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उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव के समक्ष बढ़ती चुनौतियां ! – राज खन्ना

राज खन्ना

फिलहाल शिवपाल यादव यू पी के राजनीतिक परिदृश्य के एक चर्चित किरदार बन गए हैं। उनकी अगुवाई वाला नवगठित सेक्युलर मोर्चा चुनावी लड़ाई में कोई बड़ा उलटफेर करने वाला है, इसकी चर्चा कम, ज्यादा अटकलबाजी उसके जरिये सपा को होने वाले संभावित नुकसान की है।”’और नुकसान को लेकर यह आकलन चुनाव के पहले और चुनाव के वक्त दोनों को लेकर है।

गोरखपुर, फूलपुर, कैराना उपचुनावों की कामयाबी ने सपा की बसपा पर निर्भरता बढ़ा दी है। इस जीत की खुशी ने सपा से ज्यादा बसपा को इतराने का मौका दिया है।गोरखपुर, फूलपुर के नतीजों के बाद कैराना को लेकर बसपा की चुप्पी ने इसके संकेत देने शुरू कर दिए थे । छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में बसपा के कांग्रेस से तालमेल न होने की खबरों की खूब चर्चा हुई है।बसपा इन राज्यों में राजनीतिक जमीन की अर्से से तलाश में है। हाथ-पैर सपा भी मारती रही है। पर इन कोशिशों के बीच इन राज्यों में बसपा ने सपा को साथ लेने लायक कही नहीं माना।

2019 के लिहाज से यू पी में सपा-बसपा के गठबंधन ने भले औपचारिक रूप से आकार न लिया हो लेकिन मायावती अपने पुराने तेवरों में नजर आने लगी हैं। सीटों के सम्मानजनक बंटवारे की हालत में ही साथ नही तो अकेले ही चुनाव मैदान में जाने की उनकी शुरुआती चुनौतियों के प्राम्भिक नतीजे उनके हक़ में जाते नज़र आये हैं।भाजपा को रोकने के लिए दो-चार कदम पीछे हटने से परहेज नही का अखिलेश यादव का बयान एक बड़ी लड़ाई के लिए लचीलेपन से जोड़ा जा सकता है, लेकिन मायावती की शैली से वाकिफ लोग जानते हैं कि वे अपने वोट बैंक को ट्रांसफर करने की कीमत वह सहयोगी के समर्पण तक वसूलती हैं।भाजपा और साम्प्रदायिकता को रोकने के नाम पर गठबंधन की जरूरत तो एक बहाना है, असलियत में सपा और बसपा दोनों को अपने अस्तित्व के लिए इस साथ की जरूरत है।यह जरूरत किसके लिए ज्यादा है? पिछले चुनावी नतीजे की सीटों को पैमाना मानिए तो बसपा को ज्यादा। यूपी विधानसभा की 2007 की उसकी 206 सीटें 2012 में घटकर 80 हुईं तो 2017 में 19 रह गईं। लोकसभा में 2009 का उसका सर्वश्रेष्ठ 21 सीटों का प्रदर्शन 2014 में शून्य पर टिका। सपा ने पारिवारिक सीटों के नाम पर ही सही 2014में लोकसभा में पांच सीटें बचाये रखीं।2012 की यूपी विधानसभा की 224 सीटें 2017 में 47 रह गईं। सीटों के लिहाज से बसपा से बेहतर स्थिति में होने के बाद भी अखिलेश यादव के लिए अपने पिता-परिवार की चिर विरोधी के आगे लगातार झुकना क्यों जरूरी है?

