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कश्मीर समस्या ; नजरिया कर्ण सिंह का – राज खन्ना

राज खन्ना

जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय। उस समय के हालात। राजा हरि सिंह , शेख अब्दुल्ला, पण्डित नेहरू,सरदार पटेल आदि की उसमे भूमिका समझने के लिए एक नजरिया डॉक्टर कर्ण सिंह का भी है। राजा हरि सिंह के इकलौते पुत्र कर्ण सिंह आजादी के बाद अगले अट्ठारह साल वहां के रीजेंट , सदरे रियासत और राज्यपाल भी रहे। अपनी रियासतों का भारत में विलय करने वाले राजाओं में राजा हरि सिंह इकलौते राजा थे, जिन्होंने सिर्फ रियासत नही खोई। शेख अब्दुल्ला की जिद पर रियासत में उनका रहना भी मुमकिन नही हुआ । 1949 में रियासत छोड़ने के बाद उनकी शेष जिंदगी मुम्बई के 64 पेडर रोड स्थित हरि निवास में बीती। 27 अप्रेल 1961 को उनका वहीं निधन हुआ। कर्ण सिंह उस समय इंग्लैंड में थे। वापसी तक पिता की इच्छा के मुताबिक आर्य समाज रीति से दाह संस्कार तक हो चुका था। आगे के चुनिंदा अंश राज कमल प्रकाशन से प्रकाशित कर्ण सिंह की आत्मकथा से साभार ,
” उपमहाद्वीप में हो रही जबरदस्त उथल-पुथल से बेखबर मेरे पिता इस खुशफ़हमी में थे कि सब कुछ पूर्ववत है। शेख अब्दुल्ला की 1931 में स्थापित मुस्लिम कांफ्रेंस नेशनल कांफ्रेंस का रूप ले चुकी थी। और इस पार्टी से नेहरू जी के साथ निजी व सैद्धांतिक स्तर पर अच्छे सम्बन्ध बन चुके थे। हिंदुस्तानी रियासतों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बृहद ब्रिटिश विरोधी आंदोलन जनान्दोलन के रुप में जोर पकड़ने लगा था और कश्मीर की रियासत भी उससे अछूती नही थी। इसमे शेख अब्दुल्ला खासे सक्रिय थे। हालांकि सरदार पटेल जैसे अपेक्षाकृत अधिक परम्परावादी कांग्रेसी नेताओं ने कभी शेख को भरोसे लायक नही समझा , लेकिन वह नेहरु जी के विश्वासपात्र बनने में सफल रहे थे। इसकी एक वजह शायद यह भी है कि नेहरूजी भी कश्मीरी मूल के थे और कश्मीर में उनकी निजी दिलचस्पी थी।”
” लेकिन जिन्ना के लिए शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों का विशेष उपयोग नही था। इसकी एक वजह यह थी कि शेख अब्दुल्ला जिन्ना के सिद्धांतों और रास्ते पर चलने को तैयार नही थे। दूसरी वजह यह थी कि जिन्ना खुद को व अपनी मुस्लिम लीग को उपमहाद्वीप के मुसलमानों के हितों का एकमात्र मसीहा समझने लगे थे।”
” स्थिति इतनी जटिल थी कि मेरे पिता की जगह समकालीन वास्तविकताओं की कहीं ज्यादा बेहतर समझ रखने वाले व्यक्ति के लिए भी किसी स्पष्ट और शांतिपूर्ण समाधान पर पहुंचना लगभग असंभव ही था। जैसा कि मैंने पहले कहा कि अगर पिताजी पाकिस्तान के पक्ष में फैसला करते तो उस वक्त उत्तरी भारत में फैला साम्प्रदायिक उन्माद रियासत के हिन्दू क्षेत्रों को तबाह कर देता। और अगर पहले ही हिंदुस्तान से जुड़ने का फैसला कर लेते तो पचहत्तर प्रतिशत मुस्लिम आबादी का आक्रोश झेलना पड़ता।’
” पिता जी के साथ संकल्प शक्ति के इस संघर्ष में शेख अब्दुल्ला को बड़ा लाभ यह था कि उन्हें नेहरूजी का पूरा समर्थन प्राप्त था। इसके विपरीत पिता जी केंद्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल और राज्य मंत्रालय से बहुत निकट संपर्क बनाए हुए थे। शेख अब्दुल्ला द्वारा परेशान किये जाने पर सरदार पटेल ने अक्सर पिताजी का साथ दिया और बचाव किया। नेहरू मन्त्रिमण्डल में रियासत के पूर्व प्रधानमंत्री गोपालस्वामी आयंगर भी एक मंत्री थे। क्योंकि उन्हें रियासत के मामलों की गहरी जानकारी थी, अतः कश्मीर मामलों से निपटने के लिए अनेक अवसरों पर उनकी सेवाएं ली गईं। लेकिन सरदार पटेल ने इसका जमकर विरोध किया। उनके पत्राचार के प्रथम खंड में प्रकाशित पत्रों से यह तथ्य उजागर होता है कि एकबारगी तो मामले ने इतना तूल पकड़ लिया कि दोनों बड़े नेताओं सरदार पटेल और नेहरूजी के मतभेद बहुत गहरे हो गए और सरदार पटेल ने अपना त्यागपत्र तैयार कर लिया। हालांकि वो त्यागपत्र उन्होंने नेहरू जी को नही भेजा।”
” अधिग्रहण के समय से पिताजी ने सरदार पटेल से सम्पर्क हमेशा बनाये रखा उनके साथ महत्वपूर्ण मामलों में पत्रव्यवहार करते रहे। उनकी ( पिता जी की ) अप्रसन्नता 31 जनवरी 1948 को लिखे एक लंबे और भावावेशपूर्ण पत्र से जाहिर होती है , ” कभी कभी मुझे लगता है कि मैंने भारतीय संघ से जो अधिग्रहण करार किया है, वो वापस ले लेना चाहिए। वैसे भी संघ ने अंतरिम तौर पर ही अधिग्रहण स्वीकार किया है और अगर भारत सरकार हमारा भूभाग पाकिस्तान से वापस नही ले सकती और अंततः सुरक्षा परिषद के निर्णय से सहमत होने जा रही तो फिर भारतीय संघ से जुड़े रहने से कोई लाभ नही। फिलहाल पाकिस्तान से बेहतर सम्बन्ध सम्भव हों, लेकिन उसका कोई अर्थ नही होगा, क्योंकि अंत में उसकी परिणित यह होनी है कि एक वंश खत्म हो जाएगा तथा रियासत से हिन्दू व सिख खत्म हो जाएंगे।”
