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नीतीश की गुमशुदगी के बाद पवार विपक्षी-ध्रुवीकरण की धुरी बनेगें? – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

महाराष्ट्र में सत्ता के सिंहासन से फिसलने के बाद भाजपा के पावर-कॉरिडोर में उठने वाली राजनीतिक आहों और कराहों की अनुगूंज जल्दी ठंडी होने वाली नहीं है, क्योंकि इस घटनाक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की आत्म-मुग्धता का वह कवच तड़क गया है, जो उनके अजेय होने का एहसास और गरूर पैदा करता था। खुद के अजेय होने का यही भाव देश के लोकतंत्र और संविधान के पन्नों पर निरंकुशता के नए-नए अफसाने लिख रहा है। बहरहाल, कहना मुश्किल है कि इस घटना-विशेष से आहत सत्तासीनों का आहत अहंकार भविष्य में प्रतिशोध और प्रतिघात की राजनीति की कौन सी शक्ल में सामने आएगा, लेकिन फिलवक्त एनसीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार एक ऐसे सितारे के रूप में उभरे हैं, जिसकी राजनीतिक शख्सियत का लोहा पूरा देश मान रहा है। समीक्षकों की नजर में पवार ने महाराष्ट्र में सत्ता की राजनीतिक शतरंज के खेल में देश के चाणक्य के रूप में मशहूर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को भी मात दी है।

अस्सी साल के बुजुर्ग नेता शरद पवार के हाथों भाजपा की हार से उपजी लहरें सिर्फ महाराष्ट्र की भौगोलिक-सीमाओं के राजनीतिक तटबंधों से टकरा कर गुम होने वाली नहीं हैं। ये लहरें देश की राजनीतिक-रवानी को नया मोमेण्टम देने वाली सिध्द होंगी, क्योंकि राजनीति और सत्ता के गलियारों में व्याप्त यह भ्रम भी खंडित हुआ है कि अमित शाह की निरंकुश पॉवर-पोलिटिक्स का जवाब नहीं दिया जा सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की चिंता का एक सबब यह भी है कि महाष्ट्र-एपीसोड के बाद अब राजनीति के क्षेत्रीय क्षत्रपों के तेवरों को संभालना आसान नहीं होगा। मोदी ने अपने पहले-दूसरे कार्यकाल में एनडीए के सहयोगी दलों को कमतर आंकते हुए हमेशा उनके साथ रूखा व्यवहार किया है।

महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार देश की राजनीति में नए आयाम जोड़ने वाली है। देश की औद्योगिक-राजधानी के सूत्र गैर-भाजपाई दलों के हाथों में आने के राजनीतिक-निहितार्थ किसी से छिपे नहीं हैं। अमित शाह ने अपने विरोधी दलों के आर्थिक-सामाजिक स्त्रोतों को जाम करने का काम योजनाबध्द तरीके से किया है। भले ही आंशिक हो, लेकिन अब यह रुकावट अपेक्षाकृत कम होगी, क्योंकि कार्पोरेट-जगत में यह धारणा भी बलवती होगी कि भाजपा पूरी तरह अपराजेय नही है। उसे भी परास्त किया जा सकता है।

भारतीय राजनीति में किसी समय नरेन्द्र मोदी के मुकाबले खड़े होने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक गुमशुदगी और गफलत के बाद शरद पवार विपक्षी राजनीति के ध्रुवीकरण की धुरी बन सकते हैं, बशर्ते उनकी उम्र और उनकी सेहत उनका साथ दे। शरद पवार में यह कूबत है कि वो क्षेत्रीय दलों के साथ ही कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित और नियोजित कर सकते हैं। भाजपा विरोधी दलों के सामने ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं। जमीनी हकीकत से लेकर सत्ता के गलियारों तक पसरी उनकी राजनीतिक यात्रा के अनुभव की बानगी लोग महाराष्ट्र में देख चुके हैं। उनका यह अनुभव विश्वास जगाता है कि वो देश में विपक्ष की राजनीति को सार्थक आकार दे सकते हैं। सत्ता-पक्ष की निरंकुशता और निर्ममता के खिलाफ लामबंद होना देश की पहली राजनीतिक जरूरत है। उत्तर-नेहरूकालीन भारत के राजनीतिक-इतिहास के वो साक्षी हैं और उन्हें देश के सत्ता-लोलुप बिगड़ैल नेताओं की राजनीतिक फितरत का अंदाजा है। महाराष्ट्र की ताजा घटनाओं में उनका यह अनुभव देश के सामने आ चुका है।

महाराष्ट्र में भाजपा और विपक्षी दलों के सत्ता-संघर्ष के बाद देश की राजनीति नई करवट लेती प्रतीत हो रही है। राजनीतिक दलों की विचारधारा अब हाशिए पर चली गई है। सिंहासन की इस लड़ाई में राजनीति का जो चेहरा सामने आया, वह विचलित करने वाला है। विचार-धारा को लेकर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार किसी भी पार्टी के पास नहीं बचा है। सबसे ज्यादा फफोले भाजपा के चेहरे पर नजर आ रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार के गठन पर सियासी-सवाल उठाने का नैतिक अधिकार भी किसी के पास नहीं है। रीति-नीति और नैतिकता के मद्देनजर भाजपा की जमीन में इतनी दीमक लग चुकी है कि विश्वास की कोपलें फूटना आसान नहीं है। ट्रेजेडी यह है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व गृहमंत्री से लेकर राज्यपाल तक, संविधान के सभी पहरुए लोकतंत्र को खाक में मिलाने वाले इस गुनाह में बराबर के भागीदार हैं। ये परिस्थितियां अभूतपूर्व हैं। इनसे निजात पाने के लिए राजनीति में नई शुरुआत की जरूरत है। महाराष्ट्र-एपीसोड में सत्ता का नंगा नाच देखने के बाद देश के राजनीतिक-मॉडल को लेकर क्या कोई सार्थक बहस आकार लेगी अथवा सत्ता की अंधेरगर्दी यूं ही चलती रहेगी।

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एवं इन्दौर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।यह आलेख सुबह सवेरे के 28  नवम्बर 19  के अंक में प्रकाशित हुआ है।

 

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