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जीएसटी तंत्र से छोटे-मंझोले डीलर्स की बढ़ी परेशानी, उदासीन है सरकार-राज खन्ना

                                      राज खन्ना

जीएसटी लागू करने की कामयाबी से गदगद केंद्र सरकार उसके अनुपालन में हो रही कठिनाइयों के निदान में फिसड्डी साबित हो रही है।उधर रिटर्न के दाखिले और पचास हजार से अधिक मूल्य के माल परिवहन में इलेक्ट्रानिक वे बिल की व्यवस्था लागू करने के मामले में भी वायदों और पूर्व घोषणाओं से भिन्न आदेशों ने डीलर्स, जीएसटी के वकीलों और सीए तक को सांसत में डाल दिया है।

जीएसटी काउंसिल ने शुरुआती दो महीनो जुलाई, अगस्त के मासिक रिटर्न दाखिले में समय की ढील देने की घोषणाएं की थीं।इसके मुताबिक जुलाई महीने के रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया पांच सितंबर से शुरू होने थी। यह व्यवस्था तो पूर्ववत कायम है लेकिन इसी बीच जुलाई महीने की खरीद-बिक्री की समरी और उसके मुताबिक देय कर की अदायगी की आखिरी तारीख 20 अगस्त तय करते हुए जीएसटी आर 3 बी आनलाइन पेश करने की नई शर्त जोड़ दी गई। इस नई शर्त ने जुलाई के रिटर्न दाखिले के लिए बढ़ी तारीख की घोषणा को बेमतलब कर दिया। उधर जब डीलर्स ने पूर्व के अवशेष आईटीसी का जुलाई के फार्म 3 बी में समायोजन न मिलने की शिकायत की तो इसकी तारीख 28 अगस्त तक बढ़ाने के साथ ऐसे डीलर्स के लिए ट्रांस 1 दाखिल करने की नई शर्त जोड़ दी। डीलर्स की दिक्कतें यहीं नहीं खत्म हो रहीं। ऐसे डीलर्स जो आन लाइन बैंकिंग नहीं कर पाते उन्हें टैक्स अदायगी में नाको चने चबाने पड़ रहे हैं।

छोटे जिलों में बैंकों की शाखाएं आरटीजीएस/नेफ्ट के जरिए टैक्स जमा कराने में आनाकानी कर रही हैं। केवल 10 हजार तक की ही राशि के चालान नकद जमा करने की छूट है और बैंक इसे भी करने को तैयार नहीं हैं। जीएसटी का तंत्र किस हद तक डीलर्स की परेशानी का सबब बन रहा है, इसका पता इस बात से चलता है कि जुलाई के अंतरिम रिटर्न में प्रदेश बाहर से की गई खरीद पर चुकता आई जीएसटी का समायोजन लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस नए कानून में सबसे बड़ी समस्या उत्तर प्रदेश वैट अधिनियम में पंजीकृत उन डीलर्स के लिए है, जो लाख कोशिशों के बावजूद अब तक जीएसटी की प्रविजनल आईडी नहीं प्राप्त कर सके हैं। उत्तर प्रदेश वाणिज्य कर विभाग के अनुसार ऐसे डीलर प्रविजनल आईडी अप्राप्त के उल्लेख के साथ दो महीने व्यापार कर सकते हैं। ऐसे डीलर्स की मजबूरी है कि न ही उन्हें चुकाए कर का लाभ मिल सकता है और न ही उनके लिए जीएसटी आर 3 बी दाखिल करना संभव है। वाणिज्य कर विभाग से लेकर जीएसटी नेट वर्क की तमाम हेल्प डेस्क पर अपनी शिकायतें डाल कर निराश हुए अनेक डीलर्स ने पुराने टिन के उल्लेख के साथ अगस्त महीने में जीएसटी के नए पंजीयन प्राप्त किये। उनके सामने नई समस्या यह है कि उनके जुलाई के 3बी को पोर्टल स्वीकार ही नहीं कर रहा। अधूरी तैयारी और राज्य के वाणिज्य कर विभाग से कमजोर समन्वय के कारण रजिस्ट्रेशन के शुरुआती दौर में ही डीलर्स हांफ गए हैं। रजिस्ट्रेशन आवेदन में ट्रेड के मुताबिक कोड के स्थान पर प्रत्येक वस्तु के अलग कोड हैं। रजिस्ट्रेशन आवेदन पांच से अधिक एचएसएन कोड स्वीकार नहीं करता। ऐसे में अनेक वस्तुओं का व्यापार करने वाले किराना- बिसातखाना जैसे तमाम व्यापारों से जुड़े डीलर्स रास्ते की चेकिंग को लेकर काफी आशांकित हैं।

