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अंध विरोध और अंध भक्ति के बीच खामोश जमात-राज खन्ना

राज खन्ना

भक्त और विरोधियों के अलावा देश में एक और भी जमात बसती है। आमतौर पर यह मुखर नहीं होती।लेकिन इसकी ख़ामोशी में छिपे तूफ़ान से देश में सरकारेँ बनती बिगड़ती रही हैं।विरोधियों को प्रधानमंत्री मोदी बर्दाश्त नहीं। भक्त विरोध का कोई सुर सुनने को तैयार नहीं। अंध विरोध और अंध भक्ति के बीच ये खामोश जमात कसमसा रही है। वह किसी फैसले की जल्दी में नहीं है। लेकिन किसी फैसले पर नहीं पहुंचेगी ऐसा भी नहीं है।

मोदी सरकार के पास डेढ़ साल का वक्त और है। दिल्ली- बिहार के झटकों के अलावा 2014 के बाद के अन्य राज्यों के चुनाव नतीजे आमतौर पर भाजपा के अनुकूल रहे हैं। पंजाब की हार अकालियों के खाते में गई। केरल, बंगाल जैसे राज्यों में सीटें न सही, वहां बढ़े मत फीसद ने पार्टी का आत्म विश्वास बढ़ाया। बिहार, गोवा और मणिपुर हार कर भी पार्टी की झोली में है। उ. प्र. के नतीजों ने हौसलों को नए पर दे दिए। नतीजे और राज्यों में अपनी सरकारों की बढ़ती गिनती ने 2019 में वापसी के लिए पार्टी को अतिरिक्त आत्मविश्वास दे दिया है। अपनी मजबूती से ज्यादा बिखरे विपक्ष की कमजोरी से मिली ताकत की ठसक सरकार से पार्टी तक में नजऱ आ रही है।

सत्ता में तीन साल से ज्यादा वक्त गुजारने के बाद मोदी सरकार के पास गिनाने के लिए अपनी कामयाबियों की फेहरिस्त है। ठीक उसी तरह जैसे पिछली सरकारों के पास रहती रही है। हालांकि तमाम मुद्दों पर वह फर्क का वह दावा कर सकते हैं। इस नजरिये से कि यूपीए 2 जैसे घोटालों की कलंक कथाएँ उनकी सरकार से नहीं जुड़ी हैं।कि सत्ता की चाभी सिर्फ और सिर्फ उनके हाथों में है। कि उनकी सरकार गठबंधन और संविधानेतर दबावों से मुक्त है। कि वह पूर्ववर्ती जैसे मौन नहीं हैं। कि वह अनिर्णय में नहीं झूलते। कि मुखर हैं देश -परदेश हर जगह। दावे और भी हैं। वे बहस तलब हो सकते हैं। सत्ता से जुड़े लोग उनके खिलाफ नहीं सुनना चाहेंगे। विपक्षी खिल्ली उड़ाने का कोई मौका छोड़ने को तैयार नहीं।

जो इन दोनों पाले में नहीं। उनकी अपनी कसौटी है। वह किसी सभा मंच पर नहीं है। किसी भीड़ की अगुवाई भी नहीं कर रहे। वह सवाल कर रहे है। कभी सामने वाले से। कभी खुद से। कतई जरूरी नहीं कि उसके सवाल और उसकी खुसुर-पुसुर सत्ता के कानों तक पहुँच रही हो। जरूरी नहीं कि उसके भीतर की हलचल और चेहरे का असन्तोष सत्ता का ध्यान खींच पा रहा हो। लेकिन जो सरकारेँ इन्हें आंकने- मापने में चूकती हैं वे खामियाजा भुगतती हैं।

1989 से 2014 के बीच देश ने गठबंधन के दबावों को झेलते प्रधानमंत्री देखे थे। उसके पहले 1984 में इंदिरा जी की हत्या से उपजी सहानुभूति की आंधी में कांग्रेस को 415 सीटें मिली थी। राजीव गांधी की अगुवाई थी। वह 1989 में तक यह समर्थन संजो नहीं पाये थे। 2014 में अपने बूते भाजपा की सरकार का श्रेय मोदी के खाते में है। वैसे राजनीति की समझ रखने वाले संघ परिवार के बड़े विस्तार और अटल-आडवाणी की अगुवाई में पार्टी को विकल्प लायक पेश करने के योगदान को शायद ही दर किनार करना चाहें। लेकिन मोदी- मोदी के शोर में सब पीछे छूट गया। पहली बार कैडर आधारित पार्टी छोटी और चेहरा बड़ा हो गया। गुजरे तीन सालों में पार्टी से सरकार तक सिर्फ और सिर्फ मोदी का चेहरा है।

