Wednesday , October 24 2018
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‘लिंचिग’ के दौर में राहुल के ‘पोयटिक-ट्वीट’ पर विमर्श का स्पेस नहीं – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस को सिर्फ मुस्लिमों की पार्टी निरूपित करने वाले भाजपा के राजनीतिक आरोपों के जवाब में जो ट्वीट किया है, वह ‘पोलिटिकल’ कम, ‘पोयटिकल’ ज्यादा है। इसे कुछ इस तरह से भी समझा जा सकता है कि ट्वीट की भाव-भूमि राजनीतिक कम, काव्यात्मक ज्यादा है। जुमलेबाजी के इस राजनीतिक दौर में अपने विचारों को लेकर इस प्रकार की भावाभिव्यक्ति के लिए वह बौध्दिक और विचारशील स्पेस कम है, जिसकी दरकार ऐसे ट्वीट्स को समझने के लिए जरूरी है। पहले समझें कि राहुल गांधी ने माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्वीटर पर लिखा क्या है और उसकी गहराई कितनी है? राहुल गांधी लिखते हैं- ”मैं पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के साथ खड़ा हूं, जो हाशिये पर धकेला गया है, जो दमित और पीड़ित हैं, अत्याचार का शिकार हैं, उनका धर्म, जाति और आस्था मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती, जो दर्द में हैं, मैं उन्हें तलाशता हूं और उन्हें सीने से लगाता हूं, मैं सभी प्राणियों से प्यार करता हूं, मैं कांग्रेस हूं…।”

राजनीतिक के धुरंधर और खड़ूस खिलाड़ी शायद इसीलिए राहुल गांधी को खारिज करते रहते हैं कि उनमें वो परिपक्वता नहीं है, जो मौजूदा राजनीति की पहली जरूरत है। मुस्लिम बुध्दिजीवियों के साथ एक विमर्श में राहुल गांधी ने यह कहा था कि ”भाजपा यदि यह कहती है कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, तो ठीक है, कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, क्योंकि मुसलमान कमजोर हैं और कांग्रेस हमेशा कमजोरों के साथ खड़ी रही है।” भाजपा इस बयान को फैलाकर यह सिध्द करने की कोशिश कर रही है कि राहुल ने यह स्वीकार किया है कि कांग्रेस सिर्फ मुसलमानों की पार्टी है। अपनी राजनीतिक-सिध्दि को हासिल करने के लिए भाजपा की ओर से रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन और मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर मैदान में उतर चुके हैं। आजमगढ़ की सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यह सवाल दाग चुके हैं कि तीन तलाक के मामले में कांग्रेस यह खुलासा करे कि वह मुसलमान मर्दों की पार्टी है अथवा मुसलमान औरतों की पार्टी भी है?  दिलचस्प यह है कि जो बयान कांग्रेस ने दिया ही नहीं, उस बयान पर उसे कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। मौजूदा राजनीति की एक त्रासदी यह भी है कि इस दौर में प्रायोजित शोर-शराबे ने तर्क के सभी आयामों को इस तरह से जकड़ लिया है कि विवेकशीलता का दम घुटने लगा है।

वैसे भी राजनीति में घृणा की पैदावार को बढ़ावा देने में राजनीतिक दल हर किस्म के हथकण्डों का उपयोग करने से बाज नहीं आते हैं। भाजपा ने राहुल गांधी के ट्वीट की पतवार को थामकर हिन्दू-मुस्लिम राजनीति की लहरों में नौकायन प्रारंभ कर दिया है। भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने हुंकार भरी है कि राहुल की मुस्लिम-परस्त होने की यह स्वीकारोक्ति कांग्रेस के जिन्नावादी सोच का परिचायक है, जो देश को किसी भी कीमत पर आगे नहीं बढ़ने देगा।

राहुल गांधी का यह ट्वीट साहिर लुधियानवी अथवा गोपालदास नीरज जैसे शायरों और कवियों की उस अमूर्त दुनिया की भाव-व्यंजना है, जहां धरती पर याने इस दुनिया अथवा इस भारत में उस दुनिया को बसाने की कल्पना की गई है। नीरज की एक कविता है- ”मैं बसाना चाहता हूं, स्वर्ग धरती पर, आदमी जिसमें रहे, बस आदमी बनकर, उस नगर की हर गली तैयार करता हूं, आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं।”  नीरज की कविता की तरह ही राहुल गांधी का यह ट्वीट राजनीति की हकीकत से कोसों दूर, एक आदर्शवादी ख्याल है। हकीकत की राजनीति में ऐसे खयालात के लिए कोई ठौर नहीं बची है। समाजवादी रूमानियत का वह दौर बीत चुका है, जब साहिर लुधियानवी की तरह लोग कल्पना करते थे कि ”अम्बर झूमकर नाचेगा और धरती नगमे गाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी…।” मौजूदा राजनीति में  न तो साहिर की उस सुबह के लिए कोई ठौर बची है, ना ही नीरज के इंसानी जज्बे का कोई बजूद बचा है।

देश में 2019 के लोकसभा चुनाव की सियासी रणभेरी बज चुकी है, जिसमें गरीबों, किसानों, दलितों, मजदूरों और पिछड़े तबके के सवालों के ऊपर हिन्दू-मुसलमान के मुद्दे हावी हो चुके हैं। गौरक्षकों के मॉब-लिंचिग में 50 लोगों की मौत और बच्चा चोरी की अफवाहों में 30 लोगों की मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को कानून बनाने की हिदायत दी है। इसी बीच झारखण्ड में भारतीय जनता युवा मोर्चे के कार्यकर्ताओं ने अस्सी साल बूढ़े स्वामी अग्निवेश कि महज इस आरोप में पिटाई कर दी कि वो आदिवासियों को भड़का रहे हैं। जुमलेबाजी में माहिर राजनीति के सामने राहुल गांधी का यह रूमानी ट्वीट इतना रूमानी और अमूर्त है कि उसके हर हिज्जे को अंगारों में लपेटकर धर्मान्धता की राजनीति की जा सकती है।

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एनं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह आलेख सुबह सवेरे के 18 जुलाई के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह सम्पादक भी रह चुके है।

 

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