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म.प्र. में बसपा, सपा, गोंगपा, कांग्रेस को सत्ताशीर्ष तक पहुंचा पायेंगी ? – अरुण पटेल

अरूण पटेल

मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोड़ी बनाकर कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में अपने डेढ़ दशक के वनवास को खत्म कर तिरंगी सत्ता के सूर्योदय की ओर बढ़ने के गंभीर प्रयास प्रारंभ कर दिये हैं। कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने संकेत दिया है कि भाजपा की डेढ़ दशक पुरानी सत्ता को कांग्रेस न केवल गंभीर चुनौती देगी बल्कि चुनाव के बाद प्रदेश में अपनी सरकार भी बनायेगी और इसके लिए वह सभी भाजपा विरोधी दलों से समझौते की पहल भी करेगी। इसके साथ ही यह सवाल सामने आ गया है कि क्या बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जनता दल (यू) शरद यादव गुट मिलकर कांग्रेस को प्रदेश के सत्ताशीर्ष तक पहुंचा पायेंगे। कांग्रेस जिस एकजुटता के साथ चुनावी समर में उतरने का दावा कर रही है और यदि वह वास्तव में मतदान के दिन तक एकजुट रह पाती है तथा अन्य दल उसके साथ आ जाते हैं तो फिर वह भाजपा को कड़ी चुनावी टक्कर देने की स्थिति में होगी। जहां तक प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का सवाल है कांग्रेस के लिए बसपा और गोंगपा अधिक मददगार साबित होंगे जबकि कहीं-कहीं सपा और जनता दल (यू) भी उसको टेका लगाने की स्थिति में आ सकते हैं।

कांग्रेस 150 सीटों पर पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है और लगभग 40 से 50 सीटों का वह विभिन्न गुटों, धड़ों व नेताओं और जातिगत समीकरणों को साधने के लिए उपयोग करेगी। लगभग दो दर्जन के आसपास सीटें वह बसपा के लिए छोड़कर दलित मतों का विभाजन रोकने की कोशिश करेगी तो वहीं गोंगपा को लगभग आधा दर्जन सीटें देकर कांग्रेस समर्थित आदिवासी मतदाताओं के विभाजन को रोकने की भी उसकी मंशा है। कुछ सीटें वह समाजवादी पार्टी और जद (यू) के लिए छोड़कर उन्हें भी साथ लाने की कोशिश करेगी।उत्तरप्रदेश से लगे सीमावर्ती इलाकों में बसपा अधिक सक्रिय है और यहीं उसका प्रदेश में सबसे अधिक असर है। ग्वालियर-चंबल, रीवा और सागर संभाग में वह 60 विधानसभा सीटों पर चुनावी गणित को बनाने-बिगाड़ने की हैसियत रखती है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी भाजपा को हराने के लिए किसी भी सीमा तक जाने की बात कह चुकी हैं और कमलनाथ ने भी तालमेल होने की संभावना को नकारा नहीं है, इसलिए दोनों के बीच समझौता होने में कोई अधिक बाधा नजर नहीं आती। कांग्रेस के साथ मिलकर बसपा भाजपा की मुश्किलें बढ़ाते हुए उसे बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। महानगर की शक्ल अख्तियार करते बड़े शहरों में भी बसपा के प्रतिबद्ध मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है। कांग्रेस जो फार्मूला बना रही है उसके अनुसार वह बसपा की जीती हुई सीटों के साथ ही उन सीटों को भी बसपा के लिए आसानी से छोड़ देगी जहां पिछले विधानसभा चुनाव में वह दूसरे स्थान पर थी। इसके साथ ही कुछ उन सीटों को भी बसपा के लिए छोड़ सकती है जहां तीसरे स्थान पर रहने के बाद भी बसपा को अच्छे मत मिले थे।

पिछले तीन विधानसभा चुनाव के नतीजों पर यदि गौर किया जाए तो लगभग 40 से लेकर 45 तक ऐसी विधानसभा सीटें हैं जो कांग्रेस और बसपा के अलग-अलग लड़ने से उनकी झोली में नहीं गिर पाईं तथा भाजपा को चमकीली जीत मिलती रही। 2003 से मध्यप्रदेश का चुनावी परिदृश्य एकदम बदला हुआ है और भाजपा की जड़ें काफी मजबूत हो गयी हैं इसलिए यदि इन तीन चुनावों का ही विश्लेषण किया जाए तो वह पर्याप्त होगा। 2003 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को प्रदेश में 7.26 प्रतिशत मत मिले जो कि 2008 में बढ़कर 8.97 प्रतिशत हो गये। 2013 के विधानसभा चुनाव में उसके मतों में कुछ कमी आई और बसपा ने 6.29 प्रतिशत मत हासिल किए। बहुजन समाज पार्टी एकमात्र ऐसा राजनीतिक दल है जो अपने मतों को दूसरे दलों की ओर मोड़ने में लगभग पूरी तरह सफल रहता है। इन आंकड़ों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि कांग्रेस और बसपा चुनाव पूर्व गठबंधन कर चुनाव लड़ते हैं तो फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच मतों का जो बड़ा अंतर है वह करीबी चुनावी लड़ाई में परिवर्तित हो सकता है।

