Tuesday , October 15 2019
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भूपेश बघेलःसांस्कृतिक राजनीति का नया चेहरा – दिवाकर मुक्तिबोध

दिवाकर मुक्तिबोध

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर भाजपा को आइना दिखाने का काम यदि किसी ने किया है तो वे भूपेश बघेल हैं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री। गांधी जी के नाम की माला जपकर राजनीतिक रोटी सेंकने की भाजपा की कोशिश को उस समय बडा धक्का लगा जब भूपेश बघेल ने भाजपा नेताओं को चुनौती दी कि यदि उन्हें गांधी से सच्चा प्रेम है तो गांधी के हत्यारे गोडसे को मुर्दाबाद कहना होगा। जाहिर है , भाजपाई गांधी ज़िंदाबाद के नारे तो लगा सकते हैं पर गोडसे मुर्दाबाद के नहीं क्योंकि पार्टी की राष्ट्रीय रीति-नीति गोडसे व सावरकर को देशभक्त के रूप में स्थापित करने की है। चूँकि भाजपा के पास भूपेश बघेल के इस हमले का कोई जवाब नहीं था लिहाजा उसने गोलमोल जवाब देकर कन्नी काट ली।

दरअसल, महात्मा गांधी की जयंती के बहाने कांग्रेस को भाजपा को घेरने व उसके साम्प्रदायिक विचारों पर गांधीवाद की परत चढ़ाने की उसकी कोशिशों को उजागर करने का अच्छा अवसर हाथ लगा जिसका पूरा फ़ायदा छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने उठाया। उसकी यह एक राजनीतिक मुहिम थी लेकिन सच्चे अर्थों में उसने गांधी को याद किया और उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने ऐसे कार्यक्रम किए जो शायद इतने व्यापक स्तर पर पहिले कभी नहीं हुए थे। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयोजन था गांधी विचार पद-यात्रा जो चार अक्टूबर को धमतरी जिले के गाँव कंडेल से प्रारंभ हुई और जिसका समापन राजधानी रायपुर में दस अक्टूबर को हुआ। छत्तीसगढ़ के जन-आंदोलनों में 1920 के कंडेल गाँव के नहर सत्याग्रह का विशेष महत्व है। सिंचाई के लिए पानी चोरी के आरोप के विरोध में किसानों के इस आंदोलन में महात्मा गांधी शामिल हुए थे। मुख्यमंत्री ने विचार यात्रा की अगुवाई की जिसमें सरकार के सभी मंत्री, पार्टी पदाधिकारी व बडी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल हुए। यह यात्रा गाँव-गाँव में गांधीजी के विचारों व जीवन मूल्यों को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से प्रेरित थी। कहना न होगा कि इस यात्रा का जगह -जगह आत्मीय स्वागत हुआ। राज्य में यह भी पहिली बार हुआ जब गांधीजी की वैचारिकता पर चर्चा करने विधान सभा का दो दिवसीय विशेष सत्र 2-3 अक्टूबर को बुलाया गया। इस सत्र में विचार-विमर्श के दौरान जहाँ कांग्रेस जनों ने गांधी ज़िंदाबाद , गोडसे मुर्दाबाद के नारे लगाए वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा विधायकों को ललकारा कि यदि उन्हें गांधी से सच्चा प्रेम है तो गांधी ज़िंदाबाद के साथ ही उन्हें गोडसे मुर्दाबाद के नारे लगाने होंगे। जाहिर है , मुख्यमंत्री की चुनौती से बचने का भाजपा के पास एक ही रास्ता शेष रह गया था कि हंगामा खड़ा किया जाए और उसने यही किया।

