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सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता खतरे में – रघु ठाकुर

                                         रघु ठाकुर

समाचार पत्रों एवं सोशल मीडिया पर भी इस आशय के समाचार प्रकाशित हुये है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सभी न्यायाधीशों को चाय पर बुलाया तथा सर्वोच्च न्यायालय का अन्तर विवाद सुलझ गया है, मुझे खुशी होगी अगर यह खबर सही हो।क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश श्री मदन बी लोकुर, श्री रंजन गोगोई, श्री कुरियन जोसेफ और श्री जे.चेलमेश्वर ने लगभग दो माह पहले लिखे पत्र को प्रेस कान्फ्रेंस के माध्यम से अपना वह सात पेजी पत्र जारी किया था जिसमें उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की कार्य प्रणाली पर प्रश्न उठाये थे-

  1. उन्होंने लिखा था कि वैसे तो सुप्रीम कोर्ट में सभी जज समान होते है।
  2. मुख्य न्यायाधीश केस के बटॅवारे का रोस्टर तैयार करते है और सुनवाई हेतु देते है उनका यह भी आरोप था कि मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने रोस्टर बनाने में और केस सौपने में पारदर्शिंता और निष्पक्षता का निर्वाह नही किया। सुप्रीम कोर्ट स्थापना के इतिहास में यह पहली घटना थी कि जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपने चीफ जस्टिस के विरुद्व खुला आरोप लगाया। सरकारो के द्वारा तो पक्षपात पहले भी होता रहा है और कोलेजियम सिस्टम शुरु होने के पहले तो कई बार सरकारो ने अपनी पंसद के कनिष्ठ जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया तथा इसके प्रतिकार स्वरुप कई बार वरिष्ठ जजो ने त्यागपत्र भी दे दिया परन्तु वह विवाद न्यायपालिका बनाम सरकार को नही है वरन जज साहबान के आपस का है।

पूर्व सीजेआई स्व.जे.एस.वर्मा के कार्यकाल से सुप्रीम कोर्ट के जजो के चयन के लिये कोलेजियम सिस्टम की शुरुआत हुई तथा जजो के चयन में अंतिम निर्णय करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में ले लिया, हांलाकि इस कोलेजियम सिस्टम की भी काफी आलोचना हुई है और सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच यह विवाद चलता रहा है। सरकार अपनी दखल और एक प्रकार से हिस्सेदारी इस चयन प्रक्रिया में चाहती है जबकि सर्वोच्च न्यायालय इसे स्वीकार करने को तैयार नही है। श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकार की ओर से उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के चयन के लिये एक आयोग के गठन का प्रस्ताव आया था परन्तु वह भी निर्णायक बिंदु तक नही पहुंच सका। सुप्रीम कोर्ट के अनेक वरिष्ठ वकीलो ने भी इस कोलेजियम सिस्टम के बारे में आपत्ति व्यक्त की है और यह शंका व आरोप भी लगे है कि जजो की नियुक्ति में परिवारवाद और चेम्बरवाद चलता है।आरक्षित वर्गो और उनकी अपेक्षाओं ने भी न्यायपालिका के चयन को सामजिक रुप से अंसतुलित और आपत्तिजनक माना है तथा समय-समय पर न्यायपालिका में भी आरक्षण की मांग उठाई है। पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने कई बार कई मंचो पर इस बहस को छेड़ा था और लगभग लाचार होकर श्री अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के जमाने में जस्टिस बालकृष्णन को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। अभी हाल में भारत के वर्तमान राष्ट्रपति ने भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक कार्यक्रम में न्यायपालिका में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ावर्ग महिला आदि की हिस्सेदारी को लेकर प्रश्न किया था। इसमें कोई दो राय नही है कि देश के भीतर एक मानसिक अविविश्वास और विभाजन की स्थिति है तथा न्यायपालिका के निर्णयो को जाति आधार पर संदेह से देखा जाता है। इस संशय के निराकरण चाहे काम से या हिस्सेदारी से देर सबेर उच्च न्यायपालिका को करना होगा वरना उसकी विश्वसनीयता सदैव एक हिस्से में सदिग्ध भी रहेगी। हालांकि विवाद जो दो माह पहले लिखे गये पत्र से उठा उसके पीछे भी अनेक कारण और संशय है। जस्टिस लोया जो सोहराबुद्दीन मृत्युकांड की जांच कर रहे थे तथा जिनकी आकस्मिक मौत नागपुर में हुई थी को लेकर उस समय उनके परिजनो ने सरकार को इलाज में लापरवाही के संकेत दिये थे। जस्टिस लोया जिस प्रकरण की सुनवाई कर रहे थे उसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह  मुख्य आरोपी थे और ऐसे संदेह व्यक्त किये गये थे कि जस्टिस लोया की मृत्यु नही हुई होती तो अमित शाह बरी नही हो पाते तथा उन्हें दण्डित होना पड़ता। इस शक व विचार का कोई ठोस तर्क या आधार नही है। परन्तु हमारे देश में व्यवस्था के हर अंग के प्रति इतना अविश्वास पैदा हो चुका है कि आम व्यक्ति भी निराधार संशयों को, या अपुष्ट संशयो को विश्वसनीय मान लेता है। यद्यपि 14 जनवरी को जस्टिस लोया के बेटे ने सार्वजनिक रुप से अपने लिखे हुये पत्र को पत्रकार वार्ता में जारी करते हुये कहा कि मेरे पिता की मौत के मुद्दे को लेकर हमारे परिवार को परेशान न किया जाये, उनकी मौत हृदयघात से हुई थी। इस पर भी उनके चाचा व बहिन ने  संदेह व्यक्त किया है। चार जजो की पत्रकार वार्ता ने लोया प्रकरण की सुनवाई किस जज के पास हो को लेकर मतभेद ने एक ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि श्री दीपक मिश्रा द्वारा यह प्रकरण जानबूझ कर ऐसे जज को दिया गया है जो सत्ता के लिये अनुकूल है। अब लोया के बेटे के खण्डन के बाद उनके बयान पर ही संशय के बादल है कि उनसे बयान भयभीत करके दिलाये गये। मेरे पास दोनो ही पक्षो की कोई प्रमाणिक सूचना नही है न तो जज के सम्भावित पक्षपात के बारे में और न ही निष्पक्षता के बारे में। परन्तु इस घटनाक्रम ने भारतीय लोकतंत्र की एक अर्थ में सर्वोच्च संस्था जिसके पास संविधान की व्याख्या से लेकर कानूनो के मामलो में असीमित अधिकार है को आम लोगो के मन मे संदिग्ध और अविश्वसनीय बना दिया है।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब न्यायपालिका किसी जांच करने वाली संस्था से किसी प्रकरण की जांच करवाती है तो फिर उसकी रिर्पोट को स्वीकार नही करने का उसके पास क्या आधार है तथा क्या न्यायपालिका को स्वतः जांच ऐजेन्सी की भूमिका अदा करना चाहिये। 1991 में हुये हवाला कांड की जांच पी.आई.एल के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा के द्वारा शुरु की गई थी और उन्होंने उसे अपनी निजी निगरानी में कराने की घोषणा की थी। श्री मोती लाल बोरा जो उ.प्र. के राज्यपाल थे और जिनका नाम हवाला के चंदे में उछला था के बारे में सीबीआई ने रिर्पेाट दी थी कि उन पर आरोप नही बनता है परन्तु श्री वर्मा ने सीबीआई की रिर्पोट को अस्वीकार करते हुये एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। इसी आधार पर श्री बोरा को राज्यपाल पद से इस्तीफा देना पड़ा और बाद में एक सीजेएम स्तर के जज ने फैसला दिया कि यह डायरी अकेले कोई प्रमाण नही है और श्री बोरा को दोष मुक्त कर दिया तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश के निर्णय को अप्रभावी कर दिया। हाल में ही यही 2जी स्पेक्ट्रम के मामले को लेकर हुआ, जिसमें एक जिला स्तरीय न्यायाधीश ने इस काण्ड को निराधार बताकर रद्द कर दिया। इन घटनाओं से ऐसा लगता है कि कारपोरेट और राजनीतिक लाबियां अपने हित अहित और मीडिया के माध्यम से अतार्किक या निराधार मुद्दे खड़े कराती है जो एक फौरी हित तो पूरा करती है परन्तु कालांतर में रेत के महल के समान विखर जाती है।