चूंकि डेढ़ दशक से मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है इसलिए सत्ता विरोधी मतों में कुछ न कुछ इजाफा होता है और यदि उसका भी अनुमान लगा लिया जाए तो फिर कांग्रेस और भाजपा के बीच आंकड़ों के हिसाब से कांटे की टक्कर बन जाती है। 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 42.50 प्रतिशत मत मिले थे जबकि कांग्रेस को 31.61 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। यदि कांग्रेस और बसपा उस समय मिलकर चुनाव लड़तीं तो दोनों का प्रतिशत लगभग 40 के काफी करीब रहता। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 37.64 प्रतिशत मत मिले थे और कांग्रेस को 32.39 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा के मतों में यह कमी इसलिए आई थी क्योंकि उमा भारती ने भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और उसे 4.71 प्रतिशत मत मिले थे। यदि इन मतों को भी भाजपा के मतों में जोड़ दिया जाए तो बसपा और कांग्रेस दोनों को मिले मत इन दोनों को मिले मतों में कोई ज्यादा फर्क नहीं रह जाता। इसी प्रकार 2013 के विधानसभा चुनाव को देखा जाए तो इस बार भाजपा को 44.88 प्रतिशत मत मिले जबकि कांग्रेस को 36.38 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। बसपा और कांग्रेस के मत मिलने के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच मतों की खाई इतनी अधिक नहीं रह जाती जिसे कि पाटा न जा सके।

कांग्रेस, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से भी समझौता करने के संकेत दे रही है। इस पार्टी का महाकौशल और विंध्य क्षेत्र के कुछ आदिवासी इलाकों में असर है। 2003 के विधानसभा चुनाव में गोंगपा को 2.03 प्रतिशत मत मिले थे और उसके तीन विधायक जीते थे। 2008 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी में विभाजन हो गया लेकिन इसके अलग-अलग धड़े मिलकर आदिवासी इलाकों में कांग्रेस के वोटों में कुछ न कुछ सेंध लगाने में सफल रहे। गोंगपा के उस धड़े का असर कुछ अधिक है जिसकी अगुवाई हीरासिंह मरकाम करते हैं। उन्होंने शहडोल लोकसभा उपचुनाव लड़ा था जिसमें उन्हें 50 हजार से अधिक मत मिले थे। कांग्रेस की कोशिश यह है कि जहां तक संभव हो गोंगपा के सभी धड़ों को कुछ न कुछ सीटें देकर उन्हें अपने साथ लाने में सफल हो। 2017 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का समझौता हुआ था और मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस की कोशिश है कि सपा उसकी सहयोगी बने। 2003 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 3.71 प्रतिशत मत मिले थे और उसने विधानसभा की सात सीटें भी जीती थीं। 2008 में समाजवादी पार्टी को 1.99 प्रतिशत मत मिले और उसने केवल एक सीट जीती। 2013 के विधानसभा चुनाव में उसे 1.20 प्रतिशत मत मिले, हालांकि उसे सीट एक भी नहीं मिली। उत्तरप्रदेश से लगे कुछ विधानसभा क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी का असर है और यदि वह कांग्रेस से मिलकर लड़ती है तो उसके मतों में लगभग 2 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। मध्यप्रदेश में जनता दल (यू) हालांकि दो धड़ों में बंट चुका है। प्रदेश में वही धड़ा चुनावी राजनीति में कुछ असर दिखा पायेगा जिसकी अगुवाई राष्ट्रीय स्तर पर शरद यादव करते हैं। मध्यप्रदेश में वही असली जेडीयू है जिसके साथ शरद यादव हैं क्योंकि इसके नाम पर सारी जमावट शरद यादव ने ही कर रखी है। महाकौशल के कुछ हिस्सों और झाबुआ इलाके में भी इस दल का कुछ असर है। 2003 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को 0.55 प्रतिशत, 2008 में 0.28 प्रतिशत और 2013 में जेडीयू को 0.25 प्रतिशत मत मिले। कुल मिलाकर सपा और जेडीयू के पास प्रदेश में लगभग 2 प्रतिशत मत हैं। इसके अलावा लगभग 2 प्रतिशत मत उन अन्य दलों के साथ हैं जो भाजपा के स्थान पर कांग्रेस को स्वाभाविक ढंग से पसंद करते हैं। देखने की बात यही होगी कि 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा, गोंगपा और सपा मिलकर कांग्रेस को सत्ताशीर्ष तक पहुंचा पाती हैं या नहीं।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।