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म.प्र. में आपसी समन्वय और घर वापसी अभियान पर ‘दिग्विजय’- अरुण पटेल

अरूण पटेल

पिछले दो दशक से भी अधिक समय से कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या गुटबंदी के दलदल में फंसा होना और सभी बड़े नेताओं के द्वारा अपनी-अपनी अंध-महत्वाकांक्षाओं के घोड़े अलग-अलग दिशाओं में दौड़ाना रहा है। यह आम धारणा कांग्रेसजनों के बीच है कि कांग्रेस को कांग्रेस ही हराती है। डेढ़ दशक से कांग्रेस मध्यप्रदेश में सत्ता से दूर है और वह इस बार पूरी गंभीरता से सत्ताशीर्ष पर पहुंचने के लिए सधे हुए कदमों से आगे बढ़ रही है। कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी को दूर करने का बीड़ा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस की प्रादेशिक समन्वय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ने उठाया है। कांग्रेस के नेता भी लगता है अब एक दिशा में चलने और मिलजुल कर चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं। इसका संकेत इस बात से मिलता है कि दिग्विजय सिंह के आमंत्रण पर प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया राघवगढ़ के किले में भोजन करने गये तो वहीं दूसरी ओर दिग्विजय सिंह ग्वालियर-चम्बल संभाग के अपने उन समर्थकों को लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के दिल्ली आवास पर पहुंचे जिनकी गिनती महल-विरोधी कांग्रेसियों में होती आई है। वहां बैठकर उन्होंने सबको आपस में मिलाने का प्रयास किया।

इसी तरह सत्यव्रत चतुर्वेदी की दिग्विजय सिंह से दूरियां किसी से छिपी नहीं हैं और पहले वे दिग्विजय सिंह पर तीखे से तीखा राजनीतिक हमला व तल्ख टिप्पणी करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। लेकिन अब वे भी अपने सारे गिले-शिकवे भूल कर समन्वय समिति के सदस्य के रूप में दिग्विजय के साथ एकता व समन्वय यात्रा में शामिल हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाये गये व रूठे अरुण यादव को मनाने के लिए भी दिग्विजय ने पहल की और उनके घर गये। लगता है कि वे पहले सभी बड़े नेताओं के साथ ही उन नेताओं के क्षेत्रों में जिनसे उनकी दूरियां हैं उनसे नजदीकियां बनाने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इस प्रकार दिग्विजय कांग्रेसियों के बीच आपस में समन्वय और कांग्रेस छोड़कर गए नेताओं की घर वापसी के अभियान पर निकल पड़े हैं। उनका यह अभियान अब तीन माह तक निरन्तर जारी रहेगा। ज्योतिरादित्य जिस खुलेपन और आत्मीयता से दिग्विजय सिंह के पैतृक निवास राघवगढ़ के किले में उनके पुत्र विधायक जयवर्धन सिंह के साथ नजर आये और दोनों की जिस प्रकार की बॉडी लैंग्वेज थी, उसको देखकर यह अंदाजा सहज ही लग जाता है कि राजा और महाराजा के बीच जो दूरियां रही हैं वे अब नजदीकियों में बदल रही हैं। इसी प्रकार सत्यव्रत चतुर्वेदी और दिग्विजय सिंह जब मिले तो इस अंदाज में मिले जैसे बहुत पुराना बिछड़ा हुआ दोस्त मिल गया हो। यात्रा के दौरान वे एक-दूसरे से ऐसे घुलते-मिलते देखे गये जैसे कभी उनके बीच में दूरियां व गुटबाजी न रही हो।  दोनों नेताओं की बॉडी लैंग्वेज से भी यही संकेत मिलते हैं कि आपसी गिले-शिकवे भूलकर इनका मकसद आपस में मिलकर पहले चुनावी लड़ाई में उतरना है। कांग्रेस के जो अन्य नेता हैं उनके आपसी रिश्तों में उतनी कड़वाहट नहीं है क्योंकि वे सभी कभी न कभी अर्जुनसिंह के नजदीक रहे हैं। जिस प्रकार ये दो धुर-विरोधी नेता अपने बीच के मतभेद भूलकर पार्टी में एकता की मसाल लेकर निकल पड़े हैं उसका कितना असर होता है यह आने वाले समय में उस समय पता चल सकेगा जबकि अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी ही समरसता की केमेस्ट्री अन्य कांग्रेसजनों के बीच भी देखने को मिलती है या नहीं। इस यात्रा में समिति के सदस्यों के साथ ही दिग्विजय सिंह की धर्मपत्नी अमृता राय भी हैं जिन्होंने अपने पति के साथ नर्मदा परिक्रमा की थी।

