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जिन्होंने ‘अमित’ की नहीं सुनी वे ‘सौदान’ की क्या सुनेंगे ? – अरुण पटेल

अरूण पटेल

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर तीन दिन तक भोपाल में डेरा जमाये भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री सौदान सिंह की अनुभवी और पारखी नजरों ने इस बात को ताड़ने में तनिक भी गफलत नहीं की कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने तीन दिवसीय भोपाल प्रवास के दौरान संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए जो निर्देश दिए थे उनका तनिक भी पालन मध्यप्रदेश में राज्य संगठन ने नहीं किया है।

सौदान सिंह ने लगातार दो बैठकों में दो-टूक शब्दों में कहा कि कार्यकर्ताओं का मानस और जन-मानस महसूस कर रहा है कि इस बार मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं बन रही है। कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है और वे न तो सरकार की उपलब्धियों की चर्चा कर रहे हैं और न ही विरोधियों के दुष्प्रचार और राजनीतिक हमले का कोई जोरदार उत्तर दे रहे हैं। उन्होंने हिदायत के लहजे में कहा कि अब सक्रिय होकर इस धारणा को बदलना होगा और कार्यकर्ताओं को उत्साहित करना होगा। अमितजी ने जो बताया था उसको तेजी से अन्जाम देना चाहिये और यदि अभी नहीं देंगे तो क्या अमित शाह के निर्देशों पर चुनाव बाद अमल करेंगे। देखने की बात यही होगी कि अमित शाह के द्वारा दिए गए निर्देशों पर जब छ: माह बीत जाने के बाद भी संगठनात्मक स्तर पर प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने कोई ऐसी पहल नहीं की जिससे लगे कि संगठन सक्रिय हो रहा है, तब सह-संगठन महासचिव सौदान सिंह की बातों को वे कितनी गंभीरता से लेंगे और उन पर इसका कितना असर होगा।

लगभग छह माह पूर्व शाह ने तीन दिन तक भोपाल में रहकर संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए जो निर्देश दिए थे उनमें से अधिकांश पर न तो ध्यान दिया गया और न ही उन्हें अमल में लाने के प्रति प्रदेश अध्यक्ष ने कोई विशेष रुचि दिखाई। चुनाव के लिए अब लगभग आठ माह का समय शेष रह गया ऐसे में सौदान सिंह द्वारा दिए गए टिप्स जो कि चौथी बार राज्य में भाजपा की सरकार बनाने के लिए एक मजबूत आधारभूमि तैयार कर सकते हैं, उन पर कितना अमल हो पायेगा और यह अमल नंदू भैया करेंगे या उनकी जगह आने वाला कोई नया उत्तराधिकारी। अब पार्टी के पास समय की कमी है इसलिए उत्तराधिकारी आयेगा या नहीं आयेगा, या कब आयेगा इसकी उम्मीद में हाथ पर हाथ रखकर बैठने की जगह यदि जमीनी धरातल पर चुनाव की दृष्टि से पार्टी को चुस्त-दुरुस्त करना है तो उसकी पहल तुरन्त करनी होगी। सौदान सिंह से संगठन की कमजोरी और कहां क्या कमी है उसे ताड़ने में तनिक भी गफलत इसलिए नहीं हुई क्योंकि वे नब्बे के दशक में भोपाल में संभागीय संगठन मंत्री रह चुके हैं। मध्यप्रदेश की जितनी गहराई से उन्हें जानकारी है उतनी भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम पदाधिकारियों को है, क्योंकि वे संगठन के हालातों की नस-नस से वाकिफ हैं। यही वजह रही कि उन्होंने तुरन्त भांप लिया कि शाह ने जो निर्देशों दिए थे, उन पर प्रदेश संगठन ने तनिक भी तवज्जो नहीं दी।

शाह ने निर्देश दिया था कि हर जिले में समस्या-निदान शिविर आयोजित किए जायें, जिसमें कि प्रभारी मंत्री के साथ ही जिले के विभिन्न विभागों के अधिकारी भी उपस्थित रहें ताकि तत्काल मौके पर ही जन-समस्याओं का निराकरण किया जाये। छ: माह बीत जाने के बाद भी संगठन ने समस्या-निदान शिविर लगाने के बारे में कोई पहल नहीं की। ये शिविर लगाने की सलाह देने के पीछे मंशा यह थी कि इससे कार्यकर्ताओं व जनता के बीच आपस में रिश्ते और मधुर बनेंगे तथा कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार भी होगा। दूसरा महत्वपूर्ण निर्देश यह दिया था कि हर माह प्रदेश भाजपा कोर ग्रुप की एक बैठक अवश्य होनी चाहिये और उसमें सत्ता व संगठन से जुड़े तमाम मुद्दों पर निर्णय होना चाहिये। कोर ग्रुप में सत्ता व संगठन दोनों के प्रतिनिधि रहते हैं चूंकि प्रदेश अध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री इसमें मौजूद रहते हैं इसलिए लिए गए निर्णयों पर तेजी से अमल होने का मार्ग प्रशस्त होता है। लेकिन अभी तक इस निर्देश की भी पूरी तरह अनदेखी हुई और कोर ग्रुप की एक भी बैठक नहीं हुई। भाजपा मिस-काल द्वारा सदस्य बनाने की मुहिम चलाकर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है और मध्यप्रदेश में भी लगभग एक करोड़ सदस्य बनने का दावा किया गया था। शाह ने निर्देश दिया था कि मध्यप्रदेश में जितने भी सदस्य बने हैं उनका जिला व मंडल स्तरीय सम्मेलन बुलाया जाए, लेकिन ऐसे सम्मेलन भी आयोजित नहीं हो पाये हैं। सम्मेलन बुलाने का मकसद यह था कि जो नए सदस्य बने हैं उन्हें भाजपा की रीति-नीति, विचारों और सिद्धांतों से अवगत कराया जाए और वे भाजपा की मूलधारा में सक्रिय हो जायें। यदि ऐसे सम्मेलन जिलों में आयोजित हो गए होते तो एक बहुत बड़ा नया वोट बैंक व कार्यकर्ताओं की फौज चुनावी साल में भाजपा के ज्यादा काम में आती।

