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सपा – बसपा एक बार फिर आमने सामने- राज खन्ना

राज खन्ना

लोकसभा चुनाव के नतीजे 23 मई को आये थे। ठीक एक महीने बाद 23 जून को सपा-बसपा फिर आमने- सामने आ गए। वैसे 3 जून को ही मायावती ने गठबन्धन से किनारा कर लिया था। अखिलेश की नेतृत्व क्षमता पर सवाल भी तभी खड़े कर दिए थे। पर तब सुर धीमे थे। अपने स्वभाव के विपरीत उन्होंने अखिलेश और डिम्पल यादव से बने मधुर निजी रिश्तों कायम रहने की बात सार्वजनिक की थी। गठबन्धन के दरवाजे भी हमेशा के लिए बन्द नही किये थे। लेकिन 20 दिन के अन्तराल पर वह अपनी चिर-परिचित मुद्रा में हैं। पांच महीने की राजनीतिक दोस्ती को भुलाने में उन्होंने देरी नही की । मुलायम सिंह यादव से अपना पुराना हिसाब तेजी से याद किया । सपा और उसकी सरकार के ख़राब कामकाज पर अपने आरोप फिर से दोहराये। नेता बिरोधी दल राम गोविंद चौधरी पर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष एस एन कुशवाहा को सलेमपुर में हरवाने का आरोप लगाया। उन पर कोई कार्यवाई न करने के लिए अखिलेश यादव को आड़े हाथों लिया। हार के बाद सतीश चंद्र मिश्र के कहने पर भी उन्हें फोन करने का शिष्टाचार न दिखाने के लिए भी अखिलेश की खिंचाई की। सपा को गैर यादव पिछड़ा और दलित विरोधी बताया।
गठबन्धन में रहते सपा के मुस्लिम वोट बैंक में मायावती ने हिस्सा बांटा। उसे वह अब अपना बनाना चाहती हैं। इसके लिए जरूरी है सपा से मुसलमानों को दूर करना । आरोप ठोंका कि ध्रुवीकरण की आशंका दिखा अखिलेश ने उन्हें ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने से रोका। फिर जोड़ दिया , ” मैं नही मानी ।”
सपा से गठबंधन में मायावती की बसपा शून्य से दस पर पहुंच गई। पार्टी ने कुल 38 सीटें लड़ी। 24 सीटों पर कड़े मुकाबले में दूसरे स्थान पर थी। इसमे मछलीशहर जैसी सीट भी है, जिसे उसने सिर्फ़181 वोटों के मामूली अन्तर से गंवाया। गाजीपुर में उसके प्रत्याशी ने काफी लोकप्रिय रहे तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा को हरा दिया। योगी मन्त्रिमण्डल के चुनाव लड़ने वाले तीन मंत्रियों में इकलौते मुकुट बिहारी वर्मा अम्बेडकरनगर में हारे। वहां भी बसपा जीती। कम सीटें लड़ कर भी 19.26 फीसद वोट पा कर वह 2014 के प्रदर्शन 19.62 के पास रही। उसकी गठबन्धन सहयोगी सपा 2014 के 22.18 से लुढ़क कर 17.96 फीसद पर पहुंच गई। दिलचस्प है कि इसके बाद भी मायावती सपा पर हमलावर हैं। सीटों से लेकर वोट के आंकड़े चुगली करते रहें। मायावती हमेशा की तरह गठबंधन सहयोगी पर अपने वोट ट्रांसफर होने के अहसान की गठरी लाद रही हैं। हमेशा की ही तरह सहयोगी का वोट न मिलने की शिकायत दोहरा रही हैं।
गठबंधन में बसपा ने क्या पाया ? इस पाने का जबाब सपा के खोने में शामिल है। 2009 के लोकसभा और 2012 के विधानसभा चुनाव नतीजे बसपा के लिए निराशाजनक थे। 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों ने उसे बुरी तरह पस्त कर दिया था। 2019 की चुनौती उसके लिए पहाड़ थी। अब तक बसपा उपचुनाव से दूर रहती रही है। गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में सपा को उसका अपरोक्ष सहयोग उसकी मजबूरी भी थी। पर इस जीत ने सपा की बड़ी हार का रास्ता खोल दिया। मोहक अंकगणित ने अखिलेश यादव की बार-बार मायावती के यहां हाजिरी लगवा दी। लगभग समर्पण की मुद्रा में उन्होंने बसपा से गठबंधन किया । गठबंधन की कवायद से लेकर चुनाव प्रचार के हर फ्रेम में अखिलेश अनुकरण की मुद्रा में थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा की पांच सीट थीं। बसपा का खाता नही खुला था। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा 47 पर थी। बसपा 19 पर। पर हर साझा रैली में सपा और उसके मुखिया जूनियर पार्टनर थे। मैनपुरी रैली में अतिशय शिष्टाचार में मुलायम सिंह यादव की बड़ी शख्सियत मायावती की मौजूदगी में बौनी हो गई। सपा के वोटर ने अपने नेता को बार-बार मायावती के सामने झुकते देखा।
भाजपा की प्रचंड जीत ने दिल्ली की गद्दी का मायावती का सपना भले तोड़ा हो । लेकिन उन्हें फिर से उत्तर प्रदेश की ओर केन्द्रित कर दिया है। उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा घाटा सपा का हुआ है। विरोधी भाजपा ने उसके यादव और अन्य पिछड़ों में सेंध लगाई है। उधर सहयोगी बन कर बसपा ने उसके मुस्लिम वोट का इस बार साथ पाया और आगे अपने पाले में खींच ले जाने का खतरा पैदा कर दिया। भाजपा के सीधे मुकाबले में आने के लिए बसपा चाहेगी कि सपा और कमजोर हो। परिवार की लड़ाई । अखिलेश के 2017 के कांग्रेस और फिर 2019 के बसपा से गठबंधन के असफल परीक्षण। मुलायम सिंह यादव और अन्य अनुभवी नेताओं को हाशिये पर पहुंच जाने। संगठनात्मक और जमीनी कामकाज ठप होने। पहले सरकार और फिर पार्टी की अगुवाई में अपनी चमक खोते अखिलेश में बसपा को अपनी वापसी की उम्मीद दिख रही है। मायावती गैर भाजपाई वोटों पर अकेले कब्जा चाहती हैं। 2022 अभी दूर है। पर प्रदेश विधानसभा की दर्जन भर सीटों के उपचुनाव ने उन्हें ताकत दिखाने का एक मौका दे दिया है।

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।

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