दिग्विजय कांग्रेसियों को अन्न-जल की कसम दिला रहे हैं और टीकमगढ़ तथा छतरपुर जिले में पहुंचकर उन्होंने उनसे केवल पंजे पर ही वोट देने का संकल्प लेने को कह रहे हैं। दिग्विजय कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि कांग्रेस इकट्ठी हो जायेगी तो भाजपा कभी चुनाव जीत नहीं सकती। वे कार्यकर्ताओं से यह भी पूछते हैं कि इकट्ठे हो जाओगे, तो कार्यकर्ता जवाब देते हैं- हाँ इकट्ठे हो जायेंगे। पंगत में संगत का उल्लेख करते हुए दिग्विजय पहले कार्यकर्ताओं से पूछते हैं कि पंगत में तो बैठोगे और एकता रहेगी न, तो कार्यकर्ता हां कह देते हैं, तब वे कहते हैं कि अन्न-जल के सामने बैठकर शपथ लेंगे कि वोट देंगे तो पंजे को वोट देंगे, बाकी जो होगा सो देखा जायेगा। भाजपा पर तीखा हमला करने का मंत्र कार्यकर्ताओं को देते हुए दिग्विजय बताते हैं कि लफ्फाजी और झूठ बोलने के सिवाय भाजपा सरकारों के पास कोई दूसरा काम नहीं है। जितना नरेंद्र मोदी झूठ बोलते हैं उतना ही शिवराज सिंह चौहान भी झूठ बोलते हैं। ये दोनों केवल अपनी दुकान झूठ पर चलाये हुए हैं और लोगों के बीच भ्रम फैलाये हुए हैं, हम सबको इसे उजागर करने लिए एकजुट होना होगा। कार्यकर्ताओं को यह याद दिलाना भी वे नहीं भूलते कि पार्टी ने उन्हें हमेशा मान-सम्मान दिया है और पार्टी से ही उनकी पहचान है। कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम करेंगे तो पार्टी उनके सम्मान की रक्षा करेगी। बिना स्वार्थ के पार्टी हित में जी-जान से जुट जाने पर दिग्विजय विशेष जोर दे रहे हैं।

एकता यात्रा की विशेषता यह है कि समन्वय समिति के सभी सदस्य एक बस से ही यात्रा कर रहे हैं। सत्यव्रत चतुर्वेदी के निवास टोरिया हाउस पर जाकर दिग्विजय ने मीडिया से चर्चा की और दोनों नेताओं ने यात्रा के दौरान यही संदेश देने की कोशिश की कि अब हम सब एक हैं और हमारा लक्ष्य केवल विधानसभा चुनाव जीतना है। साफ्ट हिंदुत्व की जिस लाइन पर कांग्रेस गुजरात चुनाव के समय से चल रही है उसे दिग्विजय आगे बढ़ा रहे हैं और यही कारण है कि भगवान राम के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद लेकर ही उन्होंने यात्रा की श्ाुरुआत की। अतिशय क्षेत्र पपौराजी में जैन सन्त शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराजजी से भी उन्होंने आशीर्वाद लिया। सत्यव्रत चतुर्वेदी के साथ आने का महत्व इसलिए भी है क्योंकि एक तो उनकी दिग्विजय सिंह से दूरियां रही हैं और दूसरे सत्यव्रत इस अंचल के ब्राह्मण समाज के एक बड़े चेहरे हैं। बुंदेलखंड में उनकी एकता यात्रा पूरी तरह उस समय तक सफल नहीं हो सकती थी जब तक कि सत्यव्रत साथ न होते।

समन्वय समिति की एकता यात्रा का एक मकसद यह भी है कि कांग्रेस छोड़कर जो नेता गए हैं या विद्रोही बनकर चुनाव लड़े हैं उनकी भी घर-वापसी के प्रयास किए जायें। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव का कहना है कि वे 6 जून के राहुल गांधी के मंदसौर प्रवास के बाद उनसे मिलकर यह अनुरोध करेंगे कि घर-वापसी अभियान का कोई क्राइट एरिया भी तय किया जाए। जहां तक यादव जो सवाल उठा रहे हैं उसकी अनदेखी करना शायद कांग्रेस को मजबूत करने की जगह कुछ कमजोर कर सकता है और उन निष्ठावान पार्टीजनों को हताश कर सकता है जो हर परिस्थिति में पार्टी से जुड़े रहे हैं। खासकर दो-तीन प्रकरण ऐसे हुए हैं और यदि उन नेताओं की पार्टी में वापसी होती है तो उससे कोई अच्छा संदेश नहीं जायेगा। कम से कम उन नेताओं को वापस लेने के पूर्व इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि किस मौके व किस अवसर पर उन्होंने पार्टी का साथ छोड़ा और उससे पार्टी को कितना खामियाजा भुगतना पड़ा।

कांग्रेस के चुनावी समर में कूदने से पहले यदि हॉकी की भाषा में कहा जाए तो सर्वप्रथम उसे पेनाल्टी स्ट्रोक को गोल में तब्दील करने की महारत हासिल करना होगी और दूसरे ऐन मौके पर मैच के अंतिम क्षणों में अति उत्साह में सेल्फ गोल मारने वाले नेताओं से भी बचना होगा। हाल ही में चार लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में भाजपा की हार के बाद भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने तंज कसा था कि पार्टी दरबारी, सरकारी और बाहरी लोगों से भरी है। यह बात भले ही उन्होंने भाजपा के संदर्भ में कही हो लेकिन इस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को है कि जिम्मेदारियां देते समय एवं घर-वापसी के समय दरबारी और बाहरी लोगों का वर्चस्व पार्टी में न होने पाये।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।