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मोदी सरकार में अमित शाह की राजनीतिक-सर्वोच्चता के मायने – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

लोकसभा चुनाव में स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी की रस्में पूरी हो चुकी हैं और देश की राजनीति ने नई करवटें लेना शुरू कर दिया है। मोदी ने शपथ-विधि के बाद विभागों के बंटवारे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को देश का गृहमंत्री बनाकर सभी नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया है कि अमित शाह उनके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं? मोदी-सरकार के पहले कार्यकाल में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के स्थान पर उनकी नियुक्ति के राजनीतिक-मायने सत्ता के गलियारों में  हलचल पैदा कर रहे हैं। मोदी ने राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्री बनाया है। केन्द्र सरकार के प्रोटोकॉल में भले ही राजनाथसिंह का नाम वरीयता के दूसरे क्रम पर दर्ज हो, लेकिन मोदी की राजनीतिक-वरीयता में अमित शाह सबसे ऊपर हैं। देश की भावी राजनीति की दिशा एवं दशा के लिहाज से मोदी-सरकार में अमित शाह की राजनीतिक-सर्वोच्चता के मायनों को सामान्य तरीके से नहीं पढ़ा जाना चाहिए। राजनीति में राष्ट्रवाद के पैमाने गहरे होंगे और हिन्दुत्व की राजनीति के नए सिरे खुलेंगे।

कांग्रेस के दरबार में पसरी हताशा के बवण्डरों की धूल भले ही अभी शांत नहीं हुई हो, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा के एजेण्डे को पूरा करने के लिए तैयार रोड मैप पर काम शुरू कर दिया है। गृहमंत्री के रूप में अमित शाह की नियुक्ति उसी एजेण्डे को लागू करने की दिशा में उठाया जाने वाला पहला महत्वपूर्ण कदम है।

वैसे भी लोकसभा-चुनाव के अंतिम चरण में मोदी ने विकास की धुरी से परे जाकर अपने चुनाव-प्रचार को हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के जिन अमूर्त मुद्दों की ओर मोड़ दिया था, वो लोगों के जहन में दर्ज हैं। मोदी और शाह इस तथ्य से भलीभांति वाकिफ हैं कि राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के मुद्दों से पैदा गरमाहट आसानी से ठंडी होने वाली नहीं है। इस आंच का सामना करने के लिए विशेष प्रयासों की जरूरत होगी। प्रधानमंत्री मोदी के शपथ-विधि समारोह में बंगाल के राजनीतिक-दंगों में मारे गए चौवन भाजपा कार्यकर्ताओं के परिजनों को बुलाया जाना इन्हीं प्रयासों का हिस्सा है। ये प्रयास बंगाल में हिंदुत्व के विस्तार को उत्प्रेरित करते हैं।

केन्द्र-सरकार के गृहमंत्री के रूप में अमित शाह की पहली परीक्षा बंगाल में ही होने वाली है। भाजपा और तृणूल कांग्रेस के रिश्तों में तल्खियां दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। कोलकाता अभी शांत नहीं है और घटनाक्रम कह रहे हैं कि यह आग ज्यादा सुलगने वाली है। चुनाव अभियान में मोदी-अमित शाह और ममता बैनर्जी ने एक-दूसरे पर नामजद हमले किए हैं। चुनाव के दरम्यान बंगाल में पनपी कटुता का आलम यह है कि भाजपा और टीएमसी के कार्यकर्ता आज भी आमने-सामने हैं। गौरतलब यह है कि बंगाल सरकार ने खुद अमित शाह के खिलाफ पुलिस में एक मामला दर्ज कर रखा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि केन्द्रीय गृहमंत्री के रूप में अमित शाह बंगाल में कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों का आकलन कैसे करेंगे?

भाजपा चुनाव के दौरान ध्वस्त कानून-व्यवस्था के नाम पर ममता-सरकार को भंग करके बंगाल में राष्ट्रपति-शासन लागू करने की मांग पहले ही कर चुकी है। गृहमंत्री के रूप में बंगाल के राजनीतिक-दंगों से निपटना अमित शाह के सामने पहली बड़ी चुनौती है। लोकतंत्र में ऐसे मसलों से निपटने के अपने कायदे होते हैं। तटस्थ होने से ज्यादा तटस्थ दिखना लोकतांत्रिक राजनीति की बुनियादी जरूरत होती है। लोग बंगाल के मसले को दिलचस्पी के साथ देखेंगे कि यहां अमित शाह कैसे और क्या फैसला लेते हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान बंगाल में टीएमसी और भाजपा की लड़ाई ने नए आयाम अख्तियार कर लिए हैं। बंगाल सीपीएम का गढ़ रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में बंगाल में जीत दर्ज करके भाजपा नए इतिहास का सूत्रपात करना चाहेगी।

अमित शाह की भूमिका सिर्फ बंगाल के मामले में ही कसौटी पर नहीं है। जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और आर्टीकल 35-ए जैसे विवादास्पद मसले भी उन्हीं के मंत्रालय से जुड़े हैं। धारा 370 और 35-ए को हटाने का एजेण्डा काफी पुराना है। अब मोदी-सरकार के सामने यह बहाना नहीं है कि संसद में बहुमत उसके साथ नहीं है। इसके अलावा नार्थ-ईस्ट में एनआरसी के बाद रोहिंग्या घुसपैठियों के मुद्दे पर भी सरकार की सख्ती का आकलन लोग करेंगे। उन्हें लगता है कि अमित शाह की वजह से आतंकवाद पर भारत का रुख अधिक कड़ा होगा। नक्सलियों का मसला भी सरकार के सामने है और घरेलू-सुरक्षा के मामले पर लोग अक्सर परेशान होते रहते हैं। देखना यह है कि राजनीति की कौन सी जादू की छड़ी से अमित शाह इन मसलों को निपटाएंगे?

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एनं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह आलेख सुबह सवेरे के 01 जून के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह सम्पादक भी रह चुके है।

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