंदरूनी मसलो में सेना का हस्तक्षेप या राजनीतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए सेना के इस्तेमाल से भारत हमेशा मुक्त रहा है।
भारतीय सेना ने भी हमेशा संविधान के दायरों में, जात-पांत और धर्म के दायरों से ऊपर उठकर काम किया है। लेकिन कोरोना के मसले में तीनों सेनाओं की यह पहल कुछ चौंकाने वाली है। एक मई 2020 को सीडीएस जनरल विपिन रावत समेत देश के तीनो सेनाध्यक्षों की पत्रकार वार्ता की सूचना ने लोगों को कई किस्म की आशंकाओ से भर दिया था। कोरोना वीरों के सम्मान में मिलट्री ड्रिल की सूचना पहाड़ से चुहिया निकलने वाली कहावत चरितार्थ करती है। विपिन रावत की लंबी तकरीर गैर जरूरी थी। दिलचस्प यह है कि रावत के बोलने के बाद तीनों सेनाध्यक्षों के बोलने का स्कोप दो-चार वाक्यों में सिमट जाना प्रेस वार्ता के औचित्य पर ही सवाल खड़े करता है। वैसे भी यह काम सेना का जनसम्पर्क विभाग आसानी से कर सकता था।
सेना के विभिन्नो अंगो का कवरेज करने वाले रिपोर्टर्स और पर्यवेक्षकों का कहना है कि चीन युद्ध (1962) पाकिस्तान युद्ध (1965) बंगला देश युद्ध (1971) अथवा ऑपरेशन ब्लू-स्टार जैसे आर्मी ऑपरेशन्स के समय भी सेनाध्यक्ष मीडिया से रूबरू नही हुए थे। आपातकाल, बाबरी मस्जिद विध्वंस, पूर्वोत्तर के उग्रवाद और श्रीलंका में भारत के सैन्य हस्तक्षेप के दरम्यान महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने के बाद भी सेनाध्यक्षों ने प्रेस से गरिमापूर्ण दूरियां बनाकर रखी थी। सेनाध्यक्षों को प्रेस को संबोधित करते हुए कदाचित किसी ने देखा है।
संविधान के मुताबिक तीन सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति हैं और सेनाएं संसद के प्रति जवाबदेह होती हैं। सेना से मुतल्लिक कोई भी निर्णय संसदीय नेतृत्व ही करता है। जाहिर है कि सेना ने कोरोना से लड़ने वाले योद्धाओं के सम्मान का फैसला मोदी-सरकार के परामर्श पर ही लिया है। यहां सवाल मुनासिब है कि कोरोना योद्धाओं के अभिनंदन के फैसले से अवगत कराने के लिए सेना के चार सर्वोच्च अधिकारियों के पैनल की जरूरत है तो किसी देश से युद्ध के हालात में माइक कौन संभालेगा?
सेना के इस कार्यक्रम का अंदाज परेशान करने वाला है। सेना के फ्लाई पास्ट, आर्मी बैंड के प्रदर्शन, अस्पतालों पर फूलो की बौछार और युध्द पोतों को दीवाली जैसी रोशनी से सजाने जैसे कार्यक्रमों के एक ओर वो कर्मवीर थे, जो कोरोना के चक्रव्यूह में फंसे युद्ध में जूझ रहे हैं और दूसरी ओर ऐसे बीमार लोगों का आर्तनाद था, जिनके ऊपर मौत के साए गहरा रहे हैं। आहों और कराहों के बीच वाह-वाही का यह घालमेल वितृष्णा पैदा करने वाला कृत्य है। आकाश में सेना के करतबों में मास्क में छिपे चेहरे की मजबूरियों को पढ़ पाना मुश्किल है। कोरोना वीरो के माथे पर अभिनंदन का कथित टीका लगाने वाली यह थीसिस केन्द्र सरकार के उस इवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा है, जो उसकी राजनीति के उद्देश्यो को आगे बढ़ाती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि राजनीति के इवेंट-मैनेजमेंट में सेना का इस्तेमाल हो रहा है।

 

सम्प्रति-लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एवं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।यह आलेख सुबह सवेरे के  04 मई के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह संपादक भी रह चुके है।  

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