पचहत्तर लाख तक की बिक्री करने वाले छोटे डीलर्स के लिए पेश की गई समाधान योजना भी अपने मकसद को पूरी करती नजर नहीं आ रही। इसमें दाखिले की तारीख 21 जुलाई से 16 अगस्त तक के लिए बढ़ाई गई। जब तमाम पुराने डीलर्स को  जीएसटी की प्राविजनल आई डी ही अभी तक नहीं दी गई तो उनका समाधान योजना में प्रवेश कैसे संभव हो सकता था। उधर पिछले एक पखवारे के बीच जिन डीलर्स ने समाधान योजना में प्रवेश के आनलाइन आवेदन का प्रयास किया उन्हें स्क्रीन पर चालू वर्ष 2017-18 के स्थान पर आगामी वर्ष 2018-19 का विकल्प दिखाकर निराश किया गया। देश भर से इसकी शिकायत के बाद भी इस कमी को दूर नहीं किया जा सका। अगर दूसरी बार समाधान की तिथि नहीं बढ़ती तो योजना से जुड़ने के इच्छुक बड़ी संख्या में छोटे व्यापारियों को सामान्य डीलर्स की तरह जीएसटी की पेचीदगियों को पार पाना होगा।

एक राष्ट्र एक कर के स्लोगन के साथ प्रचारित कर की इस नई प्रणाली में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश ने अभी से ही अलग राह पकड़नी शुरू कर दी है। जीएसटी काउंसिल पचास हजार से अधिक मूल्य के माल के परिवहन के लिए इलेक्ट्रानिक वे बिल की व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। इसकी संभावित तिथि एक अक्टूबर है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार जिसने शुरुआती दो महीने अपनी प्रवर्तन इकाइयों को सड़कों से दूर रखने की घोषणा की थी, अपनी घोषणा से पीछे हट गई है। उसने उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रानिक वे बिल व्यवस्था 16 अगस्त से लागू कर दी है। जांच इकाइयां डेढ़ महीने के सूखे के बाद फिर से हरकत में हैं। व्यापारिक संगठन राज्य सरकार के इस फैसले से नाराज हैं। सवाल कर रहे हैं कि फिर केंद्रीय जीएसटी काउंसिल का क्या मतलब है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि जुलाई महीने की खरीद-बिक्री और कर की स्थिति 20 अगस्त तक साफ होगी तो फिर कर वंचन की आशंका में पूरे देश से अलग उत्तर प्रदेश में 16 अगस्त से वे बिल व्यवस्था क्यों लागू की गई है?

सरकारी दावों के विपरीत खासतौर पर छोटे स्थानों के छोटे-मंझोले व्यापारियों के लिए जीएसटी की पेचीदगियां और उसका आनलाइन अनुपालन सिरदर्द बना हुआ है। कर की बड़ी दरों के साथ ही उन्हें लेकर भ्रम की स्थिति और जल्दी-जल्दी परिवर्तन अलग परेशानियां खड़ी कर रहे हैं। सच तो यह है कि व्यापारियों के मददगार वकील, सीए और कर विभाग के अधिकारी भी तमाम मुद्दों पर अपने को आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं। सेमिनार-सभाओं में जीएसटी पर ज्ञान परोसने वाले भी मान रहे हैं कि व्यवहार में यह बेहद उलझाऊ कानून है। सरकार इस नए कानून के अनुपालन में आने वाली कठिनाइयों के लिए अपने स्तर से जानकारी लेने और उसके निदान की कोशिशों के दावे भले करे लेकिन कर वंचन की रोकथाम के नाम पर उसकी बड़ी तैयारी ने छोटे- मंझोले डीलर्स के लिए व्यापार बेहद मुश्किल कर दिया है। न्यू इंडिया की दौड़ में सरकार जमीनी सच्चाइयों से आंखे मूंद रही है। सरकार समझने को तैयार नहीं है कि व्यापार जगत का बड़ा हिस्सा ऐसे छोटे व्यापारियों का है जो अभी उसकी उम्मीदों के मुताबिक हाई टेक नहीं हो पाया है। उसकी असली समस्या कर अदायगी नहीं बल्कि इस कानून के अनुपालन की उलझाऊ हाई टेक तकनीक है।

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना जाने माने वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना कर मामलों के विशेषज्ञ भी है।