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सामने मोदी ; फिर मुश्किल तो है ! – राज खन्ना

राज खन्ना

चाहें तो 11 मार्च 2017 का कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का ट्वीट याद कर लीजिए। तब यू पी विधानसभा में भाजपा की जबरदस्त जीत के बाद उमर ने कहा था , ” चलिए 2019 भूलिए। 2024 से उम्मीद की जाए ।” इस ट्वीट के बाद उमर खामोश नही बैठे थे। बाकी विपक्ष ने भी मोदी को उखाड़ फेंकने में कोई कसर नही रखी थी। पर नतीजों ने उमर को सच साबित किया।
विपक्ष ने हारकर भी जो नही किया। मोदी ने जीतने पर भी वह सब कुछ किया। 2014 की जीत के साथ उनकी 2019 की तैयारी शुरू हो गई। और 2019 का प्रचार खामोश होते ही केदारनाथ की गुफा के सन्नाटे में ध्यान लगाए उनकी खामोश तस्वीरें जोर-जोर से 2024 का संदेश देने लगी। विपक्ष उन्हें लगातार जुमलेबाज बताता रहा। क्या गलत है ? जुमलेबाजी में यकीनन वह बेजोड़। पर विपक्ष ने उन्हें केवल इतना ही आंका। यही उसकी आत्मघाती चूक थी। वह जीत गए सिर्फ इसलिए नही । पर उनकी सफलता और विपक्ष की विफलता की तह में जाना है तो एक की ताकत तो दूसरे की कमजोरी की ईमानदार पड़ताल करनी होगी। कौन इनकार कर सकता है कि 2019 के रण मे मोदी के तरकश में सिर्फ बातों के तीर नही थे । उन्होंने विरोधियों पर प्रहार में कोई रियायत नही की लेकिन वह खुद बहुत कुछ कर चुके हैं, इसका मतदाताओं को यकीन दिलाने में सफल रहे। अपने इस काम के हवाले से उन्होंने अगले पांच साल मांगे और मतदाताओं ने उनकी झोली भर दी।
यह पहली बार नही हुआ है। कई चुनावों में बार-बार हुआ है। नेहरु दौर के बाद बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स खात्मे के बाद इंदिरा जी गरीबी हटाओ नारे के साथ 1971 में मतदाताओं के बीच पहुंची थीं। बांग्लादेश देश की जीत का मुकुट भी सिर पर सजा था। मुकाबले में कांग्रेस (संगठन), जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और समाजवादियों का इंदिरा हटाओ महागठबंधन था। कांग्रेस ने पलटवार में कहा था , ” हम कहते हैं कि गरीबी हटाओ। वे कहते इंदिरा हटाओ ।” इस चुनाव में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बैलों की जोड़ी चुनाव आयोग ने फ्रीज कर कर दिया था। गाय-बछड़ा इंदिरा कांग्रेस का निशान था। हासिल सीटें 351 थीं। इमरजेंसी की ज्यादतियों से उन्ही इंदिरा से नाराज मतदाता ने 1977 में उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया कर दिया था। खुद इंदिरा जी को भी रायबरेली से हरा दिया था। साफसुथरी छवि और इंदिरा जी की हत्या की सहानभूति लहर पर सवार 1984 के राजीव गांधी और उनकी 415 सीटों को भी याद कर सकते हैं। इंदिरा जी की 1971 और 1980 की वापसी के बीच 1977 की करारी पराजय थी। राजीव गांधी की 1984 जीत के बाद 1989 की हार थी।
मोदी ने साबित किया कि वह जीत को दोहरा सकते हैं। पहले से बड़ी जीत के साथ उनकी वापसी को अगर विरोधी कम कर आंकेंगे तो फ़िर चूकेंगे। इस चुनाव में वह नाम और काम दोनों के साथ मैदान में उतरे। देश के चुनावों से जुड़े इस मिथ को वह तोड़ने में सफल रहे कि काम का कोई दाम नही । उन्होंने कमजोर वर्गों के बीच योजनाओं का लाभ पहुंचाया और बढ़-चढ़ कर उसका खूब प्रचार किया। वैदेशिक मोर्चे पर अपनी कामयाबी और पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक को उन्होंने खूब भुनाया। विपक्षियों के प्रहार को अपना हथियार बनाया और पलटवार में उन्होंने पद की गरिमा से खिलवाड़ के आरोपों को ठेंगे पर रखा। बाजपेई-आडवाणी के दौर की भाजपा को वह बहुत पीछे छोड़ चुके हैं और फ़िलहाल उनका कद पार्टी से बड़ा है। पार्टी उनके इशारों पर चलती रहे लेकिन अकेले अपने बड़े कद के भरोसे अनुकूल चुनाव नतीजों की उन्होंने उम्मीद नही लगाई। उन्होंने अपने विश्वस्त अध्यक्ष अमित शाह के जरिये पार्टी के विस्तार और उसकी संगठनात्मक मजबूती की कोशिशों को लगातार जारी रखा। सत्ता, संगठन और तकनीक के जोड़ के साथ उनकी और शाह की रणनीति विपक्षियों की काट और खुद को मजबूत करने की रही। वह जीत के संकल्प के साथ अनथक श्रम करते रहे और इस जीत के लिए उन्हें कोई प्रहार करने या फिर उसका सामना करने से परहेज़ नही रहा।
विपक्ष कहाँ चूका ? ऐसा नही 2014 के बाद उसे उम्मीदों की रोशनी नही मिली । दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की एकतरफ़ा कामयाबी भाजपा के लिए बड़ा झटका थी। पर जीत से आत्ममुग्ध केजरीवाल और उनकी पार्टी जल्दी ही अपनी गंभीरता खो बैठे । बिहार में लालू-नीतीश के गठबंधन की जबरदस्त कामयाबी ने भी मोदी की छवि को क्षति पहुंचाई थी। पर कम अरसे में ही नीतीश को एक बार फिर अपने पाले में करके उन्होंने बाजी पलटी। गोवा, मणिपुर के विपरीत नतीजों के बीच भी उन्होंने अपनी सरकारें बना लीं। गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तगड़ी चुनौती और सीटों की क्षति के बाद पार्टी वहाँ फिर से मजबूती हासिल करने के लिए जुटी। कर्नाटक की हार के बाद लोकसभा के लिए नई रणनीति पर काम शुरू किया। पहले पंजाब फिर जे डी एस के साथ कर्नाटक में सरकार और चंद महीनों पहले छतीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में अपनी जीत के संदेश ने कांग्रेस का हौसला बढ़ाया। इस जीत में उसने 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी की विदाई का संदेश पढ़ा। पार्टी को भरोसा हुआ कि मोदी सरकार की नाकामियां उसकी वापसी के लिए काफ़ी होंगी।

