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कांग्रेस में दिग्विजय दरकिनार नहीं, स्वयं चुनी अपनी भूमिका – अरुण पटेल

अरूण पटेल

वरिष्ठ कांग्रेस नेता,पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश कांग्रेस समन्वय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह का पिछले दिनों सोशलमीडिया पर वायरल हुआ यह कथन कि मेरे भाषण से वोटकट जाते हैं इसलिए मैं रैलियों में नहीं जाता। यह इतना वायरल हुआ कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यहां तक कहा कि कांग्रेस ने इतने बड़े नेता की ऐसी दुर्गति कर दी कि इन दिनों उनका जो दर्द है वह उनकी पार्टी का ही दिया हुआ है। इसको लेकर मीडिया में भी काफी चर्चा हुई कि दिग्विजयसिंह को कांग्रेस में अलग-थलग कर दिया गया है। हकीकत यह है कि दिग्विजय सिंह को कांग्रेस में दरकिनार नहीं किया गया है बल्कि उनकी अपनी चुनाव में क्या भूमिका हो वह उन्होंने स्वयं तय किया है और उसके अनुरुप ही उन्हें काम दिया गया है। पिछले कालम में 1993 के कांग्रेस टिकिट वितरण के संदर्भ में श्यामाचरण शुक्ल के कुछ उदाहरण दिए गए थे, आज अर्जुन सिंह के टिकिट वितरण के दौरान क्या विचार थे उसका उल्लेख करेंगे।

दिग्विजय सिंह को अलग करने के किस्से राजनीतिक फलक पर इन दिनों कुछ अधिक ही चर्चित हो रहे हैं। भाजपा की रणनीति यह है कि किसी भी ढंग से चुनावी फलक पर दिग्विजय मुख्य किरदार की भूमिका में आयें ताकि ‘मिस्टर बंटाधार’ के उसके पुराने नारे को वह इस चुनाव में भी भुना सके। जहां तक कांग्रेस के दो चेहरों कमलनाथ व ज्योतिरादित्य सिंधिया का सवाल है उनके विरुद्ध ऐसा कुछ कहने को नहीं है जिसको भाजपा मुख्य चुनावी मुद्दा बना पाये। दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल को ही भाजपा कांग्रेस के विरुद्ध एक हथियार के रुप में इस्तेमाल करना चाहती है जबकि एक कहावत यह भी है कि ‘काठ कीहांडी एक बार चढ़ती है बार-बार नहीं‘ लेकिन भाजपा उसे फिर से चढ़ाकर मतदाताओं के मन में दिग्विजय सिंह के कार्यकाल के हालातों का चित्र प्रस्तुत कर चुनावी लाभ लेना चाहती है। यह बात दिग्विजय सिंह भी समझते थे इसलिए उन्होंने अपने आपको पीछे रखकर कांग्रेस की गुटबंदी समाप्त करने में उनकी क्या भूमिका हो सकती है वह चुनी और उसपर पूरी शिद्दत के साथ अमल भी कर रहे हैं। हाल के विंध्य क्षेत्र के दौरे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की एक सभा में दिग्विजय सिंह को भी बोलने को कहा गया, लेकिन उन्होंने बोलने से मना कर दिया। इसके बाद यह किस्से भी चल निकले कि अपने को अलग-थलग किए जाने से दिग्विजय सिंह खुश नहीं हैं इसलिए उन्होंने इस ढंग से अपनी नाराजी प्रकट की। इस पर दिग्विजय ने सफाई दी कि वे सोनिया गांधी व राहुल गांधी की उपस्थिति में उनकी रैलियों में भाषण नहीं देते। नर्मदा परिक्रमा यात्रा के दौरान ही दिग्विजय ने यह साफ कर दिया था कि वे पूरे प्रदेश में कांग्रेसजनों को एकजुट करने का काम करेंगे और ‘पंगत में संगत‘ के माध्यम से सबको एक कर कांग्रेस को मजबूत करेंगे। यदि कांग्रेस एकजुट हो जाती है तो फिर उसे आसानी से चुनावी समर में नहीं हराया जा सकता। कांग्रेस की आज यदि दुर्गति हुई है तो उसका एक कारण यह भी है कि वह गहरे तक गुटबाजी के दलदल में फंस गई है। सभी कांग्रेसजनों को एकजुट करने और पंगत में संगत के माध्यम से दिग्विजय शपथ दिला रहे हैं कि उम्मीदवार चाहे कोई हो सब पंजे को ही उम्मीदवार मानकर एकजुट होकर काम करें और उम्मीदवार को जितायें। दिग्विजय सिंह का संकल्प है कि इस बार हर हाल में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए वे सबको एकजुट करके ही दम लेंगे। दिग्विजय ने उस समय ही साफ कर दिया था कि वे कहीं भी सभाएं नहीं लेंगे,केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं से बात करेंगे और आज भी वे वही काम कर रहे हैं। टिकिट वितरण के बाद उनकी भूमिका अधिक चुनौतीपूर्ण होगी क्योंकि असंतुष्टों से संपर्क कर उन्हें उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट करने में भिड़ना होगा। उन्होंने स्वयं जो भूमिका चाही थी वही भूमिका कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें दी है और चुनाव के लिए जो विभिन्न समितियां बनी उनमें कांग्रेस समन्वय समिति का अध्यक्ष उन्हें बनाया गया है।

