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मोदी-ममता के ‘पावर-प्ले’ में हिंसा ने लोकतंत्र को ‘आउट’ किया – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

हिन्द महासागर के पूर्वोत्तर में दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी बंगाल की खाड़ी के शीर्ष तट से 180 किलोमीटर दूर हुगली नदी के किनारे बसे कलकत्ता में लोकसभा चुनाव के दरम्यान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी के बीच जारी वाक्-युध्द काग-युध्द में तब्दील हो चुका है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच चुनावी जंग की हालिया घटनाएं भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नही हैं।

बंगाल के चुनाव में जीतने की भाजपा की अतिवादी कोशिशें उन गणनाओं और राजनीतिक विश्‍लेषणों की देन है, जो यह बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश सहित अन्य हिंदी-राज्यों में भाजपा की सीटों में उल्लेखनीय गिरावट आने वाली है। मोदी और अमित शाह बंगाल और उड़ीसा जैसे राज्यों में भाजपा का परचम फहराकर सीटों की क्षतिपूर्ति करना चाहते हैं। मोदी-अमित शाह को लगता है कि बंगाल की आधी से ज्यादा सीटों पर भाजपा की फतह प्रधानमंत्री के रूप में जंहा उनका भविष्य सुनिश्‍चित कर सकती हैं, वहीं टीएमसी की ’बम्पर-विक्ट्री’ ममता बेनर्जी को भी प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में उनके समानान्तर खड़ी कर सकती हैं। भाजपा बंगाल में कम से कम 23 सीटें जीतना चाहती है, जबकि ममता बेनर्जी 40 सीटें हांसिल करके राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर अपना आदमकद कट-आउट दर्ज करना चाहती हैं।

ममता को पछाड़ने के लिए ही भाजपा उप्र की तुलना में बंगाल में ज्यादा संसाधनों को झोंक रही है। उप्र की पुरानी सांप्रदायिक रणनीति के आधार पर भाजपा हिन्दू-मुसलमानों को बांट कर वोट बटोरना चाहती है। इसीलिए मोदी और अमित शाह की हर रैली और हर सभा में जय श्रीराम का नारा गूंज रहा है। मोदी ने ममता बेनर्जी की टीम के मनोबल को तोड़ने के लिए केन्द्र की सभी एजेंसियों को काफी पहले ही सक्रिय कर दिया था। लेकिन ममता ने जिस आक्रामक तरीके से प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को जवाब दिया, वह चौंकाने वाला हैं। ममता का प्रति-उत्तर भाजपा की उम्मीदों के विपरीत था। चुनावी-हिंसा की एक वजह ममता का उग्र जवाब भी है। उल्लेखनीय है कि भाजपा के अनुरोध पर केन्द्रीय चुनाव आयोग ने बंगाल में चुनाव व्यवस्था के सुरक्षित संचालन के लिए सीआरपीएफ के हवाले कर दिया है। भाजपा को शिकायत थी कि बंगाल-पुलिस ’बूथ-केप्चरिंग’ में टीएमसी के कार्यकर्ताओं की मदद कर रही है।

सियासत की अलग-अलग तासीर और जुदा माहौल में यह मुल्क 16 लोकसभा चुनाव देख चुका है। पड़ोसी मुल्कों से युद्ध जीतने और हारने के बाद इस मुल्क में चुनाव हुए, आपातकाल के साये में डरे-बिखरे नेताओं और पार्टियों ने चुनाव लड़े, चुनाव में लोगो ने कांग्रेस और गैर-कांग्रेसी सरकारों का आवागमन देखा, गठबंधन सरकारों की जय-पराजय के कटु अनुभवों के साथ लोकतंत्र जनता की अदालत में हाजिर हुआ, अल्पमत सरकार की मजबूरियों और बहुमत सरकारों की मदान्धता के पहले और बाद, हर परिस्थितियों में राजनीति की अलग-अलग दलीलों और अपीलों के साथ लाल-पीले, सफेद-हरे रंगो में देश ने चुनाव लड़े हैं और सरकारे बनाईं हैं। लेकिन राजनीतिक-कटुता का जो माहौल में सत्रहवें लोकसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है, वह अभूतपूर्व है।

इस मर्तबा चुनाव की राजनीतिक- फिजाओं में जहर घुला हुआ है। शब्दों के मायने बदल गए हैं और भाषा अपना आपा खो चुकी है। इसके मूल में नरेन्द्र मोदी की जिद है कि उन्हे हर हाल में दुबारा प्रधानमंत्री बनना है। उनकी इस चाहत ने राजनीति से नीति को काट दिया है। राज करने की उनकी लालसा ने उन्हें उन अंधी गलियों में ढकेल दिया है, जहां लोकतंत्र के चिराग नाकाम हो जाते हैं। वह मान रहे हैं कि ’प्यार और युध्द’ की तरह चुनाव में भी हर चीज जायज है। मोदी की इसी थीसिस की वजह से लोकसभा के वर्तमान चुनाव लोकतांत्रिक मापदंडों की सबसे निचली पायदान पर खड़े हैं। देश के सर्वोच्च लीडर होने के नाते लोकतंत्र के लिए आदर्श मिसाल पेश करने में वो असफल रहे हैं। यहां राहुल गांधी का लोकसभा में दिया हुआ वह भाषण प्रासंगिक लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनके साथी अमित शाह के लिए खुद को सत्ता से बाहर देखने की कल्पनाओं से सिहर उठते हैं।

अभी तक, सोलह लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्रियो का बनना-बिगड़ना और राजनीतिक दलों के बीच सत्ता-हस्तांतरण की शांत, उदात्त परम्पराओं ने भारत के लोकतंत्र को गौरवान्वित किया है। लेकिन सत्रहवें लोकसभा चुनाव के दरम्यान पहली बार किसी राजनीतिक अनहोनी के अंदेशे में देश दहशताजदा है। बंगाल के पावर-प्ले में  हिंसक राजनीति ने लोकतंत्र की मर्यादाओं का मैदान से बाहर कर दिया है।

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एनं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह आलेख सुबह सवेरे के 16 मई के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह सम्पादक भी रह चुके है।

 

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