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स्व.अशोक पांडे : एक सूना कोना- राज खन्ना

स्व.अशोक पांडे

(पहली पुण्यतिथि 20 अगस्त पर)

स्व.अशोक पांडे जी की आज पहली पुण्यतिथि है।सौम्य-शिष्ट व्यक्तित्व और सरल-सहज स्वभाव के साथ ही दूसरों की निष्कपट सहायता की सदैव तत्परता ने उन्हें समाज के हर वर्ग में व्यापक लोकप्रियता और सम्मान प्रदान किया।  लगभग पांच दशक के लम्बे कालखंड में छात्र राजनीति से दलीय राजनीति तक के इस लंबे सफ़र में अपने व्यक्तित्व की इन खूबियों के चलते वह जाने के बाद भी उसी शिद्दत के साथ याद किये जाते हैं।

शालीनता और मर्यादा का पालन उनके संस्कारों में था। चुनावी और दलगत प्रतिद्वंदिता को उन्होंने कभी कटुता में  बदलने नही दिया। निजी- सामाजिक संबंधों के निर्वाह में उनकी राजनीति कभी आड़े नही आई। विपक्षियों के लिए उनकी अनुपस्थिति में भी सम्मान सूचक संबोधन और उनकी  निजी- पारिवारिक तकलीफों में साथ खड़े होने का उनका जैसा माद्दा बिरलों में ही होता है। अपनी ऐसी ही खूबियों के चलते स्व. अशोक पांडे  दलीय सीमाओं को तोड़ते आदर और आत्मीयता पाते रहे । राजनीति में रहते हुए भी सुल्तानपुर के गैर राजनीतिक मंचों-संगठनों को अपने कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी जरूरी लगती थी। सृजन-सेवा-सहयोग के कार्यों में उनकी भागीदारी ने उनके प्रति लोगों का आदर और बढ़ाया।उनकी लोकप्रियता अथवा स्वीकार्यता की उनकी राजनीतिक उपलब्धियों से पैमाइश नही की जानी चाहिए। कुछ लोगों का कद बिना पद के भी बहुत बड़ा होता है। वह उन ‘कुछ’ में शामिल थे।

धनबल-बाहुबल और जातीयता की राजनीति के दौर में भी वह उसे ठेंगा दिखाते रहे। विपरीत धारा में बहने की इस कोशिश में उन्होंने क्या गंवाया यह कभी उनकी चिंता का विषय नही था। जिन्होंने सिर्फ पद-ओहदे और तड़क-भड़क के लिए राजनीति में दाखिला लिया है, उन्हें स्व.अशोक पांडे का रास्ता क्यों भाएगा? पर जिन्होंने राजनीति के रोजगार बन जाने और तमाम बुराइयों के इस दौर में भी  परिवर्तन की उम्मीद नही छोड़ी है, उन्हें अशोक जी जैसे लोगों की याद ताकत और रोशनी दे सकती है।।राजनीतिक जीवन मे सक्रिय रहने वाले लोग आमतौर पर निजी-सामाजिक संबंधों से लेकर संस्थाओं से जुड़ाव तक के फैसलों में अपने जातीय वोट बैंक की प्रतिक्रिया को काफी वजन देते हैं। अशोक जी ने इसकी कभी परवाह नही की।  उन्होंने बार- बार नुकसान उठाया। पर रास्ता कभी नही बदला। राजनीति को उन्होंने कभी कमाई का जरिया नही बनाया और ऐसा भी दौर आया जब उन्होंने चुनाव के लिए बड़ी धनराशि की ज़रूरत का ख्याल करते हुए टिकट मांगने तक से परहेज किया।

राजनीतिक जीवन में लग्ज़री वाहनों के काफिलों की अनिवार्यता के दौर में पूर्व विधायक के रूप में परिवहन निगम की बसों में उनकी यात्राएं उनकी निष्कलंक राजनीतिक यात्रा का भी सबूत थीं। तब जब हथियारबंद समर्थकों का हुजूम किसी नेता का ‘स्टेटस सिम्बल’ बन चुका हो तो अकेले पैदल घूमते-फिरते लोगों से घुलते-मिलते अशोक जी क्यों न याद आएं?राजनीतिक व्यावहारिकता के नजरिये से उनका रास्ता भले अटपटा लगे लेकिन इस सादगी,ईमानदारी और विनम्रता ने उन्हें बला का आत्मविश्वास और ताकत दी। किसी भीड़ और विपरीत परिस्थिति में भी अकेले घुसने और अपनी बात मजबूती से रखने का साहस दिया। अपनी पार्टी की सरकार रही हो या किसी और दल की।विधायक रहे हों अथवा नही। उन्हें सुल्तानपुर से लखनऊ- दिल्ली तक किसी साथ-सहारे की जरूरत नही पड़ी और जो पहुंचा उसकी मदद में कसर नही छोड़ी। बड़े नेताओं की निकटता उनकी चर्चा-अभिमान का कभी विषय नही रही और जिनसे चुनाव हारे उनसे भी जनहित के सवालों पर संवाद में उनका अहम कभी आड़े नही आया। उनके दोस्तों और चाहने वालों की दुनिया बड़ी है। पर सुल्तानपुर जो उनकी कर्मभूमि रही वहां के पिछले कुछ दशकों के सामाजिक-राजनीतिक जीवन मे तो उनकी अपनी अलग ही पहचान और स्थान था। अपनी राजनीतिक- सार्वजनिक जिम्मेदारियों को उन्होंने बखूबी निभाया। पर इसके साथ ही आम से खास तक से एक दिली रिश्ता बनाया। यह रिश्ता इंसानियत का था।  वह लोगों से सीधे जुड़े और दिलों में जगह बना गए। इसलिए  जाने के बाद एक कोना सूना छोड़ गए और बार-बार याद आते हैं। सादर नमन।

 

सम्प्रति- लेखक श्री राजखन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।

 

 

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