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खंडवा में बराबरी की टक्कर तो खरगोन को आसान मान बैठी कांग्रेस – अरुण पटेल

अरूण पटेल

निमाड़ के दो जिले पूर्व में दो अलग-अलग घटकों में रहे हैं। खंडवा और बुरहानपुर पुराने मध्यप्रदेश यानी सीपी एण्ड बरार का हिस्सा रहा तो खरगोन होल्कर स्टेट का हिस्सा रहा। नये मध्यप्रदेश के गठन के बाद महाकौशल का हिस्सा रहा खंडवा जिला और मध्यभारत का हिस्सा रहा खरगोन अब मालवा और मध्यभारत की ही राजनीति से प्रभावित होने लगे हैं।पहले एक की राजनीति महाकौशल की धारा के अनुसार चलती थी तो दूसरे की इंदौर से प्रभावित होती थी। खंडवा लोकसभा सीट कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रही है क्योंकि यह पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान दोनों का ही क्षेत्र है। लम्बे समय तक खंडवा लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले चौहान को 2009 के लोकसभा चुनाव में अरुण यादव ने शिकस्त दी और वे कुछ समय के लिए केंद्रीय मंत्री भी रहे उसके बाद उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। यह एक संयोग ही है कि 2013 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर संगठनात्मक बदलाव के तहत दोनों के हाथ से अध्यक्ष का पद फिसल गया। यह अलग बात है कि अरुण यादव के उत्तराधिकारी के रुप में चुने गये कमलनाथ आज प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं तो राकेश सिंह के अध्यक्ष रहते हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथ से सत्ता फिसल गयी। खरगोन लोकसभा क्षेत्र 2008 से अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गया है। इस क्षेत्र पर कांग्रेस और भाजपा की लगभग समान पकड़ रही है तथा दोनों ही दल यहां से लोकसभा चुनाव जीतते रहे हैं।

खंडवा लोकसभा क्षेत्र में 2014 की मोदी लहर में नंदकुमार सिंह चौहान ने कांग्रेस के अरुण यादव को 2 लाख 59 हजार 714 मतों के भारी अन्तर से पराजित किया। चौहान को 57.5 प्रतिशत यानी 7 लाख 17 हजार 357 और यादव को 36.40 प्रतिशत यानी 4 लाख 57 हजार 643 मत मिले। आठों विधानसभा क्षेत्रों में अरुण यादव पर चौहान ने भारी बढ़त ली। हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में यहां का राजनीतिक परिदृश्य लगभग पूरी तरह से बदल गया और तीन क्षेत्रों में भाजपा तथा 4 क्षेत्रों में कांग्रेस जबकि एक में निर्दलीय उम्मीदवार सफल रहा। निर्दलीय ठाकुर सुरेंद्र सिंह हालांकि कमलनाथ सरकार का समर्थन कर रहे हैं लेकिन गाहे-बगाहे वे विद्रोही तेवर भी दिखाते रहते हैं। इस प्रकार इस लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस एवं भाजपा के बीच दिलचस्प एवं कड़ा मुकाबला होने की संभावना है। भले ही भाजपा के विधायकों की संख्या तीन हो लेकिन बागली, खंडवा, पंधाना और नेपानगर क्षेत्र में भाजपा की मजबूत पकड़ रही है। जीत-हार का फैसला इस बात पर भी हो सकता है कि इस चुनाव में निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह अंतत: किसका समर्थन करते हैं।

खरगोन लोकसभा क्षेत्र में 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा के सुभाष पटेल ने कांग्रेस के रमेश पटेल को 2 लाख 57 हजार 789 मतों के अन्तर से पराजित कर जीता था। सुभाष पटेल को 56.34 प्रतिशत यानी 6 लाख 49 हजार 354 मत मिले थे जबकि कांग्रेस के रमेश पटेल को 33.97 प्रतिशत यानी 3 लाख 91 हजार 475 मत मिले थे। आठों विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को यहां भारी बढ़त मिली थी, लेकिन हाल के विधानसभा चुनाव में यहां का परिदृश्य काफी बदल गया और कांग्रेस को लगभग एकतरफा जीत हासिल हुई। 6 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के विधायक जीते हैं जबकि एक पर निर्दनीय केदार डाबर और एक पर भाजपा उम्मीदवार ने जीत दर्ज कराई। निर्दलीय केदार डाबर कांग्रेस पार्टी के ही विद्रोही थे और कांग्रेस को ही समर्थन दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव नतीजों को देखते हुए यहां कांग्रेस का पलड़ा भाजपा की तुलना में काफी भारी नजर आ रहा है। खरगोन लोकसभा क्षेत्र में एक तो कांग्रेस की ताकत बढ़ी हुई है और दूसरे डॉ. विजयलक्ष्मी साधो और सचिन यादव कमलनाथ सरकार में महत्वपूर्ण विभागों के केबिनेट मंत्री हैं। इसके साथ ही बाला बच्चन एक तो मुख्यमंत्री कमलनाथ के सबसे नजदीकी नेता हैं और दूसरे वे भी कमलनाथ सरकार में गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग के साथ ही मुख्यमंत्री से सम्बद्ध विभागों की केबिनेट मंत्री भी हैं। इस प्रकार इस क्षेत्र से तीन केबिनेट मंत्री हैं।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।

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