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पवार ने महाराष्ट्र में भाजपा को ‘गोवा-एपीसोड’ दोहराने नहीं दिया- उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

महाराष्ट्र में भाजपा, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच किसी भी तरीके से सरकार में काबिज होने की होड़ में घटित अनैतिक, अमर्यादित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक घटनाओं के धारावाहिक के उत्तरार्ध में, जबकि यह तय हो चुका है कि उध्दव ठाकरे महाराष्ट्र के ऩए मुख्यमंत्री होगे, फलक पर ऐसे कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे हैं, जिन्हें भारत में लोकतंत्र को बचाने की खातिर एड्रेस करना जरूरी है। यह एक ऐसा सनसनीखेज राजनीतिक-मेलोड्रामा था, जिसकी स्क्रिप्‍ट में नायक-खलनायक का विभेद नहीं था। इसके सारे पात्र एंटी-हीरो थे, जो पट-कथा में रहस्यात्मकता घोल रहे थे और अपने हिसाब से ट्विस्‍ट दे रहे थे। दिलचस्प यह है कि भाजपा, एनसीपी, कांग्रेस या शिवसेना के नेताओं के हर ट्विस्‍ट में अलग-अलग सवालों की मुद्राओं के साथ चेहरा सिर्फ शरद पवार का ही उभर कर सामने आता था।

वैसे इस राजनीतिक रहस्य-कथा में एक ओर केन्द्र-सरकार की नुमाइंदगी करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह जैसे दिग्गज नेता मौजूद हैं, तो दूसरी ओर एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार के साथ उद्धव ठाकरे, अहमद पटेल के साथ कांग्रेस खेमे के कई नेता मौजूद हैं। समूचा घटनाक्रम इस तथ्य की ताकीद करता है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने की हवस में ‘ए पार्टी विद डिफरेंस’ भारतीय जनता पार्टी के सूत्रधार प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने संविधान को ताक में रख दिया था। मुख्यमंत्री की शपथ के साथ ही यह सवाल उठने लगा था कि क्या सरकार संवैधानिक तरीके से बनी है, कैबिनेट की मंजूरी और राष्ट्रपति की तत्परता भी सवालों के घेरे में थी।

राजनीतिक-खलनायकी की अजब-गजब होड़ में 23 नवम्बर 2019 को मुख्यमंत्री के रूप में देवेन्द्र फडणवीस की शपथ-विधि के पहले और बाद में घटित घटनाएं अपने आसपास संविधान और लोकतंत्र से जुड़े गहरे सवालों का कुहांसा पैदा करते हुए चिंता पैदा करने वाली हैं। इनके उत्तरों को सुनिश्चित करना जरूरी है। सवालों के घेरे में वैसे तो सभी दल और नेता हैं, लेकिन भाजपा और शिवसेना की जवाबदेही इसलिए ज्यादा है कि घटनाक्रम के बीज उनके गठबंधन की टूटन में छिपे हैं। बहुमत से कोसों दूर होने के बावजूद किसी भी तरीके से राज्यों में भाजपा की सरकार बनाने की हवस ने मोदी-सरकार के पहले-दूसरे कार्यकाल में कई मर्तबा संविधान की मर्यादाओं को ध्वस्त किया गया है। महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणवीस को रातों-रात शपथ दिलाने के पहले राज्य-सरकारों में तोड़-फोड के कृत्य मोदी-सरकार कर्नाटक, गोवा, उत्तराखंड, मणिपुर जैसे राज्यों में भी कर चुकी है। फिर देश का नेतृत्व करने वाली पार्टी के नाते भाजपा नेताओं का उत्तरदायित्व है कि वो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित करें।

महाराष्ट्र में भी रातों-रात बाजी पलट देने की गरज से केन्द्र-सरकार ने जो हथकंडे अपनाए, वो संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले थे, लेकिन महाराष्ट्र में यह अनैतिक कृत्य शायद इसलिए सफल नहीं हो पाया कि यहां उसके सामने शरद पवार जैसे दिग्गज नेता चुनौती बनकर खड़े थे। इसकी बानगी मीडिया के सवालों के जवाब में शरद पवार के इस उत्तर से मिलती है कि ‘अमित शाह ने भले ही गोवा अथवा अन्य राज्यों में तिकड़मों के सहारे अथवा ईडी-सीबीआय की मदद से भाजपा के अल्पमत को बहुमत में तब्दील करके सरकारें बना ली हों, लेकिन यह महाराष्ट्र है, यहां वो ऐसा नहीं कर पाएंगे’। गौरतलब है कि शरद पवार ने अपने इस कथन को सिद्ध करके बता दिया। ईडी, सीबीआय जैसी सत्ता की मारक मिसाइलों का बेरहमी से बेइंतिहा इस्तेमाल करने वाले नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से अस्सी साल के शरद पवार ने जिस प्रकार मुकाबला किया, वो उनके जज्बे और जीवटता को दर्शाता है। इस सत्ता-संग्राम का एक पहलू यह भी है कि शरद पवार ने दोहरी लड़ाई लड़ी है। उनके सामने मोदी-शाह जैसे दिग्गज थे, तो पीछे वो लोग थे, जो अजित पवार के नाम पर उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे थे। मीडिया दनादन सवाल दाग रहा था कि वो अजित पवार के खिलाफ कार्रवाई करके उन्हें पार्टी से निष्कासित क्यों नही कर रहे हैं। पार्टी और परिवार के मुखिया की दोहरी भूमिकाओं के अंतर्दंव्द के राजनीतिक-बवण्डर के बीच खुद को स्थिर बनाए रखना उनकी परिपक्वता की सबसे बड़ी निशानी है।

महाराष्ट्र के सत्ता संघर्ष में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अमित शाह के नाम पर चाणक्य और चाणक्य-नीति से जुड़े मुहावरों का जमकर इस्तेमाल किया है। राजनीतिक हलकों में मीडिया ने यह धारणा पैदा की है कि मौजूदा वक्त के सबसे बड़े चाणक्य देश के गृहमंत्री अमित शाह हैं, जिन्होंने कई राज्यों में अल्पमत होने के बावजूद भाजपा की सरकारें बनाने का काम किया है। लेकिन महाराष्ट्र मे उध्दव ठाकरे के सत्तारोहण के बाद शायद गोदी-मीडिया का यह भ्रम टूटेगा कि अमित शाह देश के सबसे बड़े चाणक्य हैं। शरद पवार की कार्य-शैली सही अर्थो में चाणक्य होने के मायने और मानदंडों को उद्घाटित करती है।

 

सम्प्रति- लेखक श्री अमेश त्रिवेदी भोपाल एवं इन्दौर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक सुबह सवेेरे के प्रधान सम्पादक हैं।यह आलेख सुबह सवेरे के 27 नवम्बर 19 के अँक में प्रकाशित हुआ है।

 

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