विपक्ष की ओर से मोदी के खिलाफ़ एकजुट गठबंधन की कोशिशें भी कम नही हुईं। पर क्षेत्रीय ताकतों की पीएम की कुर्सी की चाहत और चेहरे के तौर पर राहुल को अस्वीकार करने के कारण किसी राज्य में बात बनी तो कही नही। कुल मिला कर मोदी के मुकाबले कोई चेहरा नही था। गैर भाजपाई दल मान कर चल रहे थे कि भाजपा-एन डी ए बहुमत से दूर रहेगा और वे चुनाव बाद गठबन्धन बना सत्ता हासिल कर लेंगे। विपक्ष जातीय गठबन्धन की ताकत को लेकर भी चूका। सबसे ज्यादा सीटों वाले बिहार और यू पी इसके गवाह बने। बिहार में भाजपा विरोधी गठबन्धन को सजा काट रहे लालू की दागी छवि का भी नुकसान हुआ। 25 साल की दुश्मनी बाद मोदी को हराने के लिए दोस्त हुए बसपा-सपा के साथ को भी मतदाताओं ने खारिज किया। मोदी विपक्षी की तुलना में बड़ी लकीर खींचते हैं। उनकी विकास योजनाओं ने जातियों की गोलबंदी में बिखराव किया है। उन्होंने मंदिर आंदोलन की राख में चिंगारियों की तलाश की जगह पुलवामा और बालाकोट की भठ्ठी पर राष्ट्रवाद की आग को तेज किया। 2014 की जीत के साथ उन्होंने सेकुरिलज्म के फ़िकरे को बेमानी कर दिया। 2019 के सफ़र के बीच विपक्षियों को भी इससे तौबा कराके मंदिरों के चक्कर लगवा दिए। विपक्ष को अपने मैदान में खींच लाये और लड़ाई का एजेंडा खुद तय कर दिया। आम आदमी के बीच वह संदेश देने में सफल रहे कि वह देश की सरकार चुनने जा रहा है। मजबूर नही मजबूत सरकार का उनका नारा चल निकला। राहुल के चौकीदार चोर के नारे और अनिल अंबानी को तीस हजार करोड़ देने के आरोप लोगों ने नापसंद किये। उनके बहत्तर हजार की दूर की कौड़ी की जगह लोगों को दो-दो हजार की किस्तें, उज्ज्वला के सिलिंडर और सिर की छत खूब भायी। निचले स्तर के भ्रष्टाचार से आजिज़ लोगों की उम्मीदें मोदी ने कायम रखी हैं। उन्हें बहुमत देने वालों ने माना कि मोदी है तो मुमकिन है। विपक्ष को भी संदेश दिया । सामने मोदी , फिर मुश्किल तो है !

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।

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