” ऐसा लगता है कि नेहरूजी ने रियासत पर बातचीत का जिम्मा सरदार पटेल पर छोड़ दिया था। 29 अप्रेल को हमने सरदार के साथ भी खाना खाया।इस भोज में उनकी पुत्री मणि बेन और निजी सचिव बी शंकर भी मौजूद थे। डिनर के बाद मेरे पिता और सरदार पटेल दूसरे कमरे में चले गए और कयामत वहां बरपा हुई। सरदार ने मेरे पिता को बहुत ही शालीनता से लेकिन दो टूक लहजे में बता दिया कि शेख अब्दुल्ला उनके राज त्याग पर बहुत जोर दे रहे हैं। पर भारत सरकार महसूस करती है कि यदि वे और महारानी कुछ महीनों के लिए रियासत में अनुपस्थित रहें तो यही काफी होगा। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में सक्रियता उठाई मांग से उत्पन्न जटिलताओं को देखते हुए राष्ट्र हित में यह आवश्यक है। इस घटना से मेरे पिता तो हतप्रभ रह गए। हालांकि पिछले कुछ समय से इस तरह की अफवाहें सुनने में आ रहीं थीं कि उन्हें रियासत से बाहर निकाला जा सकता है लेकिन पिताजी को यह उम्मीद कभी भी नही थी कि सरदार पटेल भी उनसे ऎसा करने को कहेंगे।”
” वास्तव में शेख का रुख दिनोदिन दुराग्रही होता जा रहा था। जम्मू के निकट एक सीमावर्ती कस्बे रणवीरसिंह पुरा में अपने भाषण के दौरान उन्होंने जम्मू आंदोलन की उग्र रुप से कटु आलोचना की। साथ ही उन्होंने भारत पर साम्प्रदायिक होने का आरोप भी लगाया और बाकायदा यह धमकी दी कि रियासत के इस विलय को सुनिश्चित और अंतिम न समझा जाये।”
” गर्मियों में हर साल की तरह सरकारी कार्यालय वापस श्रीनगर गए लेकिन राजधानी परिवर्तन से राज्य की स्थिति में कोई फर्क नही आया, बल्कि हालात और बिगड़ते दिखाई दिए। राज्य में अपने प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को तोड़ते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राज्य में प्रवेश किया, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नजरबंदी में रखा गया। इसके कुछ दिनों बाद ही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया। सरकार ने न तो मुझे उनकी बीमारी की कोई सूचना दी थी और न ही उन्हें अस्पताल भेजने की। यहां तक कि उनकी मृत्यु का समाचार भी मुझे अनाधिकृत सूत्रों द्वारा प्राप्त हुआ और वह भी काफी देर से। तब तक उनका शव हवाई जहाज से श्रीनगर से बाहर भेजा जा चुका था। इस बात की खुली चर्चा थी कि डॉ. मुखर्जी स्वाभाविक मौत नही मरे।”
” अब शेख खुलकर भारत सरकार की अवहेलना करने लगे थे। दिल्ली यात्रा का बार बार सुझाव मिलने पर तथा 3 जुलाई को नेहरू जी से ऐसा निमंत्रण मिलने के बावजूद उन्होंने दिल्ली जाकर समूची स्थिति पर बात करने से इनकार कर दिया। कुछ दिनों के लिए मौलाना आजाद भी श्रीनगर आये, लेकिन अवसर का लाभ उठाते हुए उनसे मिलकर मतभेदों को निपटाने की बजाय शेख अब्दुल्ला ने स्पष्टतः उनकी उपेक्षा की। यही नही नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं ने बाकायदा मौलाना का अपमान भी किया। शेख के भाषणों का कटु स्वर दिन पर दिन और भी तीखा होता जा रहा था। अब यह अच्छी तरह स्पष्ट हो चुका था कि वह कश्मीर को स्वतंत्र दर्जा दिलाने की रणनीति पर चल रहे हैं। और यदि ऐसा होता, तो इसका सीधा मतलब था भारत के साथ कश्मीर के विलय को नकारना।”
” इस बार जब मैं नेहरूजी से मिला, तो मैंने उनका रवैया काफी बदला हुआ पाया। उन्होंने शेख का बचाव करने की कोई कोशिश नही की। बल्कि कश्मीर में जैसी स्थिति बनती जा रही थी, उसे लेकर वो भी उतने ही परेशान दिखे, जितना मैं। मैंने उनके समक्ष कोई ठोस प्रस्ताव नही रखे , लेकिन साफ तौर पर यह जरूर बता दिया कि शेख अब्दुल्ला अपना विरोधी रवैया नही छोड़ते हैं, तो हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मैं चलने लगा, तो वो उठे और मुझे छोड़ने दरवाजे तक आये। विदा लेते समय , उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और कहा , फिक्र मत करो, जो भी तुमसे बन पड़े , करो। ”

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।

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