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बापू के डेढ़ सौ साल और कांग्रेस-राज खन्ना

राज खन्ना

बापू के रास्ते चलें न चलें, उनकी चर्चा होती रहती है। देखने-सुनने में उनकी बातें और सीख भले सरल-सहज लगें। पर आचरण में उतारना उतना ही जटिल। और ऐसा नही कि उनके जाने के बाद ऐसा हुआ। जीवनकाल में ही बापू को इसका अहसास भी हो गया था। आजादी नजदीक आते-आते बापू अकेले पड़ने लगे थे। कांग्रेस के बड़े नेताओं को उनकी राय की फ़िक्र कम होने लगी थी। बापू को लगने लगा था कि कांग्रेस को अपना स्वरूप बदलना चाहिए। उनके दुःखद निधन के फौरन बाद 15 फरवरी 1948 के ‘ हरिजन ‘ में उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा शीर्षक से लेख छपा था। इस लेख में उनके 27 जनवरी 1948 के एक नोट का जिक्र था। उसमें उन्होंने लिखा , ” वर्तमान स्वरूप में कांग्रेस अपनी भूमिका पूरी कर चुकी है, जिसे भंग करके एक लोक सेवक संघ में तब्दील कर देना चाहिए।”

बापू की विरासत पर सारे देश का दावा है।चर्चा बेमानी है कि उनकी याद प्रतिमा पर माला या राजघाट पर श्रध्दांजलि और कसमें खाने के कर्मकांड तक आमतौर पर सिमटती है। उनके राजनीतिक उत्तराधिकार पर कांग्रेस का दावा रहा है। बापू के जन्म के 150 वें साल पर कांग्रेस एक बार फिर कठिन चुनौती से रुबरु है। पार्टी का खराब समय चल है। भविष्य को लेकर सवाल हो रहे हैं। संयोग है कि पचास साल पहले बापू के शताब्दी वर्ष 1969 में भी पार्टी को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा था। लेकिन तब पार्टी बंट कर भी संकट से उबर गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पार्टी के राष्ट्रपति पद के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी के मुकाबले वी वी गिरि को अपना उम्मीदवार बनाया था। वह जीते थे। पार्टी के पुराने नेता मोरारजी देसाई, के कामराज और निजलिंगप्पा आदि का धड़ा बाद में सिंडिकेट और कांग्रेस ( ओ ) के नाम से पहचाना गया। 1977 में उसका जनता पार्टी में विलय हुआ।

पचास साल पहले टूट के बाद पार्टी चुनावी राजनीति में और मजबूत होकर सामने आई थी। लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु के बाद इंदिरा जी को प्रधानमंत्री बनाने में सहायक बने नेताओं को उम्मीद थी कि इंदिरा जी उनके इशारों पर चलेंगी।ऐसा न होने पर इन नेताओं ने इंदिरा जी को चुनौती देने का फैसला किया था। संजीव रेड्डी और गिरि के बीच चुनाव उसी ताकत की परीक्षा थी। इंदिरा जी सबल साबित हुईं थीं। यह वही दौर था, जब इंदिरा जी ने पूर्व राजाओं का प्रिवी पर्स और अन्य सहूलियतें खत्म की। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। उनकी गरीब समर्थक छवि उभरी। बांग्ला देश की लड़ाई और उसमें भारत की जीत ने इंदिरा जी की लोकप्रियता को पंख लगा दिए। उन्होंने तय समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए और बाजी पलट दी। 1971 में उनके मुकाबले के लिए जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, संसोपा और कांग्रेस (ओ) का महागठबंधन बुरी तरह विफल हुआ। कांग्रेस 352 सीटें जीती। जनसंघ को 22 सीटें मिली थीं। 1967 में उसकी सीटें 35 थीं। कांग्रेस तुलना में आगे बढ़ी थी 1967 में उसकी सीटों की संख्या 283 थी। 1971 की बड़ी जीत कई कारणों से महत्वपूर्ण थी। 1967 में कांग्रेस पार्टी पहला चुनाव बिना पंडित नेहरू के लड़ी थी। तब लोकसभा में सीटों के नुकसान के साथ वह नौ राज्यों में सत्ता के बाहर हो गई थी। गैरकांग्रेसवाद के शोर के बीच इन राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनी थीं। 1971 की लोकसभा जीत को कांग्रेस ने 1972 के विधानसभा चुनाव में दोहराया था। इंदिरा जी साबित करने में सफल रही थीं कि जहां वह या नेहरू परिवार वहीं असली कांग्रेस।

