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उज्जैन में बलाई समाज की नाराजी को क्या कांग्रेस भुना पायेगी – अरुण पटेल

अरूण पटेल

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित उज्जैन लोकसभा सीट भाजपा का मजबूत गढ़ रही है और केवल 2009 में कांग्रेस के प्रेमचंद गुड्डू ने इसमें सेंध लगाकर मात्र 15 हजार 841 मतों के अन्तर से जीत दर्ज की थी। उस समय भी यह कांग्रेस या गुड्डू की जीत नहीं बल्कि भाजपा के दलित चेहरे और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सत्यनारायण जटिया की पराजय मानी गयी थी क्योंकि लम्बे समय से एक ही चेहरे के कारण मतदाता चेहरा बदलने के मूड में थे। हालांकि अब प्रेमचंद गुड्डू भाजपा में चले गये हैं लेकिन इससे कोई विशेष अंतर इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि वे हाल के विधानसभा चुनाव में अपने बेटे अजीत बोरासी को भाजपा टिकट पर विधायक नहीं बनवा पाये। भाजपा ने सांसद चिन्तामणि मालवीय का टिकट काट कर बलाई समाज को नाराज कर लिया है और उन्होंने अनिल फिरोजिया को चुनाव मैदान में उतारा जो कि हाल के विधानसभा चुनाव में तराना से चुनाव हारे चुके हैं।

कांग्रेस ने बलाई समाज के बाबूलाल मालवीय को इस उम्मीद में टिकट थमाकर चुनाव मैदान में उतारा है कि वे बलाई समाज के हैं, इस संसदीय क्षेत्र में लगभग डेढ़ लाख बलाई वोट हैं। बलाई समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज परमार ने प्रो. चिन्तामणि मालवीय का टिकट काटना बलाई समाज का अपमान निरुपित करते हुए कहा कि इसे समाज नहीं भूलेगा, समाज का विरोध अनिल फिरोजिया की उम्मीदवारी को लेकर भी है। अनिल फिरोजिया भाजपा विधायक रहे भूरेलाल फिरोजिया के बेटे हैं। महाकाल की नगरी उज्जैन द्वाद्वश ज्योतिर्लिंगों में से एक है, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने यहां पूजा-अर्चना कर एक अघोषित छोटा रोड-शो भी किया है ताकि इसका लाभ कांग्रेस उम्मीदवार को मिल सके। उज्जैन के बारे में एक किवदंती है कि कोई भी राजा यहां महाकाल की नगरी में रात को नहीं रुकता। लोकतंत्र में मुख्यमंत्री ही राजा होता है और शिवराज सिंह चौहान भी 13 साल मुख्यमंत्री रहने के बावजूद एक भी रात यहां नहीं रुके। सिंहस्थ के बारे में कहा जाता है कि जो भी सरकार सिंहस्थ का आयोजन करती है उसकी बाद में बिदाई हो जाती है। संविद सरकार के कार्यकाल में ठाकुर गोविंदनारायण सिंह के मुख्यमंत्री रहते सिंहस्थ का आयोजन हुआ और उनकी सरकार का पतन हो गया। बाद में कांग्रेस के श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने। 2004 में उमा भारती ने सिंहस्थ का आयोजन कराया और उन्हें भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा तथा बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बन गये। 2016 में शिवराज ने सिंहस्थ कराया तो बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने अपना कार्यकाल तो पूरा कर लिया लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा सरकार की विदाई हो गई। प्रो. चिन्तामणि अपनी विवादास्पद टिप्पणियों के लिए हमेशा चर्चाओं में बने रहे और अन्त में उन्हें अपनी टिकट से हाथ धोना पड़ा।

प्रियंका गांधी के बाद तराना में राहुल गांधी ने रैली की है और तराना ही भाजपा उम्मीदवार का गृह क्षेत्र भी है इसलिए कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल के आने से यहां कांग्रेस की पकड़ मजबूत होगी। उज्जैन में कांग्रेस की असली समस्या गुटबंदी रही है उसने अपना उम्मीदवार पूर्व मंत्री रहे बाबूलाल मालवीय को बनाया है। सभी गुटों को वे साधने की कोशिश कर रहे हैं ताकि अपनी चुनावी संभावनाओं को बेहतर बना सकें, लेकिन इस क्षेत्र की तासीर लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए हमेशा फायदेमंद मानी जाती है। जहां तक 1989 से हुए आठ लोकसभाचुनावों का सवाल है तो उसमें से सात बार भाजपा उम्मीदवार जीते हैं और इनमें भी सबसे लम्बी पारी डॉ. जटिया की रही है। 2014 का लोकसभा चुनाव प्रो. चिन्तामणि मालवीय ने कांग्रेस के प्रेमचंद्र गुड्डू को 3 लाख 9 हजार 663 मतों के भारी अन्तर से पराजित कर जीता था, उस समय देश में प्रचंड मोदी लहर चल रही थी। हाल के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में कुछ चुनावी समीकरण बदला है तथा आठ विधानसभा क्षेत्रों में से पांच पर कांग्रेस और तीन पर भाजपा विधायक हैं। यदि विधानसभा चुनाव के नतीजों को आधार माना जाए तो भाजपा की भारी बढ़त अब घटकर केवल 69 हजार 922 रह गयी है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बलाई समाज का उम्मीदवार उतार कर वह इस अन्तर को पाट सकती है लेकिन 23 मई को ही यह पता चल सकेगा कि कांग्रेस बलाई समाज की नाराजी को भुनाकर उज्जैन में अपनी जीत का परचम लहरा पाती है या नहीं।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।

 

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