सपा पर कब्जे की पारिवारिक लड़ाई अखिलेश यादव ने प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते जीती थी। वह कुर्सी पर न रहते तो इस लड़ाई का क्या नतीजा होता, यह सवाल निरर्थक हो चुका है। पर पार्टी पर कब्जे के बाद अकेले अखिलेश अपनी पार्टी को ताकत देने का कोई संकेत नही दे सके हैं।लोकसभा उपचुनावों की तीन महत्वपूर्ण सीटें उनकी पार्टी की झोली में गईं, लेकिन उसका श्रेय मायावती के हिस्से में गया।गठबंधन की मजबूरी की उदारता ने उनकी स्थिति को और कमजोर किया।उन्होंने पार्टी पर वर्चस्व स्थापित कर पिता मुलायम सिंह यादव को श्रीहीन और चाचा शिव पाल यादव को भले किनारे कर लिया हो लेकिन एक परिवार का पर्याय बन गई पार्टी फिलहाल पारिवारिक कलह की कीमत चुकाने के रास्ते मे है।नीचे जाने का यह सिलसिला कहाँ कब थमेगा, इसकी पैमाइश चुनावों में होती रहेगी। अखिलेश पतन रोकने के लिए परिवार को साथ लेने से ज्यादा बसपा-मायावती का साथ जरूरी मान चुके हैं, तो प्रतिद्वंदी खेमा बात भाजपा के विरोध की करते हुए पहले,”घर का हिसाब” चुकता करने की तैयारी में है। शिवपाल खेमा कितने वोट जुटा पाता है,यह बाद की बात है।

बसपा से गठबंधन की हालत में सीटों के बराबर बंटवारे की स्थिति में(मायावती अगर मानी तब!) खाली सीटों पर गठबंधन से असंतुष्ट सपाइयों को साथ लेने का उनके पास आसान मौका होगा। शीर्ष स्तर पर गठबंधन जितना आसान होता है, जमीनी कार्यकर्ताओं को उसे कुबूल कराना सबसे मुश्किल।हर दल में दावेदारों की कतार है और सबको चुनाव का इंतजार होता है।फिर अगर काफी पहले से ही अपने इलाके में हिस्से में सीट न आने के संकेत मिलने लगे तो संगठनात्मक सुस्ती बढ़ती है और कैडर ठौर तलाशने लगता है।ऐन चुनाव वक्त के गठबंधन पार्टी के लिहाज से बहुत पहले से तय गठबंधन के मुकाबले ज्यादा कारगर साबित होते रहे है। सीटों के बंटवारे को लेकर अनिश्चितता शिव पाल यादव को फौरी तौर पर लाभ दे रही है।सपा-बसपा के गठबंधन को लेकर चिंतित भाजपा का शिव पाल यादव के प्रति उदार रुख छिपा नही। पर यह सब जानते है कि न यह विचारों की लड़ाई है और न सिद्धान्तों से कोई लेना-देना।सबको अपना हिस्सा चाहिए।जहां गुंजाइश दिखेगी उधर झुकेंगे।

शिवपाल यादव मजबूत नही हैं लेकिन 2017 में पार्टी में हाशिये पर पड़े जैसे कमजोर नही।वह साथ जुड़ने वालों को कुछ देने की स्थिति में नही लेकिन एक बैनर तले लड़ने-पहचान देने के बहाने हुजूम जोड़ने की स्थिति में हैं। उधर 2012 के ऊर्जा-उत्साह से भरपूर अखिलेश 2017 की हार से अभी उबर नही सकें है। उत्तराधिकार हासिल करने के लिए उन्होंने पिता को पराजित किया। पर कडुवाहट भरी उस जीत में उनका राजनीतिक कौशल-परिपक्वता और वोट बैंक भी जीत सके हैं,इसके 2017 के पहले इम्तेहान में वह विफल रहे।2019 में फिर अवसर है। दिक्कत यह है कि सफलता के लिए जिस घाघ मायवती का उन्हें आसरा है, वह गठबंधन का नेतृत्व और जीत का श्रेय अपने पाले में रखने के लिए पहचानी जाती हैं।कभी अपने धोबी पाट दांव के लिए पहचाने जाने वाले उनके पिता ने सपा को 2012 में पहले नम्बर और पूर्ण बहुमत की सरकार देने वाली पार्टी बनाया था।2017 में अखिलेश ने उस बढ़त को गंवा दिया। 2019 के संभावित गठबंधन की मौजदा तस्वीर में वह जूनियर पार्टनर के तौर पर नजर आ रहे हैं। यह एक कुनबे की पार्टी की स्वाभाविक नियति है या इसमें खुद अखिलेश के अपने नेतृत्व की भी कमियां?

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।