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कहीं आंसुओं के सैलाब में डूबे तो कहीं गुस्से से लाल-पीले होते नेता – अरुण पटेल

अरूण पटेल

मध्यप्रदेश में मौजूदा विधानसभा चुनाव में जिस ढंग से उम्मीदवार अंगने बदल रहे हैं या बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं उस ढंग से कम से कम भारतीय जनता पार्टी में कभी देखने में नहीं आया। कांग्रेस में इस बार ऐसे नजारे पहले की तुलना में काफी कम नजर आ रहे हैं, लेकिन वह भी इससे अछूती नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बात पर जोर दिया था कि इस बार पैराशूट से उतरने वालों को टिकिट नहीं दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नजारा देखने में आया कि पैराशूट से लैंडिंग होने के चन्द मिनटों में ही होशंगाबाद से सरताज सिंह टिकिट पा गए हैं।

कांग्रेस ने पैराशूट से उतरने वालों को पूर्व की तुलना में इस बार कुछ अधिक ही तवज्जो दी है। जहां सरताज सिंह की राहें जुदा होने के पहले उनकी आंखों में आंसुओं का सैलाब आया, वहीं जीजा शिवराज सिंह चौहान से राजनीतिक रिश्ता तोड़ने एवं अपनी अलग राह चुनने के दो-तीन दिन बाद कांग्रेस टिकिट हाथ में थामे संजय सिंह मतदाताओं व साथियों के बीच पहुंचे तो रो-रो कर राह बदलने का औचित्य सिद्ध करने की कोशिश की।

वरिष्ठ मंत्री रहीं सुश्री कुसुम मेहदेले ने टिकिट कटने के बाद तीखे तेवर अपनाये तो दूसरे मंत्री रहे रामकृष्ण कुसमरिया भी गुस्से में लाल-पीले नजर आये। भाजपा में रुठों को मनाने की कवायद का कांग्रेस की तुलना में काफी कम असर दिखाई दे रहा है। जिज्जी के नाम से मशहूर शिवराज सहित विभिन्न भाजपा सरकारों में वरिष्ठ मंत्री रहीं कुसुम मेहदेले ने तो चुनाव प्रबंधन एवं अभियान समिति के संयोजक केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से ट्वीट कर सवाल ही पूछ डाला कि यह कैसा अन्याय है कि एक तरफ पवई से 12 हजार से अधिक मतों से हारे प्रत्याशी को पन्ना विधानसभा क्षेत्र से टिकिट दे दिया गया और पन्ना में 29 हजार से अधिक मतों से वे जीती थीं फिर उनका टिकिट काटा गया, कैसी है पं. दीनदयाल उपाध्याय व श्यामाचरण मुखर्जी की भाजपा तोमर जी। अब जिज्जी से ही कोई यह सवाल पूछे तो उन्हें कैसा लगेगा कि आप गुस्से में इस कदर नाराज हैं कि जिस पार्टी से आप इतने लम्बे समय से जुड़ी हैं उसके पूर्व घटक जनसंघ के संस्थापक का नाम ही भूल गयीं और आप श्यामाप्रसाद को श्यामाचरण लिख रही हैं। पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया भी गुस्से में इतने लाल-पीले नजर आ रहे हैं कि उन्होंने प्रदेेश व केंद्रीय नेतृत्व से यह कह डाला कि जयंत मलैया के गले में फूलों की माला और हमारे गले में डाल दिया सांप, इसलिए हम तो चुनाव लड़ेंगे और किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करेंगे। जहां तक मलैया का सवाल है उनकी गिनती भाजपा सरकार के उन एक-दो मंत्रियों में होती है जो पूरी तरह से शालीन, मिलनसार एवं व्यवहार कुशल हैं तथा लम्बे समय से चुनाव भी जीत रहे हैं।

कुसमरिया की तरह मलैया पिछला चुनाव नहीं हारे थे। मलैया ऐसे मंत्री हैं जो हर समय कार्यकर्ताओं व नेताओं से मिलने के लिए सहज-सुलभ रहते हैं। उन्हें टिकिट नहीं मिलती तो यह अन्याय होता। लेकिन जिनकी टिकिट कटी है या जिन्हें टिकिट नहीं मिली उनके गले में पार्टी ने सांप डाल दिया, क्या कुसमरिया की यही सोच है।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।

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