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गांधी परिवार के किले को ढ़हाने की कोशिश में जुटे अमित शाह – राज खन्ना

राज खन्ना

भाजपा वाराणसी की तर्ज पर अमेठी -रायबरेली पर फोकस करने की तैयारी में है।वाराणसी में उसका मकसद अपने नेता नरेन्द्र मोदी को मजबूती देना है। उधर अमेठी- रायबरेली में विपक्षी की जड़ों को कमजोर करना। चालीस साल में पहली बार गांधी परिवार को उनके गढ़ में घेरने के लिए कोई गैर कांग्रेसी पार्टी गंभीरतापूर्वक जुटी है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में चलने वाले इस अभियान में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी अमेठी में पार्टी का चेहरा हैं। रायबरेली को लेकर मन्थन चल रहा है। मंत्रियों का एक समूह वहां के विकास कार्यों की ख़ास तौर पर निगरानी करेगा।

केन्द्र के बाद उ.प्र. में पार्टी की सरकार बन जाने से भाजपा के इस अभियान को गति मिली है। स्मृति ईरानी ने प्रदेश में पार्टी की सरकार बनने के फौरन बाद इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री से भेंट की थी। संघ भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहा है। 10 अक्टूबर को अमेठी में पार्टी और सरकार की साझा ताकत राहुल गांधी को चुनौती देगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ एक मंच पर होंगे। स्मृति ईरानी एक दिन पहले अमेठी पहुंच गईं हैं।उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडे सहित अन्य मंत्री और पार्टी के पदाधिकारियों की मौजूदगी 2019 की तैयारियों का सन्देश देगी।मुख्यमंत्री योगी अमेठी के विकास-निर्माण से जुड़ी कई योजनाओं की शुरुआत और कुछ का लोकार्पण करेंगे। कई अन्य नई सौगातों की तैयारी है।

  यह भी संयोग हैं कि राहुल गांधी इस समय जब मोदी – शाह के गढ़ गुजरात में अमित शाह के बेटे पर लगे कथित आरोपों को लेकर हमले में जुटे है तो वहीं दूसरी और उनके गढ़ अमेठी में उन्हे चुनौती देने शाह और उनकी पूरी टीम पहुंचकर उन्हे 2019 में जवाब देने और घेरने की तैयारी में जुटी है।

इससे पहले मायावती ने अमेठी में गांधी परिवार को कमजोर करने की नाकाम कोशिश की थी। 2003 में उन्होंने अपने तब के मुख्यमंत्री काल में अमेठी को सुल्तानपुर-रायबरेली से काटकर अलग जिले का दावँ चला था। जल्दी ही उनकी सरकार चले जाने के बाद अगले मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस फैसले को पलट दिया था। 2010 में मायावती ने एक बार फिर अमेठी को अलग जिला बनाया लेकिन अदालती मुकदमेबाजी में फंसी इस घोषणा के आखिरी फैसले तक मायावती फिर सत्ता से बाहर हो गईं। 2013 में अखिलेश सरकार ने अमेठी को अलग जिले की घोषणा पर मोहर लगाई। बुनियादी ढांचे के निर्माण के बिना राजनीतिक कारणों से वजूद में आया नया जिला अमेठी फ़िलहाल अपनी जरूरतों के लिए जूझ रहा है। अमेठी से गांधी परिवार को बेदखल करने की कोशिशों में लगी भाजपा के सामने अमेठी को कम समय में वह सब देने की चुनौती है जो पूर्ववर्ती नहीं दे सके।

2014 के लोकसभा चुनाव में अमेठी में शिकस्त के बाद भी भाजपा का हौसला बढ़ा। राहुल का अमेठी में यह तीसरा चुनाव काफी चुनौती पूर्ण था। मोदी लहर के बीच स्मृति ईरानी ने सिर्फ पन्द्रह दिन में यह हालात पैदा कर दिए कि राहुल को पहली बार मतदान के दिन अमेठी से एक-एक बूथ पर दौड़ लगानी पड़ी। 2009 की तुलना में उनकी बढ़त 3.70 लाख से सिकुड़ कर 1.07 लाख पर रह गई। स्मृति हारने के बाद भी केंद्र में मंत्री बन गईं। चुनाव में स्मृति ने हारने-जीतने हर हाल में अमेठी की बनकर रहने का वायदा किया था। पार्टी की सत्ता ने उनका काम आसान किया। वह जल्दी- जल्दी और आम तौर पर राहुल के दौरों के फौरन बाद अमेठी आती हैं। अन्य मंत्रियों को भी प्रायः साथ लाती हैं और अमेठी से दिल्ली तक राहुल की तुलना में अमेठी की ज्यादा भीड़ खींचती हैं। 2017 के उ.प्र. विधानसभा चुनाव ने भाजपा की उम्मीदों को नए पंख दिए। अमेठी की पांच में चार विधानसभा सीटें भाजपा जीत गई। पांचवी सपा के खाते गई और कांग्रेस की स्लेट साफ़ हो गई।

