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बचपन पर भारी बस्ते का बोझ -डा.संजय शुक्ला

स्कूल के भारी बस्ते से बच्चे किस कदर परेशान हैं इसकी बानगी बीते दिनों महाराष्ट्र के चंद्रपुर प्रेस क्लब में देखने को मिली जब कक्षा सातवीं में पढ़ने वाले 12 वर्ष के दो बच्चों ने इस समस्या पर प्रेस कांफ्रेस लेने की पेशकश करते हुए भूख हड़ताल की चेतावनी दे डाली। वर्ष 1993 में प्रो. यशपाल समिति ने प्रायमरी से लेकर माध्यमिक कक्षाओं तक बस्ते के बोझ को हल्का करने के लिए सुझाव सरकार को सौंपे थे उसके बाद से ही देश में इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है। बढ़ती कक्षा के साथ वजनी होते बस्ते की समस्या से शिक्षाविद् और समाजशास्त्री भी चिंतित हैं। वहीं साल 2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुझाव दिया था कि बस्ते का वजन बच्चे के वजन से दस फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इस साल के शुरूआत में मुंबई हाईकोर्ट ने एक समिति के सिफारिशों के आधार पर स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के दिशा-निर्देश जारी किए थे।

प्रो.यशपाल समिति ने बस्ते के बोझ के कारणों की शिनाख्त की थी तथा समिति ने स्कूली पाठ्यक्रमों को जरूरत से ज्यादा जटिल होने तथा बड़े दिमागी बोझ के रूप में परिभाषित किया था। इस समिति ने आडियो-विजुअल सामग्री का इस्तेमाल बढ़ाने किताबें और होमवर्क कम करने तथा दूसरी कक्षा तक बस्ते का झंझट खत्म करने की सिफारिशें की थी। सरकार ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानि एन.सी.ई.आर.टी. को समिति के रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम तैयार करने की जवाबदेही सौंपी थी। सन् 2000 में एन.सी.ई.आर.टी. ने नया पाठ्यक्रम बनाते समय समिति के सिफारिशों को ध्यान रखते हुए यह विचार किया कि देश के स्कूली पाठ्यक्रमों से अनावश्यक और सारहीन विषय वस्तुओं को निकाला जाये तथा आज की जरूरतों के चीजें शामिल की जावे, लेकिन बाद में इस पाठ्यक्रम पर भी विवाद होने लगा। चालीस के दशक में गुजराती भाषा के लेखक और महान शिक्षाशास्त्री गिजुभाई बधेका ने बाल मनोविज्ञान और बचपन पर किए गए अपने प्रयोगों और अनुभव के आधार पर कहा था कि प्राथमिक शिक्षा में बच्चों को चित्र, नाटक और खेलकूद के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए न कि उन पर किताबों का बोझ लादना चाहिए। गिजूभाई का विचार प्रो.यशपाल समिति की रिपोर्ट से मेल खाती है, उनकी किताब ‘‘दिवास्वप्न’’ नवाचार शैक्षणिक प्रयोगों का एक जीवंत दस्तावेज है।

बहरहाल हर समितियों की तरह प्रो.यशपाल समिति की रिपोर्ट भी राजनीतिक दांव-पेंच और लालफीताशाही के चलते मंत्रालयों में धूल खा रही है और बच्चे स्कूल बैग के बोझ तले दबते चले जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया हो, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानि सी.बी.एस.ई. जैसे संगठनों ने प्राथमिक से लेकर माध्यमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए वजन निर्धारित कर रखा है। केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने इसे अमल में लाने का प्रयास भी किया है। लेकिन प्रश्न यह है कि केवल सरकारी स्कूलों में ही इसे लागू करने से क्या फायदा जबकि बच्चों की एक बड़ी तादाद निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं ? सी.बी.एस.ई. के मुताबिक कक्षा दूसरी के बच्चों के लिए अधिकतम 2 किलोग्राम, कक्षा चार तक के लिए 3 कि.ग्रा. तथा कक्षा छह तक अधिकतम 4 कि.ग्रा. बस्ते का वजन होना चाहिए। विडंबना है कि स्कूली बस्ते का औसत न्यूनतम वजन 5-7 किलोग्राम से 10-12 कि.ग्रा. तक पहुंच गयी है। अनुमान लगाया जाये कि इतने वजन के बस्ते को पीठ में लाद कर बच्चा स्कूल के दूसरी या तीसरी मंजिल की अपनी कक्षा तक कैसे पहुंचता होगा? इस भारी भरकम बोझ से उसके सेहत पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता होगा ? चिकित्सकों की मानें तो बस्ते के भारी बोझ के चलते बच्चों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों के हाथ, पैर, कमर, कंधो, पीठ के साथ रीढ़ की हड्डियों में दर्द की शिकायतें आम है।इसके साथ ही बच्चा जब भारी बैग लाद कर चलता हैं या सीढ़ियां चढ़ता हैं तो उसके छाती में दबाव बढ़ता है जिसके कारण उसे श्वांस लेने में दिक्कते भी आने लगती है। इसके अलावा थकावट के चलते चिड़चिड़ापन, अवसाद एवं भूख में कमी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी परिलक्षित हो रही है। परिणामस्वरूप बच्चों का शारीरिक विकास भी प्रभावित हो रहा है।

