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मध्यभारत, मालवा-निमाड़ ने भाजपा व विंध्य ने कांग्रेस को किया निराश – अरुण पटेल

अरूण पटेल

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ हमेशा निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की राजनीति को कलाकारी की राजनीति कहते रहे हैं। उन्होंने अपनी राजनीतिक बिसात से शिवराज की इस राजनीतिक धारा को पीछे छोड़ते हुए डेढ़ दशक बाद कांग्रेस को वनवास से मुक्ति दिलाने के साथ ही सत्ता साकेत में विचरण का मौका दिया है। पन्द्रह साल बाद 17 दिसम्बर को अपरान्ह प्रादेशिक फलक पर कांग्रेस की तिरंगी सत्ता का सूर्योदय होने जा रहा है। महाकोशल अंचल से पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र के बाद कमलनाथ ऐसे दूसरे नेता हैं जो मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे हैं। नेतृत्व शून्यता के जिस दंश को लम्बे अरसे से यह अंचल झेलता रहा है वह 51 साल बाद समाप्त हुआ। कांग्रेस के लिए चुनावी लड़ाई करो या मरो की थी और यदि इस बार वह सरकार बनाने में विफल रहती तो फिर आने वाला समय कांग्रेसी राजनीति को धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर भी ले जा सकता था। कांग्रेस की सत्ता में वापसी का अहम् किरदार पर्दे के पीछे रहकर दिग्विजय सिंह ने अदा किया तो वहीं मैदान में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के दो चेहरे थे। इन तीनों की जुगलबंदी ने उस धारणा को तोड़ दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, शिवराज के आभामंडल के चलते चौथी बार सरकार बना लेंगे। मतदाता ने जो चमत्कार किया उसमें उसने न तो कांग्रेस को जीत पर इठलाने का मौका दिया और न ही शिवराज को पूरी तरह वैसी निराशा में धकेल दिया जैसा कि छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने डॉ. रमनसिंह के साथ किया। मध्यप्रदेश में यह कहा जा सकता है कि मतदाता ने प्याले में जो काफी बना कर रखी थी वह कांग्रेस के होठों तक पहुंच गयी और भाजपा से केवल इतनी दूरी बनी जितनी काफी के प्याले व होठों के बीच होती है। मध्यप्रदेश के विभिन्न अंचलों की तासीर अलग-अलग नतीजे देती आई है। इस चुनाव में भी ग्वालियर-चंबल संभाग, मालवा-निमाड और मध्यभारत ने भाजपा को एवं विंध्य अंचल ने कांग्रेस को निराश किया।

भाजपा ने मध्यप्रदेश में 200 प्लस का नारा दिया था लेकिन वह बमुश्किल 100 का आंकड़ा ही पार कर पाई और कांग्रेस ने 121 प्लस का लक्ष्य लेकर चुनाव लड़ा था जबकि वह अपने लक्ष्य से महज 7 सीट पीछे रही, लेकिन यह आंकड़ा उसने निर्दलियों, बसपा और सपा का समर्थन प्राप्त कर पूरा कर लिया। भाजपा अपने लक्ष्य से 91 सीट पीछे रही और उसके पास विधानसभा में जो 165 विधायक थे उनमें 56 विधायकों की कमी आई, जबकि कांग्रेस जिसके विधायकों संख्या 57 थी वह दुगुनी हो गयी। वैसे जो चार निर्दलीय विधायक विजयी हुए वे चारों ही कांग्रेस के विद्रोही थे जिन्हें पार्टी ने टिकट के लायक नहीं समझा था और अंतत: उनके सहारे ही कांग्रेस के सत्तासीन होने का रास्ता खुला। लम्बे समय से बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी सहित कुछ क्षेत्रीय दलों की यह ख्वाहिश थी कि वे मध्यप्रदेश के राजनीतिक फलक पर तीसरी शक्ति के रुप में उभरें वह तो पूरी नहीं हुई लेकिन कांग्रेस की सरकार बनवाने में उनका भी योगदान रहा। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी न तो किंग बन पाये और न ही किंग मेकर, जोगी दम्पत्ति तो चुनाव जीत गये लेकिन बसपा के चुनाव चिन्ह पर उनकी पुत्रवधु चुनाव हार गयीं। दोनों ही राज्यों में खराब प्रदर्शन के चलते मायावती ने पार्टी अध्यक्षों को बदल दिया। अजीत जोगी का गठबंधन जहां सरकार बनाने का सपना देख रहा था वहां उसके महागठबंधन को केवल सात सीटें ही मिल पाई। छत्तीसगढ़ में अमित शाह ने 65 प्लस का नारा दिया था लेकिन भाजपा 15 पर सिमट गयी जबकि कांग्रेस भाजपा के लक्ष्य से आगे निकल गयी और उसने 68 सीटें जीत लीं। भाजपा ने मध्यप्रदेश में जो 200 प्लस का नारा दिया था वह राजस्थान और छत्तीसगढ़ को मिलाकर पूरा हुआ और तीनों राज्यों में उसके 202 विधायक चुने गये।