2014 और बाद के राज्यों के चुनाव भाजपा ने मोदी के चेहरे पर लड़े थे।तय है कि 2019 के केंद्र के और उसके पहले के हिमांचल, गुजरात और कर्नाटक,छत्तीसगढ़ .मध्यप्रदेश आदि राज्यों के चुनाव भी इसी चेहरे को आगे करके लड़े जाएंगे। पिछले तीन से ज्यादा सालों से देश की जनता मोदी के भाषण और उनके मन की बात सुन रही थी। अच्छे दिनों के इन्तजार में। उन वायदों या उनमे कुछ के ही पूरे होने का इन्तजार था। वायदे जो चुनाव के पहले किये गए। जिन्हें बार बार दोहराया गया। अब तक सुन रहे लोग उन्हें लेकर सवाल करने लगे हैं। लोग आंक-माप रहे हैं कि सरकार के हर फैसले से जुड़ कर जिंदगी में क्या फर्क आया ? नोटबंदी की लम्बी लाइनों की पीड़ा उस समय ख़ामोशी से झेलने वाले अब हासिल का हिसाब कर रहे हैं। रोज ब रोज खाली ए टी एम उन्हें परेशान कर रहे हैं। डिजिटल और कैशलेस के जुमले अब उसमे खीझ पैदा करने लगे हैं। जी एस टी के धूम धड़ाके।आधी रात को बुलाये सदन के भाषण। बढ़ती कीमतों और बाजार में मची अफरातफरी के चलते नाराज कर रहे हैं। जन धन, उज्ज्वला पीछे छूट गए है। सामने है रोजगार के घटते अवसरों का संकट।कौशल विकास- स्टार्ट अप। विनिवेश को आमंत्रित करने के देश-विदेश में मोदी के भाषण।इनके जरिये हर साल एक करोड़ नई नौकरियों के सृजन के वादे के मुँह के बल गिरने से मोह भंग भी है और बेचैनी भी। जी डी पी की गिरावट की अर्थशास्त्रीय व्याख्या आम आदमी की समझ भले न आये लेकिन रोजाना की जिंदगी पर उसका असर उसे कष्ट दे रहा है। बुलेट ट्रेन के मोहक सपनों के बीच देर से चलती अपनी रेलें बदस्तूर हैं। खस्ता हाल पटरियां और पलटती रेलें। क्या बदला ?

पार्टी से बड़े चेहरे के सुख हैं तो चुनौतियाँ भी। जब केंद्र से राज्य तक के चुनाव एक चेहरे पर लड़े जाएंगे तो उससे जुड़े हर सवाल का जबाब भी उसी चेहरे में तलाशा जाएगा। तब सड़कों के गड्ढे, सूखी नहरों दवा- डॉक्टरों की किल्लत से जूझते अस्पताल और आक्सीजन के बिना मरते बच्चे, बढ़ते अपराधों और बिजली की किल्लत के सवाल राज्य की सरकार के जिम्मे नहीं टाले जा पाते। 2019 के रण में ये और तमाम छूटे सवालों से मोदी को दर पेश होना है।

सिर्फ विपक्ष के बिखराव और विकल्प के अभाव में कोई सरकार अगली बार वापसी को लेकर आश्वस्त नहीं रह सकती। वैसे ऐसी आशंकाएं सत्ता पक्ष को नहीं भातीं।पर मतदाता को पांच साल में एक ही मौका होता है। उसकी करवट भांपना मुश्किल काम है। फिर अभी काफी वक्त है।

 

सम्प्रति- लेखक राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है। एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक से वर्षो से जुड़े श्री खन्ना के समसामयिक विषयों पर आलेख निरन्तर छपते रहते है।

 

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