भाजपा को एक्सपोज़ करने की भूपेश बघेल की यह युक्ति बेहद कारगर रही और विवश होकर भाजपा को बैकफ़ुट पर आना पड़ा। यह बात दूर तक गई। उसके गोडसे प्रशस्ति-गान का माक़ूल जवाब इससे बेहतर और नहीं हो सकता था। और इसका श्रेय नि:संदेह छत्तीसगढ कांग्रेस की राजनीतिक सूझबूझ को देना चाहिए। मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल को राज्य सरकार की कमान संभाले अभी एक वर्ष भी पूर्ण नहीं हुआ है और इस दौरान अपनी राजनीतिक सूझबूझ व रणनीतिक कौशल से उन्होंने अपनी एक राष्ट्रीय पहिचान बना ली है। कांग्रेस के स्टार प्रचारकों की सूची में भी उनका नाम दर्ज हो गया है। यह भी स्पष्ट हैं कि देशभर में कांग्रेस यदि कही बहुत मज़बूत है तो वह छत्तीसगढ में है। गत दिसंबर में हुए विधान सभा चुनाव में कुल 90 विधानसभा सीटों में से 68 सीटें उसने जीती थीं। हाल ही में दंतेवाड़ा उपचुनाव भी उसने जीत लिया। यह सीट बीजेपी के क़ब्ज़े में थी। इसी महीने , 21 को चित्रकोट उपचुनाव भी होना है और यदि कांग्रेस यह सीट जीत लेती है तो कुल 69 सीटें उसके पास हो जाएँगी यानी ऐसा बहुमत जो कांग्रेस शासित राज्य में किसी के पास नहीं है। यक़ीनन भारी आंतरिक उठा-पटक के दौर से गुज़र रही राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए छत्तीसगढ सुकून देने वाला राज्य है।

इस सरकार के पास अभी चार साल से अधिक का वक्त है। जनोपयोगी कामकाज के लिए यह अवधि काफी बडी है। सरकार जिस तरह से चल रही है , उससे एक बात तो स्पष्ट है कि उसने अपने आप को राजनीतिक स्तर पर बहुत मज़बूत कर लिया है। इतना मज़बूत कि अगले विधान सभा चुनाव में भी उसे कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए। हालाँकि ऐसा कहना अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य इसका स्पष्ट संकेत देता है। भाजपा के बरास्ते मोदी-शाह की कांग्रेस-मुक्त भारत की संकल्पना को जिस हद तक भी कामयाब माना जाए तो उतना ही कामयाब है कांग्रेस का भाजपा मुक्त छत्तीसगढ । भूपेश बघेल की राजनीति की ख़ासियत यह है कि वे प्रदेश की जनता को भावात्मक रूप से खुद से व कांग्रेस से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। और इसके लिए धार्मिक व सांस्कृतिक आधार भी ले रहे हैं। चाहे छत्तीसगढ के सारे तीज-त्योहारों को सरकारी स्तर पर मनाने का फ़ैसला हो , उस दिन सार्वजनिक अवकाश की घोषणा हो या छत्तीसगढ में राम वन-गमन-पथ चिन्हित करने का मामला हो , सबके पीछे एक ही मक़सद है , राज्य के मतदाताओं के उस विश्वास को टिकाए रखना जो उन्होंने दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत देकर व्यक्त किया है।

भूपेश बघेल वैसे भी ख़ालिस छत्तीसगढ़ी है इसलिए उन्हें यहाँ के मूल निवासियों के बीच रमने में कोई दिक़्क़त नहीं है। छत्तीसगढ की संस्कृति , लोककलाएँ ,छत्तीसगढ का खान-पान , व्यंजन ,धार्मिक अनुष्ठान व लोक परम्पराओं के उत्सव में सक्रिय भागीदारी के जरिए वे जनमानस के दिलोदिमाग़ में यह बात बैठा रहे हैं कि वे उनसे अलग नहीं है , उनके बीच के हैं , उनके जैसे हैं। वे भौरा खेलते हैं , गेडी चढ़ते हैं , सिर पर साफ़ा बाँधकर बैलगाड़ी हाँकते है और जब लोगों के बीच में होते हैं तो अपने प्रिय शग़ल 2-3 साल के किसी भी बच्चे को अपनी हथेली पर खडे करके संतुलन साधते हैं। और कन्या भोज में बच्चियों को खुद खाना परोसते हैं। आम तौर पर किसी मुख्यमंत्री की इतनी सर्वसाधारण छवि , मेलजोल और सादगीपूर्ण व्यवहार अचरज की बात है , भले ही मंशा राजनीति प्रेरित हो। लेकिन इससे जनता के बीच जो संदेश जा रहा है, वह सरकार व पार्टी के लिए नि:संदेह सकारात्मक है।