मैं सर्वोच्च न्यायालय से अपील करुगा कि देश के हित में लोकतांत्रिक प्रणाली और सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता बचाने के लिये उन्हें निम्न कदम उठाना चाहिये।

  1. सर्वोच्च न्यायपालिका में राय भिन्न भले हो परन्तु कार्यात्मक एकता हो यह उपाय करें।
  2. न्यायपालिका पक्ष-विपक्ष का राजनैतिक हथियार न बने ताकि उसकी साख कायम रहे।
  3. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्त के बाद किसी भी प्रकार के वैतनिक सुविधा वाले भत्ते वाले, काम या पद पर मनोनयन पर रोक लेगे।

भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश जब सेवानिवृत्ति के बाद एक राज्य के राज्यपाल पद को स्वीकारते है तो वे समूची न्यायपालिका की साख को खतरे में डालते है।

4.सर्वोच्च न्यायालय के कार्य विभाजन के लिये एक ठोस प्रणाली जो तार्किक और विश्वसनीय हो विकसित करें।

5.न्यायपालिका पीआईएल के मामलो की सुनवाई के समय टिप्पणी करना बंद करे क्योंकि इससे बहुत भ्रम फैलता है टिप्पणियां न्याय नही होती है केवल संदेश होता है आदेश नही परन्तु देश उनकी टिप्पणी को आदेश जैसा मानता है और फिर बाद में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा होता है। इन टिप्पणियों के मीडिया के प्रकाशन पर भी कुछ मर्यादा होना चाहिये क्योंकि इनके प्रकाशन से नीचे की न्यायपालिका प्रभावित होती है और यह बीमारी बढ़ रही है।

6.सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट अपने लम्बित प्रकरणो को सूचीबध कराये और उन्हें शीघ्र निराकरण पर जोर लगाये। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जंगल में रहने वाले आदिवासियो की एक जनहित याचिका 17 वर्षो से लम्बित है। आदिवासियों की एक पीढ़ी मर चुकी है परन्तु सुनवाई का नम्बर नही आया। आम तौर पर जज साहब छपास पीड़ा से ग्रस्त होने लगे है तथा उनका ज्यादा समय गैर जरुरी पीआईएल या प्रचारात्मक मामलो पर जाता है इसमें भी स्वःनियंत्रण की आवश्यकता है।

7.सर्वोच्च न्यायपालिका को अपनी कार्यपद्धति से पारदर्शी व विश्वसनीय न्यायप्रणाली विकसित करने का रास्ता सोचना चाहिये और समय समय पर आम जनता  का भी फीड बैक (मंतव्य) लेने का प्रयास करना चाहिये।

न्यायपालिका को अपने चयन के बारे में भी र्निविवाद प्रणाली विकसित करने के बारे में सोचना होगा जो जन विश्वसनीय भी हो और योग्यता चयन तथा सर्वसमाजो की समावेशी भी हो।

 

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक एवं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक है।