फ़िलहाल लोकसभा में उ.प्र. से कांग्रेस के केवल दो सदस्य हैं। रायबरेली से सोनिया गांधी और अमेठी से राहुल गांधी। विधानसभा में पार्टी के सिर्फ सात सदस्य हैं। मोदी-शाह की जोड़ी जिस कांग्रेस मुक्त अभियान पर है, उसमे अमेठी-रायबरेली की जीत कम से कम उत्तर प्रदेश में इस अभियान को एक बड़े पड़ाव पर पहुंचा सकती है।लेकिन भाजपा के लिए आगे सब कुछ आसान होगा, ऐसा नही कहा जा सकता। तेरह साल से अमेठी की अगुवाई कर रहे राहुल गांधी को पिछले हफ्ते अमेठी ने बदला – बदला पाया। वह गुजरे सालों की तुलना में अमेठी के लोगों के लिए अधिक सुलभ-सरल और सहज थे। कार्यकर्ताओं- नेताओं को बार-बार चेहरा दिखाने की पुरानी नसीहतें इस बार नहीं दोहराईं गईं।उन्हें धैर्य पूर्वक सुना गया। हाथ मिले और कन्धों पर भी हाथ रख हौसला दिया गया। अमेठी की समस्याओं-जरूरतों के विस्तार में गए। जनता के दुःख-दर्द पर मरहम लगाया और अधिकारियों से उनके लिए बात की। जी एस टी से जुडी समस्याओ की जानकारी के लिए घंटे भर व्यापारियों और जानकारों से फीड बैक लिया गया। लोगों ने भी राहुल को धैर्य पूर्वक सुना। उन्हें सुनने और मिलने वालों की भीड़ बढ़ी।

अब तक स्मृति ईरानी और भाजपा अमेठी में आक्रामक थे।अमेठी को गांधी परिवार ने क्या दिया और क्यों छला के जबाब में विधानसभा चुनाव में अमेठी ने भाजपा के हक में वोटों की बरसात कर दी थी। तीन साल से ज्यादा वक्त से भाजपा केंद्र की सत्ता में है। छह महीने पहले प्रदेश की कमान भी उसके हाथ में आ गई। केंद्र में अपनी सरकार रहने पर भी राहुल प्रदेश में अपनी सरकार न होने की ढाल सामने करते थे। भाजपा के बचाव और सफाई के रास्ते बंद हैं। राहुल अमेठी के सांसद हैं लेकिन सत्ता के कारण लोग जबाब स्मृति और भाजपा से मांगने लगे हैं। लोगों को अब गांधी परिवार ने क्या दिया का राग पुराना और निरर्थक लगने लगा है। अमेठी के बंद उद्योगों को चालू करने के मामले में और यहां तक कि सरकारी उपक्रम सेल (स्टील अथॉरिटी) को चालू करने के मामले में कोई कामयाबी न मिलना स्मृति और भाजपा के खिलाफ जा रहा है। फ़ूड पार्क और हिन्दुस्तान पेपर मिल जैसी राहुल की योजनाओं की अमेठी से वापसी पर भाजपा से सवाल हो रहे हैं कि राहुल उन्हें पूरी नहीं करा पाये लेकिन भाजपा ने क्या किया ?  राजीव गांधी के बाद की गांधी परिवार की पीढ़ी के पास अमेठी- रायबरेली में अपने बचाव के लिए उ. प्र. में अपनी सरकार न होने की ढाल थी। फिलहाल भाजपा को यह सहूलियत हासिल नहीं है।

2019 में अमेठी-रायबरेली राहुल-सोनिया से नही भाजपा से हिसाब लेगी। सवाल राहुल और कांग्रेस से कम, स्मृति और भाजपा विधायकों से ज्यादा होंगे।पार्टी को इस चुनौती का अहसास है। इसलिए पार्टी और सरकार अमेठी में जुट गई है। अगला पड़ाव रायबरेली है। 2014 में मोदी के बनारस की सुबह के बरक्स राहुल की अमेठी में शाम गहरा गई थी।फ़िलहाल भाजपा और उसकी सरकारें अमेठी में उजाले का भरोसा परोसने का प्रयास कर रही हैं।

 

सम्प्रति- लेखक राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।अमेठी में गांधी परिवार के जाने से लेकर अब तक की राजनीतिक गतिविधियों पर निकट से नजर रखने वाले श्री खन्ना एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक से वर्षो से जुड़े है और समसामयिक विषयों पर उनके आलेख निरन्तर छपते रहते है।

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