Friday , September 21 2018
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न्यू इंडिया के लिए नया पैगाम: ‘इन्सां का इन्सां से हो भाईचारा – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

त्रिपुरा में मार्क्सवादियों का किला ढहने के बाद ब्लादिमिर लेनिन की मूर्तियों के जमींदोज होने की कहानी में, तमिलनाडु में पेरियार की मूर्ति के साथ राजनीतिक खिलवाड़ ने दिलचस्प, किन्तु गंभीर सवाल चस्पा कर दिये हैं। सवाल राजनेताओं के साथ-साथ आम-जनता के राजनीतिक-सोच की संकीर्णता और नासमझी की कलई खोलते है। लेनिन और पेरियार का अपना अतीत है। सर्वहारा वर्ग को समेटने वाला लेनिन का अतीत पीछे छूट चुका है और पेरियार की पुरानी कहानी के सिरे अभी भी भारतीय राजनीति के दलित-वोटों से जुड़े हैं। पेरियार उस सामाजिक और सामुदायिक राजनीति के रचनाकार थे, जो भारत में वोटों के जातिगत व्यवसाय में आज भी सघन, घनीभूत और महत्वपूर्ण हैं। लेनिन एक ‘विचार’ का विस्तार थे, जो उदारवाद के पूंजी-प्रधान दौर में विरल और अप्रासंगिक माना जाने लगा है।

दो महान विचारकों के प्रतीकों के रूप में ‘विचार’ और ‘व्यापार’ की कहानी राजनीति में तात्कालिक नफे-नुकसान और दूरगामी राष्ट्रीय-हितों को प्रभावित करती है। वोट बैंक की ‘शार्ट-टर्म’ राजनीति में पेरियार का राजनीतिक वजूद और जरूरत आज भी मौजूं हैं। इसीलिए बुधवार को देश के सभी राजनेता और पार्टियां उन वोटों के मैनेजमेंट में लगी रहीं जो तमिलनाडु में द्रविड़-आंदोलन के जनक ईवीआर रामास्वामी पेरियार की मूर्ति खंडित होने के बाद इधर-उधर बिखरने वाले थे। त्रिपुरा में लेनिन की मूर्तियों के विध्वंस पर ताली पीटने वाली भाजपा पेरियार की मूर्ति टूटने से सबसे ज्यादा परेशान थी। भाजपा को अंदाज नहीं था कि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गाज बनकर तमिलनाडु में दलितों के पुरोधा पेरियार की मूर्ति पर गिर पड़ेगी। नतीजतन दलित-वोटों को संभालने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को करेक्शन की मशाल लेकर निकलना पड़ा। लोकतंत्र के मसलों में आमतौर पर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री की त्वरित प्रतिक्रिया से जाहिर है कि नुकसान कितना बड़ा है?  मोदी और अमित शाह की ये प्रतिक्रियाएं 2018 के विधानसभा चुनाव और 2019 की लोकसभा चुनाव का ‘वोट-मैनेजमेंट’ का हिस्सा हैं।

वोटों के नजरिए से फिलवक्त पेरियार का सामाजिक क्रांति में ज्यादा ताप नजर आ रहा है, जबकि लेनिन के वैचारिक-भग्नावशेषों में ‘दुनिया के मजदूरो एक हो ‘ जैसे नारे सुन्न और निस्सार हो चुके हैं। और, विचारों में सत्ता की राहों में वोटों के फूल बिछाने जितनी ताकत नहीं बची है। वैचारिक आग्रह और दुराग्रहों की रपटीली राहों में सिर्फ त्रिपुरा ही नहीं, सोवियत रूस में भी लेनिन की सैकड़ों मूर्तियों के ढह जाने के मायने यह नहीं है कि दुनिया में गरीबी और गुरबत के सवालों का समाधान हो चुका है।  त्रिपुरा में लेनिन के मूर्ति-भंजन पर झांझ मंजीरे बजाने से पहले खुद से, उदारवाद के प्रवक्तताओं और कार्पोरेट घरानों से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नया इंडिया उन मुद्दों को कैसे एड्रेस करेगा, जो देश की सौ करोड़ गरीब जनता से जुड़े हैं? अथवा मार्क्सवादी विचारों के वनवास के बाद ‘इकॉनामी’ को गरीबों की ओर मोड़ने के लिए जरूरी अर्थशास्त्र के नए मुहावरों की तलाश को कौन सी पोलिटिकल-थ्योरी सहारा देगी ?

त्रासदी यह है कि दुनिया के गरीब भले ही एक नहीं हो पा रहे हों, पूंजी के राजमहलों में अडानी-अंबानी जैसे पूंजीपति एक-दूसरे का हाथ थामकर लामबंद हो रहे हैं। क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है कि भारत की 73 प्रतिशत सम्पति उसके एक प्रतिशत लोगों के पास है? ऑक्सफेम व्दारा 2017 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 57 लोगों के पास देश के 75 प्रतिशत गरीबों के बराबर सम्पति है। बैंक-खातों को खंगाला और सब्सिडी को तौला जाए तो पूंजीपतियों के पास मौजूद 90 फीसदी पूंजी के स्त्रोत सरकारी खजानों से जुड़े हैं। खुद भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने खुलासा किया है कि सरकार के चहेते उद्योगपति गौतम अडाणी के समूह पर 72,000 करोड़ रुपए का एनपीए हो सकता है। समय आ गया है कि केन्द्र सरकार गौतम अडाणी की जवाबदेही तय करे।

पूंजी के कोरस-गानों में सरकार की जुगलबंदी चौंकाती है। मार्क्सवाद की बेदखली के बाद यह सोचना और खोजना जरूरी है कि पूंजी-युग में उन नारों और मुहावरों का स्वरूप क्या और कैसा होगा, जो महलों (अंबानी), तख्तों (अडानी) और ताजों (मोदी) को चुनौती देते हुए आम आदमी की जिंदगी और उसकी समस्याओं को एड्रेस करेंगे? संयुक्त राष्ट्र संघ के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की स्थिति बदतर है। हंगर-इंडेक्स में भारत 2016 के मुकाबले 2017 में 97वीं पायदान से नीचे लुढ़कर 100 वें स्थान पर आ गया है। क्या प्रधानमंत्री मोदी न्यू-इंडिया की सुरीली गीतिकाओं में भारत की गरीबी और गुरबत से लडने वाले ऩए नारों और नए मुहावरों के जोशीले छंदों का ओज भर सकेंगे…? 1959 में बनी फिल्म ‘पैगाम’ में कवि प्रदीप के गीत में गूंजने वाली यह अपेक्षा आज भी गैरवाजिब नहीं है कि – ‘इन्सान का इन्सान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा… हरेक महल से कहो कि झोपडियों में दिए जलाए…छोटे और बड़े में कोई फर्क नहीं रह जाए…।’ यदि ऐसा हो सके तो लेनिन की बची-खुची मूर्तियां ढहाने में भी किसी को ऐतराज नहीं होगा…?

 

सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एनं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह आलेख सुबह सवेरे के 09 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह सम्पादक भी रह चुके है।

 

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