सौदान सिंह ने यह भी कहा कि लगता है संभाग व जिलों के प्रभारी बहुत ज्यादा बना दिए गए हैं। उन्होंने संभागीय प्रभारियों से पूछा कि दो साल में आपने अपने जिलों व मंडलों में कितने दौरे किए और पार्टी की मजबूती के लिए क्या कार्यक्रम आयोजित किए तब अधिकांश संभागीय प्रभारी एक-दूसरे का मुंह ताकते नजर आये। इस स्थिति पर उन्होंने एक तरह से असंतोष प्रकट करते हुए कहा कि इसका आशय यह है कि प्रभारी सक्रिय ही नहीं हैं। जहां तक संगठन की सक्रियता का सवाल है तो अधिकांश मोर्चों की जिला व मंडल स्तर की कार्यकारिणी ही गठित नहीं हुई हैं। प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की हर तीन माह में बैठक होना चाहिए थी लेकिन अक्टूबर माह के बाद कोई बैठक नहीं हुई है। भाजपा के संविधान के अनुसार प्रदेश में एक पांच सदस्यीय वित्तीय समिति का गठन होना चाहिए जो कि पार्टी में आने-जाने वाले पैसे यानी आय-व्यय पर नजर रखे, लेकिन पता चला है कि ऐसी वित्तीय निगरानी समिति का भी अभी तक गठन नहीं हुआ है।

सौदान सिंह के प्रवास का असली मकसद संगठन के हालातों का फीडबैक लेना था क्योंकि संघ और भाजपा के आंतरिक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि सत्ता, संगठन व कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ी हैं। यही कारण है कि उनका फोकस सबसे अधिक कार्यकर्ताओं पर ही रहा।

जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में रहती थी तब कार्यकर्ताओं को देव-दुर्लभ कहकर सम्बोधित करती थी, लेकिन आज आम निष्ठावान कार्यकर्ता के मन की पीड़ा यही है कि संगठन के पदाधिकारी और अधिकांश मंत्री उनके लिए देवताओं की तरह दुर्लभ हो गए हैं। उनके मन की पीड़ा या मानस को पढ़ने वाला और उनसे सहानुभूति के दो बोल बोलकर पीठ थपथपाने तथा कंधे पर हाथ रखकर अपनेपन का अहसास कराने कोई आगे नहीं आ रहा। पार्टी अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और सरकार के अधिकांश मंत्रियों के पास उनकी बात सुनने का तनिक भी समय नहीं है। दिलचस्प पहलू यह है कि लगभग 15 साल से मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है और केंद्र में भी भाजपा की सरकार को चार साल होने जा रहे हैं, लेकिन कार्यकर्ता पार्टी से जुड़ने की बजाए दूर होता जा रहा है। जैसे-जैसे 2018 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव की आहट तेज होती जा रही है वैसे-वैसे अब पार्टी को कार्यकर्ताओं की याद आने लगी है। प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने के लिए जो टिप्स सौदान सिंह ने दिए हैं उसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि अभी भी हालात संभाले जा सकते हैं और परिस्थितियां हाथ से बाहर नहीं खिसकी हैं इसलिए तत्काल हर स्तर पर कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने की सक्रिय पहल हो ताकि उनमें पार्टी व नेतृत्व के प्रति आत्मीयता का भाव बढ़े। अब देखने वाली बात यही होगी कि आगामी छ: माह में भाजपा संगठन सौदान सिंह की बात को कितनी गंभीरता से लेगा। आशा की यह किरण सौदान सिंह अवश्य दिखा गए कि अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं, संभलो और मुस्तैदी से चुनावी समर में डट जाओ तथा केंद्र व राज्य सरकार की उपलब्धियां जन-जन तक पहुंचाओ और कार्यकर्ताओं के मन की पीड़ा को दूर करो।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।