चम्बल-ग्वालियर संभाग में कांग्रेस को आशातीत सफलता मिली और इस अंचल ने भाजपा को निराश किया। यहां कुल 34 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से कांग्रेस ने 25 सीटें जीतीं जो कि 2013 के चुनाव से 12 अधिक हैं। भाजपा को यहां महज 8 सीटें ही मिलीं जो 2013 से 12 सीटें कम हैं। इस इलाके में भाजपा के अनेक दिग्गज नेता हैं जिनमें केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, अनूप मिश्रा, प्रभात झा, डॉ. नरोत्तम मिश्रा, यशोधराराजे सिंधिया आदि शामिल हैं, जबकि यहां कांग्रेस के पास दो ही बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह हैं। महाकोशल अंचल में 49 सीटें हैं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह इसी अंचल के हैं। यहां कांग्रेस को 28 और भाजपा को 19 सीटें मिली हैं। 2013 में कांग्रेस को यहां 14 सीटें मिली थीं जो कि कमलनाथ के प्रभाव के चलते इस बार दोगुनी हो गयीं तो वहीं दूसरी ओर राकेश सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा की सीटों में बढ़ोत्तरी की जगह कमी आ गयी। महाकोशल को संभालने के उद्देश्य से राकेश सिंह अध्यक्ष तो बन गये लेकिन वे कोई करिश्मा नहीं दिखा पाये। अब कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह संभावना बलवती हो रही है कि कांग्रेस इस अंचल में आगे चलकर फिर अपना वह दबदबा बना पायेगी जो 80 के दशक तक रहा था।

विंध्य क्षेत्र में कुल 30 सीटें हैं और पिछली विधानसभा में कांग्रेस के 12 विधायक चुने गये थे। इस बार इस अंचल से कांग्रेस को सबसे अधिक उम्मीदें थीं लेकिन यहीं उससे सबसे ज्यादा निराशा हाथ लगी, यहां तक कि नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह भी अपनी चुरहट की परम्परागत सीट नहीं बचा पाये। विंध्य व बुंदेलखंड को मिलाकर कुल 56 सीटें हैं और इस चुनाव में भाजपा को यहां 39 और कांग्रेस को 15 सीटें मिलीं। बुंदेलखंड में कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि यहां वरिष्ठ कांग्रेस विधायक मुकेश नायक चुनाव हार गये। विंध्य अंचल में 30 सीटें आती हैं यहीं कांग्रेस को धीरे से जोर का झटका लगा और विधानसभा के उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह तथा वरिष्ठ विधायक सुंदरलाल तिवारी भी अपनी सीट नहीं बचा पाये। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इन दोनों अंचलों में कुल 36 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस के हिस्से में 18 सीटें आई थीं। आंकड़ों के हिसाब से तो भाजपा की तीन सीटें बढ़ीं और कांग्रेस की तीन कम हुईं, लेकिन यह अन्तर इसलिए कम नजर आ रहा है क्योंकि बुंदेलखंड में कांग्रेस ने पूर्व की तुलना इस बार अधिक सीटें जीती हैं। मालवा-नार्थ में कुल 63 सीटें हैं और इनमें से भाजपा को 37 और कांग्रेस को 25 सीटें मिलीं जबकि 2013 में यहां भाजपा को 55 और कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं। कांग्रेस की सीटों में यहां तीन गुना से अधिक वृद्धि हुई है। मालवा ट्राइबल इलाके में कुल 28 सीटें आती हैं यहां भी कांग्रेस को अच्छी-खासी सफलता मिली। कांग्रेस ने यहां 20 सीटें जीतीं जबकि भाजपा के हिस्से में महज 6 सीटें आईं जबकि 2013 में भाजपा के पास यहां 20 सीटें थीं और कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं। इस अंचल में कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलने का एक कारण यह भी रहा कि आदिवासी संगठन जयस के अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बना दिया। दिग्विजय सिंह की यह रणनीति काफी सफल रही। डॉ. अलावा को टिकिट देने का कांग्रेस के स्थानीय नेता विरोध कर रहे थे और उनके प्रचार में केवल दिग्विजय सिंह ही गये, लेकिन जयस की आदिवासियों के बीच मजबूत पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अलावा ने यह सीट 40 हजार से भी अधिक मतों के अन्तर से जीती।

और यह भी

अपनो ने हमें मारा गैरों में कहां दम था, मेरी कश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था। यह कहावत निवृत्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर सटीक बैठती है क्योंकि वे चौथी बार शपथ लेने से कांग्रेस से महज पांच सीटों से पीछे रह गये और उनके कुछ वरिष्ठ मंत्री व विधायक अपनी ही पार्टी के विद्रोहियों के कारण चुनाव हार गये। भाजपा इस बात को लेकर खुश हो रही है कि इन चुनावों में उसे कांग्रेस से 0.13 प्रतिशत मत अधिक प्राप्त हुए। जबकि हमारा जो लोकतंत्र है उसमें मिलने वाले मतों से नहीं बल्कि जीते उम्मीदवारों से जीत-हार तय होती है और आंकड़ों का वही गणित अंतत: सरकार बनाता है। इसी साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 36.43 प्रतिशत लेकर 104 सीटें जीतीं थीं जबकि 38.61 प्रतिशत मत पाने के बावजूद कांग्रेस को महज 78 सीटें ही मिल पाईं। वैसे भाजपा को यह आत्मचिंतन करना चाहिए कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके व कांग्रेस के बीच 19.15 प्रतिशत का अंतर था और 2013 के विधानसभा चुनाव में दोनों के बीच 8.5 प्रतिशत का अन्तर था। पिछले पांच सालों में कांग्रेस ने अपने खोये हुए जनाधार को इस कदर बढ़ाया कि अब दोनों के बीच महज 0.13 प्रतिशत का अन्तर ही रह गया है। अब कांग्रेस की सरकार बन गयी है इसलिए उसका जनाधार कुछ और बढ़ सकता है क्योंकि कमलनाथ कह रहे हैं कि दस दिन के भीतर किसानों के कर्ज को माफ कर देंगे।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।

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