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महाराष्ट्र की सियासत: ‘सवाल यह है कि हवा आई किस इशारे पर…?’- उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

‘चराग किसके बुझे ये सवाल थोड़ी है, सवाल यह है कि हवा आई किस इशारे पर…?’ शायर नादिम नदीम ने यह शेर कब और किन हालात में लिखा होगा, कहना मुश्किल है, लेकिन फिलवक्त इस शेर में देश की मौजूदा सियासत को कुरेदने का पूरा सामान मौजूद है। सबब यह नहीं है कि महाराष्ट्र की सियासी-जंग में कौन हारा-जीता या लोकसभा में प्रज्ञा ठाकुर की गोडसे-स्तुति के मायने क्या हैं? ‘सवाल यह है कि देश के संविधान और लोकतंत्र की परम्पराओं को हाल-बेहाल करने के लिए ‘हवा आई किस इशारे पर…’? सियासत के डरावने काले बादलों के बीच नदीम के शेर की दूसरी लाइऩ की यह मासूम तहकीकात देश में लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन की उस हकीकत को जानने की पहल करती है, जिसे मौजूदा सत्ता पूरी ताकत के साथ नकारने पर आमादा है।

नदीम के शेर में जब हवाओं के रुख की बात उठती है तो सहज ही सबकी नजरें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ओर इसलिए मुड़ने लगती हैं कि हवाओं का रुख बदलने की ताकत सिर्फ उन्हीं दोनों में है। यह भी जाहिर है कि महाऱाष्ट्र में सत्ता हासिल करने के लिए जो कुछ हुआ अथवा प्रज्ञा ठाकुर की पिछली कारगुजारियों के बावजूद रक्षा मंत्रालय की महत्वपूर्ण समिति में उनकी नियुक्ति के मामलों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के किरदारों की रजामंदी को नकारना मुश्किल ही नही, बल्कि असंभव है।

प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे-गान में भाजपा को इसलिए कार्रवाई करना पड़ी कि सब कुछ लोकसभा के रिकार्ड में मौजूद है। उसी प्रकार महाराष्ट्र में मोदी-अमित शाह ने महज इसलिए कदम पीछे खींचे कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनकी रणनीति के अनुकूल नहीं था। सही अर्थों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ही संविधान-दिवस के मूल्यों को बचाने का पुण्य काम किया है, अन्यथा भाजपा की समूची रणनीति प्रोटेम स्पीकर के जरिए तकनीकी आधार पर व्हिप की आड़ में ध्वनि-मत से बहुमत हासिल करने पर केन्द्रित थी।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के कार्यालय का दुरुपयोग कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस मर्तबा सत्ता की छीना-झपटी में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की सीधी लिप्तता खुल कर सामने आई है। राष्ट्रपति जहां आधी रात को राष्ट्रपति शासन हटाने के गैरजरूरी कृत्य के लिए जिम्मेदार हैं, वहीं नरेन्द्र मोदी आपातकाल के नियम 12 के अंतर्गत प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों का दुरुपयोग के लिए जवाबदार हैं।

मोदी-सरकार में सत्ता के बलबूते पर टेढ़ी लकीरें खींच कर लोकतंत्र को विद्रूप करने की कोशिशें पहली बार देखने को नहीं मिल रही हैं। दिलचस्प यह है कि मोदी-सरकार ऐसे सवालों को हमेशा अनसुना करती रही है। नरेन्द्र मोदी के बारे में यह एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य़ है कि वो एकमात्र ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री हैं, जिसने अपने पहले कार्यकाल में कभी भी औपचारिक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित नहीं की। कारण यह है कि मोदी को सवाल पसंद नहीं हैं। चाहे विरोधी राजनेता हों या मीडिया, समाज को बदलने के लिए आतुर एक्टिविस्ट हों अथवा गरीबी के अंधेरे कोनों में बिलबिलाते आम नागरिक, मोदी के सामने सबके सवाल बेमानी हैं। किसी भी फोरम पर उनके कार्यकलापों पर सवाल उठाने अथवा असहमति व्यक्त करने की लगभग मनाही है। जो लोग सवाल करते हैं, वो राष्ट्रद्रोहियों की श्रेणी में आते हैं अथवा अरबन-नक्सल के नाम से नजरबंद हो सकते हैं।

भले ही प्रधानमंत्री खुद को आम आदमी या पत्रकारों के सवालों के दायरों से बाहर मानते हों, लेकिन क्या वो संवैधानिक मसलों में भी राष्ट्रपति या राज्यपाल की पूछताछ या सहमित-असहमति की सीमाओं से परे हैं। मीडिया के प्रति उनकी नापसंदगी अपनी जगह है, लेकिन क्या पीएमओ का दबदबा इस कदर हावी है कि वो आधी रात को किसी प्रदेश में राष्ट्रपति-शासन हटाने का आदेश करें और राष्ट्रपति उनसे औचित्य का सवाल भी नहीं करें। आधी रात में राष्ट्रपति शासन हटाने-लगाने जैसे संवैधानिक मसलों पर कठपुतलियों जैसा व्यवहार चौंकाता है। कवि-साहित्यकार नरेश सक्सेना की एक कविता है, जिसमें उन्होंने कहा है कि- ‘चीजों के गिरने के नियम होते हैं, मनुष्यों के गिरने के नियम नही होते, लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकती अपने गिरने के बारे में, मनुष्य कर सकते हैं।’

जिंदगी में लोग तय करते हैं कि उन्हें कितना नीचे गिरना है, लोकतंत्र में यह जिम्मेदारी सत्तासीन राजनेताओं की होती है कि उन्हें कितना नीचे गिरना है। उठने की हदें तो आसमान तक दिखती हैं, लेकिन गिरावट के अंधे कुंए की गहराइयों को नाप पाना असंभव है। भले ही आपको पसंद नहीं हो, लेकिन सवाल आपको टोकते हैं…उत्तर मांगते हैं…खुमारी को भगाते हैं… गिरने से बचाते हैं… इसलिए सवालों का निषेध खुद के साथ ही व्‍यवस्था के साथ भी ज्यादती है। प्रधानमंत्री अथवा गृहमंत्री को यह नहीं समझना चाहिए कि लोगों के जहन बंजर हो चुके हैं, कि प्रश्न प्रस्फुटित नहीं हो सकें। लोगों की जुबां खामोश है, लेकिन सवाल उतनी शिद्दत से जमा हो रहे हैं। यह सवाल जब सैलाब बनेंगे तो सत्ता के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों को बचाना मुश्किल होगा…।

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एवं इन्दौर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।यह आलेख सुबह सवेरे के 29  नवम्बर 19  के अंक में प्रकाशित हुआ है।

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