बस्ते के बढ़ते बोझ के कारणों का आंकलन किया जावे तो इसके लिए सीधे तौर पर सरकार, समाज और पालक वर्ग जिम्मेदार । यह अतिश्योक्ति नहीं होगी भारत में सबसे ज्यादा प्रयोग शिक्षा के ही क्षेत्र में हुआ है, लेकिन यह भी सत्य है लार्ड मैकाले से लेकर अब तक बने सभी शिक्षा संबंधी कई आयोगों व नीतियों के जरिए व्यवस्था में सुधार की कवायदों के नतीजें सिफर ही रहे हैं। भारत की खस्ताहाल सरकारी बुनियादी शिक्षा व्यवस्था के चलते आर्थिक रूप से थोड़ा सा भी सक्षम पालक अपने बच्चे को सरकारी स्कूल की जगह निजी स्कूलों में दाखिला दिला रहा है। देश में शिक्षा का बढ़ता निजीकरण, गलाकाट प्रतिस्पर्धाएं तथा पालकों के अपने बच्चों से बढ़ती अपेक्षाओं ने बस्तों के बोझ में भारी ईजाफा किया है। निजी स्कूल प्रबंधन पालकों एवं बच्चों पर एन.सी.ई.आर.टी. की पतली और किफायती पुस्तकों की जगह निजी प्रकाशकों की मोटी और महंगी पुस्तकें खरीदने के लिए बेजा दबाव बनाते हैं। इस दबाव के सामने पालक भी मजबूर रहते हैं फलस्वरूप बच्चे जहां पुस्तक कापियों के वजन ढोने के लिए विवश है वहीं पालकों का आर्थिक शोषण भी बदस्तूर जारी है। दरअसल इसके पृष्ठभूमि में प्रकाशकों, शिक्षा संस्थानों तथा दूकानदारों का वह गठजोड़ है जिसके मूल में निजी स्कूल प्रबंधन को मिलने वाला मोटा कमीशन है।दरअसल विकास के नाम पर भारत में स्कूली शिक्षा के निजीकरण की वकालत करने वाले विशेषज्ञों को यह जानना जरूरी है कि हमसे आर्थिक रूप से पिछड़े देश श्रीलंका सामाजिक संकेतकों खासकर स्कूली शिक्षा के संदर्भ में भारत से बहुत आगे खड़ा है, वहां कोई भी निजी स्कूल नहीं है। वहीं हमसे विकसित देश अमरीका में शिक्षा सरकार की जवाबदेही है।

गौरतलब है कि सूचना क्रांति के इस दौर में दुनिया भर के देशों में बच्चों पर बस्तों का बोझ कम करने के तरीके निकाले गए हैं वहां बच्चों की रूचि व ग्रहण क्षमता के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन भारत में आज भी प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में रूढ़िवादी व्यवस्था कायम है। बहरहाल नौनिहालों की भारी बस्ते की बर्बरता से मुक्ति दिलाने के लिए अब सरकार को कारगर और ठोस शिक्षा नीति बनानी होगी, इस दिशा में यशपाल समिति की रिपोर्ट को लागू करना सार्थक कदम हो सकता है।

 

सम्प्रति-लेखक डा.संजय शुक्ला शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में लेक्चरर है।