Sunday, May 20, 2012
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तार-तार होती सदन की मर्यादा -डा.संजय शुक्ला

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कर्नाटक के विधानसभा की कार्यवाही के दौरान दो मंत्रियों द्वारा मोबाईल फोन पर अश्लील क्लिपिंग देखने की घटना ने यह सोचने को विवश कर दिया है कि जनप्रतिनिधियों के नैतिक पतन की पराकाष्ठा क्या है?संसद से लेकर विधानसभा तक इन सदनों के सदस्यों के आचरण सोचनीय है।सदन एवं सदन के बाहर देश के नेताओं को कसौटी पर परखने से यह अंदाजा बयां होता है कि राजनीति के क्षेत्र में सबसे ज्यादा कमी चरित्र की ही है।आजादी के बाद से अब तक न तो भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लग सका है और न ही नेताओं के नैतिक पतन का सिलसिला थमा है।

     हाल की इस घटना के प्रकाश में विचारणीय है कि भ्रष्ट एवं चरित्रहीन राजनेताओं पर मुकदमे चलते हैं तथा कुछ नेताओं को जेल जाना पड़ता है,पद भी गवानें पडते हैं लेकिन यह सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है।कर्नाटक के तीन मंत्रियों का लोकतंत्र के मंदिर में पोर्न फिल्म देखते हुए पकड़ में आना तथा उनका इस्तीफा इसका ताजा उदाहरण है।हालांकि इस घटना के बाद राजनीतिक दलों के नेताओं के आपसी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है लेकिन यह कटु सत्य है कि राजनीति के इस हमाम में अधिकांश निर्वस्त्र हैं।बहरहाल दुनिया से सबसे बडे़ प्रजातंत्र की दंभ भरने वाले देश के सदनों में सदस्यों के आचरण से लोकतंत्र की आत्मा कलंकित हो रही है।विचारणीय है कि सदन के सदस्यों के कृत्यों के कारण संसदीय मर्यादा पर आंच आई है,गौरतलब है कि सदन के एक चौथाई सांसद दागी हैं।शायद यह आभास भी होता है कि संसद से लेकर कई राज्यों के विधानसभा परिसर में स्थापित महात्मा गांधी की प्रस्तर प्रतिमा भी सदस्यों के कृत्यों से लज्जित होकर सर झुकाने को विवश है। 

    विडंबना यह है कि जिन लोगों ने अतीत में देश की संविधान की रचना की तथा वर्तमान में जो लोग इसे लागू कर रहे हैं उनके आचरण एवं व्यवहार में विरोधाभाष नजर आ रहा है।तब के जनप्रतिनिधियों के सामने देश श्रद्धा के साथ शीश झुकाता था लेकिन अब के जनप्रतिनिधियों के सामने देश का सिर शर्म के साथ झुक रहा है।इसका कारण चंद जनप्रतिनिधियों के कदाचरण एवं भ्रष्टाचार है,कहावत भी है ‘‘एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है।’’ विगत एक दशक के राजनीतिक एवं संसदीय घटनाक्रम का विश्लेष्ण किया जावे तो इस दौरान सदन के भीतर संसदीय मर्यादा एवं आचरण तार-तार हुआ है।सदन में प्रश्न पूछने के नाम पर सांसदों द्वारा रिश्वतखोरी,सदन में विश्वास प्रस्ताव पर वोट के बदले पैसे सहित अनेक ऐसे मामले उजागर हुए हैं जिसे सारे देश ने अपनी आंखों से देखा है।संसद की कार्यवाहियों में होने वाले व्यवधान,स्थगन तथा बर्हिगमन आदि से संसदीय व्यवस्था पर भी प्रश्न चिन्ह लगा है,क्योंकि संसद की कार्यवाही में होने वाले हर मिनट के लाखों रूपयों का खर्च भी आखिर देश की जनता के गाढ़ी कमाई का ही हिस्सा है।2जी स्पेक्ट्रम मामले में संसद के भीतर हुए हंगामें तथा गतिवरोध संसदीय इतिहास का ऐतिहासिक गतिवरोध रहा है।संसदीय कार्यवाहियों के प्रति सांसदों की घटती अभिरूचि तथा निष्क्रियता चिंताजनक है।कई सांसद एवं विधायक सदन में प्रश्न पूछने तथा महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा से भी हिचकते हैं जिसका नकारात्मक असर सदस्य के प्रतिनिधित्व वाले निर्वाचन क्षेत्र के विकास एवं अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन पर पड़ता है।हालांकि संसदीय सचिवालय द्वारा सदस्यों के प्रबोधन हेतु विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं लेकिन सदस्य इन प्रशिक्षणों से अपने आपकों दूर ही रखते हैं।संसद अथवा सदन में सदस्यों के अनुशासनहीनता एवं अमर्यादित व्यवहार का शिकार अध्यक्षीय आसंदी भी होता है,कई बार तो सदस्य ही आसंदी पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाकर सदन बाधित कर देते हैं,इन घटनाक्रमों से भी सदन की मर्यादा पर विपरीत असर पड़ रहा है।

     बहरहाल संसदीय मर्यादा के पतन के मुद्दे पर जनसामान्य की जवाबदेही पर विचार आवश्यक है।देश एवं राज्य के सदनों के सदस्य का निर्वाचन प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर जनता के ही द्वारा किया जाना है।जनता की यह जवाबदेही होनी चाहिए कि चुनाव में शामिल प्रत्याशी की शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक तथा चारित्रिक पृष्ठभूमि का आंकलन भली-भांति किया जावे।प्रत्याशी जिस राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहा है,उस पार्टी के नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रति सजगता प्रदर्शित करनी चाहिए। चुनाव के दौरान सभी राजनीतिक दल एवं प्रत्याशी चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हैं लेकिन आज तक इतिहास में किसी भी राजनीतिक पार्टी ने सत्ता हासिल करने के बाद अपने घोषणा पत्र को प्राथमिकता नहीं दी है।इस संबंध में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में गैर राजनीतिक संगठन स्थापित होना चाहिए जो कि इन घोषणा पत्रों में उल्लेखित घोषणाओं के क्रियान्वयन की जानकारी अगले चुनाव में सार्वजनिक करें ताकि संबंधित पार्टी एवं प्रत्याशी को सच का आईना दिखाया जा सके।बहरहाल संसद एवं विधान सभा लोकतंत्र के मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारा है, अतएव इसके पवित्रता एवं शुचिता के लिए यह आवश्यक है कि इन सदनों के सदस्य अपने आचरण एवं मर्यादा में आवश्यक सुधार लावे तथा देश की जनता से यह भी अपेक्षा है कि वह सजग होकर इन संस्थाओं की सजग प्रहरी की भूमिका का निर्वहन करें ताकि इन सदनों की मर्यादा एवं विश्वास अक्षुण्ण रह सके।

 

सम्प्रति-लेखक डा.संजय शुक्ला शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय रायपुर में लेक्चरर है।
  
  
  

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