जहां तक दिग्विजय सिंह का यह कथन कि मेरे भाषण से वोट कटते हैं इसलिए मैं रैलियों मे नहीं जाता। इसको लेकर जब विवाद बढ़ा तब उन्होंने कहा कि ऐसी धारणा बन गई है इसलिए मैं रैलियों में नहीं जाता। लेकिन रैलियों में नहीं जाने का फैसला उनका अपना है और मुख्य किरदार की भूमिका में आने से उन्होंने अपने को पीछे रखा है। इसके साथ ही उसी समय उन्होंने प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी के निवास पर कार्यकर्ताओं को यह भी नसीहत दी कि चाहे आपके दुश्मन को भी टिकिट मिले तो भी उसे जिताओ। उनका कहना था कि मेरा काम प्रचार करना और भाषण देना नहीं है, उन्होंने कार्यकर्ताओं को यह भी नसीहत दी कि मैदान में जाकर काम करो अन्यथा सरकार बनाने के सपने देखते रह जाओगे। इसका मतलब यह है कि दिग्विजय ने अपने लिए जो भूमिका चुनी वे अपने आपको उसी तक सीमित रखना चाहते हैं। एक बात साफ है कि आप दिग्विजय सिंह को पसंद कर सकते हैं या नापसंद कर सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय और प्रादेशिक फलक पर न तो उन्हें दरकिनार किया जा सकता है और न ही हाशिए पर खिसकाया जा सकता है।