गांधी जी के जन्म के सौ और अब डेढ़ सौ वर्षों के बीच के पचास वर्ष के अंतराल में 2019 में कांग्रेस की चुनौतियां जुदा किस्म की हैं। संकट विकट है। निराशा और अनिश्चितता के बीच पार्टी कमजोर हालत में है। 1969 में नेतृत्व को चुनौतियां भीतर से थीं। 2019 में मुकाबला ऐसे प्रतिद्वंदी से है, जो लगातर मजबूत और आक्रामक है। नेहरु-गांधी परिवार गुजरे पांच दशकों में पार्टी पर अपनी पकड़ बनाये रखने में सफल रहा है। पर कमजोर हुआ तो मतदाताओं के बीच। परिवार की मौजूदा पीढ़ी अपनी चमक खो चुकी है। इंदिरा जी उन नेताओं से लड़ी थीं,जिनकी संगठन पर पकड़ थी। उधर सोनिया- राहुल-प्रियंका पार्टी के लिए अपरिहार्य हैं। उनकी अगुवाई पर कोई विवाद नही है। संकट अनुकरण करने वाली संख्या घटते जाने का है। संगठन के निस्तेज हो जाने का है। 1969 में इंदिरा जी गरीबों की सबसे बड़ी पैरोकार नेता के रुप में लोकप्रियता के आसमान पर थीं। 2014 से इस जगह नरेंद्र मोदी का कब्जा है। 1971 में कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए विपक्ष एक जुट था। 2019 में कांग्रेस को भाजपा का मुकाबला करने के लिए सहयोगियों की तलाश है। पांच दशकों में पार्टी 352 से घटकर 52 पर पहुंच गई है। उधर इसी आंकड़े को एन डी ए ने 353 पर पहुंच पार कर लिया । गठबंधन की अगुवाई करने वाली भाजपा 1971 के 22 सांसदों से 2019 में 301 पर पहुँच गई। कांग्रेस की राजनीतिक जमीन भाजपा के कब्ज़े में चली गई। गैर कांग्रेसी पार्टियों की मदद से गैर कांग्रेसवाद के अभियान पर निकली भाजपा अब अपने बूते कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान पर है। उधर कभी कांग्रेस के वंशवाद और फिर इंदिरा जी की इमरजेंसी के ख़िलाफ़ लड़ने वाली अनेक ताकतें अब कुछ वैसा ही खतरा भाजपा राज में महसूस कर कांग्रेस के साथ हैं।

लोकतन्त्र और उसकी संस्थाओं पर ख़तरे को लेकर विवाद चलता रहेगा। बेशक सिर्फ विरोध के लिए विरोध नही होना चाहिए। पर लोकतंत्र की सेहत के लिए सशक्त विपक्ष की जरूरत से कौन इनकार करेगा ? संख्याबल में विपक्ष कमजोर है। पर ज़्यादा फिक्र उसके मनोबल के कमजोर होने से है। ऐसे में बापू बार-बार याद आते हैं। असहमति और विरोध दर्ज करने के लिए वह किसी ताकत के आगे नही झुके। विदेशी सत्ता से भी जूझे और लगातार खुद के भीतर भी झांकते रहे। अपनों की कमियों – ग़लतियों के विरुद्ध भी खड़े हुए। आज के दलीय लोकतंत्र और राजनीति में क्या ऐसा मुमकिन है ? सबकी जुबान पर उनका नाम और रास्ता वह जिसे वह गलत मानते थे। मंजिल वही चाहिए जिसके लिए बापू लड़े और जिसका सपना लिए विदा हुए !

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।

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