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सरकारी नीतियों की वजह से किसानों की खेती में रूचि हो रही है कम – हन्नान

रायपुर 08 जनवरी।अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव हन्नान मौल्ला ने कहा हैं कि सरकारी नीतियों के कारण जो हालात पैदा हुए है उससे निराश किसानों में खेती के प्रति रूचि कम होती जा रही है।किसान खेती छोड़ना चाहते है,आत्महत्याएं कर रहे है,बर्बाद हो रहे है।

नौ बार सांसद रहे हन्नान मौल्ला ने आज यहां किसानों के एक बड़े सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि किसानों को सरकार बजाय राहत देने के उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़क रही है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी डेढ़ गुना दाम के वादे पूरे नहीं कर रहे है,वनाधिकार कानून लागू नहीं कर रहे है।उन्होंने देश में बढ़ती किसान एकता का जिक्र करते हुए कहा कि 187 किसान संगठन कर्ज माफी और पूरे दाम की मांग पर इकट्ठा हुए है।उन्होने उम्मीद जताई कि छत्तीसगढ़ के किसान संगठन व आंदोलन भी इसका हिस्सा बनेंगे।

कृषि विशेषज्ञ व अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने तथ्यों और आंकड़ों के साथ बताया कि 1971 से लेकर आज तक जहाँ बाकी सबकी आमदनी दो से तीन सौ गुना बढ़ गई पर किसान को नाममात्र भी नहीं मिला।लागत का मूल्य तक वसूल न हो पाने के कारण हर 40 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा है।इसी अनुपात में अगर धान-गेहूं के समर्थन मूल्य तय कर दिए जाए तो न किसान खेती छोड़ेगा, न नौजवान खेत छोड़कर भागेगा,न आत्महत्याएं होंगी।उन्होंने कहा कि इसके लिए किसान को अपनी एकता बनानी होगी, इस एकता का इस्तेमाल संघर्ष की चोट और चुनावी वोट में करना होगा।

स्वराज अभियान के नेता योगेन्द्र यादव ने संकल्प सम्मलेन को किसान आन्दोलन की कई धाराओं का संगम बताते हुए इसके आयोजन के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि खेती से जुड़े खाद कंपनी, बीज और कीटनाशक कंपनियां एवं आढतिये व्यापारी सब मालामाल है, सिर्फ किसान ही क्यों तबाह है।इसके लिए उन्होंने सरकार की नीतियों को जिम्मेदार बताया और कहा कि 70 साल से लगातार फसल की कीमतों को दबा कर रखा गया।सरकार की नीतियां ही नहीं,नियत भी ख़राब है।अब किसान इनका समाधान चाहता है, उसे हासिल करने के लिए देश भर के पैमाने पर इकट्ठा हो रहा है।खेती से जुड़े सभी किसानों को पहली बार एक मंच पर लाया गया है।देश के किसानों की मांगों की भी उन्होंने विस्तार से व्याख्या की।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने छतीसगढ़ सरकार द्वारा भू-राजस्व संहिता में किये गए संशोधन को बेहद खतरनाक बताते हुए कहा कि यह आदिवासियों को समाप्त कर देने की बड़ी साजिश का हिस्सा है,जिससे सभी समुदायों को मिल कर लड़ना चाहिए क्योंकि सिर्फ आदिवासियों की ही जल जंगल जमीन और जिंदगी ही खतरे में नहीं पड़ेगी सभी समुदाय संकट में होंगे।