क्या सर्वे के आधार पर ही टिकिट मिलेंगे-

कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया यह कहते रहे हैं कि टिकिट केवल सर्वे के आधार पर दिए जायेंगे। कमलनाथ ने कहा है कि दूसरी पार्टी से आने वाले कुछ जिताऊ उम्मीदवारों को भी टिकिट दिए जायेंगे। ज्योतिरादित्य ने दशहरे के अवसर पर टिकिट के दावेदारों से कहा कि इस बार टिकिट किसी के समर्थक होने से नहीं बल्कि सर्वे के आधार पर दिए जायेंगे और एक प्रतिशत टिकिट दूसरे दलों से आने वालों को भी मिलेंगे। यह बात तो टिकिट वितरण के बाद ही सामने आयेगी कि टिकिट केवल सर्वे के आधार पर मिले या कुछ को नेताओं की गणेश परिक्रमा का प्रसाद मिल गया।ज्योतिरादित्य ने ग्वालियर-चंबल संभाग के 34 में से 26 सीटों के टिकिटों के दावेदारों के साथ बैठकर चार घंटे तक माथापच्ची की और यह समझाने की कोशिश की कि हम सबका लक्ष्य एक है सरकार बनाना। हर सीट पर एक से अधिक दावेदार हैं लेकिन टिकिट एक को ही मिलेगा, टिकिट न ज्योतिरादित्य तय करेंगे, न दिग्विजय तय करेगे, न कमलनाथ, बल्कि राहुल गांधी द्वारा कराये गये गोपनीय सर्वे के आधार पर टिकिट मिलेगा और जिसे मिलेगा उसे जिताने में सभी को जुटना होगा। दावेदारों से उन्होंने वचन लिया कि वे घोषित प्रत्याशी के समर्थन में जी-जान से जुट जायेंगे। उन्होंने टिकिटार्थियों को यह भी भरोसा दिलाया कि जो टिकिट से वंचित रह जायेंगे उन्हें सत्ता में आने पर सम्मानपूर्वक पदों से नवाजा जायेगा। इसलिए सारे गिले-शिकवे भूलकर प्रत्याशी को जिताने में जुट जायें।

और यह भी-

1993 में जब कांग्रेस पुनः सत्ता में आई थी उसके पूर्व टिकिट बांटते समय तत्कालीन नेताओं की आपस की जो सद्भावना थी उसके संबंध में पिछले कालम में श्यामाचरण शुक्ल के कुछ उदाहरण दिए। उस पर अर्जुनसिंह के विश्वासपात्र और हर समय उनके साथ रहने वाले मोहम्मद युनुस जो पहले सीधी में पत्रकार भी थे, उनकी इस पर प्रतिक्रिया आई कि ‘मुख्यमंत्री की कुर्सी तो सिर्फ मेरी है‘ इस सोच से क्या आज के स्वनामधन्य मौजूदा कांग्रेसी नेता उबर पायेंगे। उनका कहना था कि 1993 के नेताओं की बात अलग थी तब समर्पण था कांग्रेस के लिए, अब चाहत कुर्सी की है। हमारे समर्थकों में से एक बड़े नेता अर्जुनसिंह जी से जब भी मौका मिलता तीन-चार नामों को लेकर उनके गुटीय संघर्ष का कसीदा काढ़ने लगते थे। एक दो बार तो साहब ने कहा ठीक है विचार हो रहा है, सबकी राय से जीतने वाले को टिकिट दिया जाएगा, परन्तु नेताजी पर इसका असर नहीं पड़ा। आखिर एक दिन ऐसा आया जब गुस्से में साहब ने नेताजी को डांटते हुए कहा कि पहले कांग्रेस को जिता लो फिर अर्जुनसिंह, श्यामाचरण और माधवराव की बात करना। जब कांग्रेस होगी तभी तो माधवराव, श्यामाचरण और तुम्हारा सबका अस्तित्व है। इस बार पार्टी चुनाव में हारी तो सब समाप्त हो जाओगे, टिकिट उसे मिलेगा जो जीतने लायक होगा, सिर्फ बड़े नेताओं के कट्टर समर्थक होने से टिकिट नहीं मिलेगा और कोई भी नेता तब तक बड़ा है जब तक कांग्रेस पार्टी है। जो बात 25 साल पहले अर्जुनसिंह ने कही थी क्या उसको आज टिकिट बांटने के लिए टेबल पर बैठते समय कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा अजय सिंह याद रख पायेंगे और उस भावना से जीतने लायक उम्मीदवार छांट पायेंगे। जो नजरिया अर्जुनसिंह, श्यामाचरण शुक्ल और माधवराव सिंधिया ने उस समय दिखाया था, क्या वैसी भावना आज बड़े नेता दिखा पायेंगे या मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर ही टकटकी लगाकर फैसला करेंगे।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।