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योगी की ताजपोशी के जरिये भाजपा का सन्देश साफ – राजखन्ना

योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के जरिये भाजपा का सन्देश साफ़ है। 2019 पर उसकी  निगाह है और उसकी जमीन तैयार करने में मोदी-शाह की जोड़ी लगी है। फ़िलहाल मोदी का  चेहरा पार्टी से बड़ा है, इसलिए फैसले भी उन्ही के होते हैं।  पहले 2014 और फिर 2017 में उत्तर प्रदेश में पार्टी या मोदी की बड़ी कामयाबी का आधार जातीय गोलबंदी को तोड़कर हिन्दू मतदाताओं का विपुल समर्थन मिलना था। योगी उस समर्थन को संजो सकते हैं और धार भी दे सकते हैं, इसी भरोसे के साथ पार्टी ने देश के सबसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपने का फैसला किया है। इस फैसले से विपक्षी भाजपा पर हमले तेज करेंगे।नरम हिंदुत्व के हिमायती भाजपा के शुभ चिंतक भी इस निर्णय से चौंकेंगे लेकिन मोदी की राजनीतिक शैली से वाकिफ़ लोगों को शायद ही ताज्जुब हो। प्रधानमंत्री के रूप में सिर्फ भारतीय संविधान में आस्था और शासन में सबका साथ सबका विकास के साथ साथ वह अपने समर्थक वोट बैंक को और संपन्न करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। उ.प्र. में योगी के जरिये उन्होंने इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया है।

योगी जिनकी  पहचान कट्टर हिंदुत्व के पैरोकार के रूप में रही है।मुख्यमंत्री के रूप में बदले अवतार में दिखना होगा। इसका संकेत भी पार्टी विधानमंडल दल का नेता चुने जाने के फौरन बाद उन्होंने प्रदेश के विकास के लिए विधायकों का सहयोग मांग करके दी। योगी की राजनीतिक पूंजी उनकी हिन्दू नेता की छवि और उनके उग्र तेवरों वाले समर्थक हैं। 2017 के चुनाव के पहले वह भाजपा में रहते हुए भी चुनाव के दिनों में पार्टी से रूठते रहे हैं। उनकी हिन्दू वाहिनी अपने अलग उम्मीदवार भी उतारती रही है। मुख्यमंत्री के रूप में योगी की क्या अलग छवि होगी ? अब तक उनका सिर्फ राजनीतिक एजेंडा था जिसमे उनकी निगाह सहधर्मी समर्थकों के अधिकाधिक विस्तार में थी।अब जब वह पूरे प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे तब उन्हें उनके विषय में भी सोचना है और उन्हें भी साथ लेकर चलना है जो उनकी राजनीतिक शैली के चलते सशंकित हैं।उनके पूर्व के मुख्यमंत्रियों द्वारा प्रदेश की बागडोर सँभालते समय सबसे ज्यादा सवाल देश के सबसे बड़े प्रदेश को सँभालने को लेकर उनकी प्रशासनिक काबिलियत को लेकर होते थे।फ़िलहाल योगी की ज्यादा चर्चा उस छवि को लेकर है जो पांच बार की लोकसभा चुनाव की जीत और पूरे प्रदेश के दौरों में उनके उग्र भाषणों के जरिये बनी है।

2013 में जब भाजपा में मोदी का चेहरा आगे हुआ था तो उनकी हिंदूवादी नेता की छवि ने विरोधियों को बेचैन किया था। सयोंग से जब वह मुख्यमंत्री बने थे तब तक वह विधानसभा के कभी सदस्य नहीं रहे थे।प्रधानमंत्री बनने के पहले लोकसभा का अनुभव नहीं था। योगी भी मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार विधानसभा पहुंचेगे।लोकसभा सदस्य का उनके पास लंबा अनुभव है लेकिन शासन की और वह भी सबसे बड़े प्रदेश को संवारने की यह पहली जिम्मेदारी है। वह ऐसे राज्य की बाग़ डोर संभाल रहे हैं जिसमे बढ़ते अपराधों और कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर वह हमेशा हमलावर रहे हैं। बेकाबू पुलिस और राजनीति में पगे नौकरशाहों  से उन्हें दो चार होना है। विकास योजनाओं का भ्रष्टाचार और उसमे नौकरशाही के साथ सत्ता तंत्र की सांठ गाँठ का भी उन्हें सामने करना है। विकास का असली लाभ और बुनियादी सुविधाएँ आम आदमी तक पहुँच सके यह भी उन्हें सुनिश्चित करना है। केंद्र में उनकी सरकार है और प्रान्त भी अब उनके रंग में रंगा है, इसलिए न आरोप की गुंजाइश है और न बचाव का कवच। उनकी सरकार के पास प्रचंड बहुमत है और कुछ कर दिखाने का पूरा मौका । सदन में विपक्ष कमजोर हालत में है लेकिन लोकतंत्र में सरकारें रचनात्मक विरोध से दिशा लेते हुए जन अपेक्षाओं के अनुकूल शासन देती हैं। हर सरकार को यह ख्याल रखना होता है कि सदन के बाहर बैठी जनता उसके काम पर निगाह रखती है। उसके लिए रोज हिसाब करने का मौका नहीं होता लेकिन चुनाव में वह हिसाब चुकता कर देती है। 2022 काफी दूर है लेकिन 2019 उसके मुकाबले काफी पास। योगी के काम का पहला इम्तेहान इसी 2019 में होगा।

 

सम्प्रति..लेखक श्री राजखन्ना वरिष्ठ पत्रकार हैं।उनके राष्ट्रीय एवं समसामायिक मुद्दों पर आलेख प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।