मुख्यमंत्री ने राज्य की संस्कृति को बढ़ावा देने की शुरुआत राजधानी रायपुर सहित सभी जिलों में छत्तीसगढ़ी व्यंजन के स्टाल स्थापित करने की घोषणा के साथ की। इन्हें नाम दिया गया -गढ़-कलेवा। कुछ स्टाल शुरू भी हुए। फिर उन्होंने राज्य के प्रमुख त्योहार जिनमें महिलाओं की भागीदारी प्रमुख होती है , तीजा, पोला , हरेली व माता कर्मा जयंती पर शासकीय अवकाश घोषित किया , साथ ही इन्हें शासकीय स्तर पर मनाने का एलान भी। मुख्यमंत्री निवास में बडी तैयारियों के साथ तीजा व हरेली का आयोजन किया गया। और अब गौरा-गौरी त्योहार में भी सरकार की भागीदारी रहेगी। इसे भी उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। यह दीपावली के दिनों में छत्तीसगढ़िया आस्था व परम्परा का सबसे बडा पर्व है जिसमें ग्रामीण महिलाएँ व पुरूष बडी संख्या में भाग लेते हैं। यानी भूपेश बघेल ने कोई ऐसा पर्व नहीं छोड़ा है जिसमें उन्हें तथा मंत्रियों , विधायकों, कांग्रेस के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को आम जनता के साथ घुलमिलने का अवसर न मिले। जाहिर है, कांग्रेस की यह रणनीतिक सोच राज्य में अपने पैर मज़बूती के साथ जमाए रखने की है।

दरअसल प्रदेश कांग्रेस भाजपा के लिए कोई स्थान ख़ाली नहीं छोड़ना चाहती। इसलिए धर्म की राजनीति में उसने राम-नाम का भी सहारा ले रखा है। राज्य विधानसभा के विशेष अधिवेशन में भाजपा के साथ उसकी ‘ हमारे राम-तुम्हारे राम ‘ पर जोरदार बहस हुई। बाद में राजधानी में आयोजित राम लीला कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ के कण-कण में भगवान राम बसे हुए हैं। बड़े गाँवों में रामकुटी बनाई जाती है जो संकट के समय काम आती है। सरकार , राम वन-पथ गमन यानी भगवान राम के वन प्रस्थान का मार्ग चिन्हित कर उन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करेगी। इस घोषणा के साथ ही मुख्यमंत्री ने लगे हाथ एक और एलान कर दिया कि दीपावली में गोवर्धन उत्सव गौठान ( पशुओं के रहने का स्थान ) दिवस के रूप में मनाया जाएगा। उनकी बहुचर्चित ग्रामीण विकास की योजना नरवा, गरूवा, घुरवा और बाड़ी में गरूवा मवेशियों के पालन -पोषण व संवर्धन से संबंधित है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भूपेश बघेल सरकार का प्राथमिक लक्ष्य गाँवों को हर दृष्टि से आत्म निर्भर बनाना व आधुनिक सुविधाओं से लैस करना है। भाजपा के पन्द्रह वर्षों के शासन में भी ग्रामीण विकास का लक्ष्य प्राथमिकता की सूची में था लेकिन इसके बावजूद गाँवों की सूरत नहीं बदली। बघेल सरकार के लिए यह चुनौती इसलिए ज्यादा गंभीर है कि उसे नीचे से लेकर उपर तक उस नौकरशाही को भी साधना है जो सत्ता परिवर्तन के नौ माह बीतने के बाद भी असमंजस की स्थिति में है । क्योंकि यह तय नहीं है कि कौन कितने समय तक एक स्थान पर पदस्थ रहेगा। दरअसल नौकरशाही पर पन्द्रह वर्षों से हावी भाजपा के भूत को भगाने की दृष्टि से तबादले व पदस्थापनाएं तो जरूरी थीं लेकिन इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार ने संयम व युक्तिसंगत तरीक़े से काम नहीं किया जिससे उसकी भद पिटी और आलोचना हुई। दरअसल सरकार खुद तय नहीं कर पा रही है कि वह किस पर विश्वास करे किस पर नहीं । यदि अधिक समय तक यही स्थिति बनी रही तो यक़ीनन विकास के लक्ष्य दूर होते जाएँगे। बघेल सरकार राजनीतिक मोर्चे पर भले ही अपराजेय रहे पर आम आदमी के भरोसे को कायम रखना उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। आने वाले महीनों में इसकी झलक मिल ही जाएगी।

 

सम्प्रति-लेखक श्री दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित पत्रकार है।श्री मुक्तिबोध कई प्रमुख समाचार पत्रो के सम्पादक रह चुके है।

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