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आरक्षण जरूरी,पर तार्किक बने – रघु ठाकुर

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के विचारक एंव पदाधिकारी श्री एम. जी. वैद्य ने जातिगत आरक्षण समाप्त करने का बयान दिया है।उन्होने कहा कि केवल अनुसूचित जाति व जनजाति को जातिगत आरक्षण देना चाहिये तथा उसमे भी आर्थिक आधार हो ताकि गरीबों को ही उसका फायदा मिल सके।

श्री एम. जी. वैद्य का बयान एक ऐसे समय आया है जब उ. प्र. चुनाव आसन्न है तथा चार अन्य राज्यों में भी चुनाव होने हैं।इस बयान के निहितार्थ हैं कि एक तो वे पिछड़े वर्गों के आरक्षण को ही अभी समाप्त करने की बात कर रहे है। उनका यह बयान श्री मोहन भागवत के बिहार विधानसभा के पूर्व दिये गये ’’ आरक्षण की समीक्षा करना चाहिये ’’ से थोड़ा ज्यादा परिपक्व व कूटनीतिक है। बिहार में भा.ज.पा. की हार के अनुभव को ध्यान में रखकर शायद उन्होने या संघ ने अनुसूचित जाति/जनजाति एवं पिछड़े वर्गों को अलग अलग कसौटी पर रखा है। संघ वास्तव में जिन सवर्ण जातियों की प्रतिनिधि प्रवक्ता है, आजादी के पूर्व सदियों तक वे आरक्षण का फायदा उठाती रही है,हालांकि आजादी के बाद वे सदैव ही आरक्षण के विरोध में रही है। उनके इस आरक्षण विरोध का वास्तविक तात्पर्य सवर्ण वर्चस्व को कायम रखना व उनको अप्रत्यक्ष आरक्षण देने जैसा ही है। उनके इस बयान के निम्न पहलू हैं :-

1. उ.प्र. के आसन्न चुनाव में पिछड़े वर्गों की राजनीति को पराजित करना तथा आरक्षण विरोध की बात उठाकर सवर्णों को भाजपा के पक्ष में एकजुट करना।

2.पिछड़े वर्ग व अनु. जाति/जनजाति को परस्पर दूर कर एक तरफ तो इनका सामाजिक विभाजन करना ताकि सवर्णवाद की ताकत मजबूत रहे तथा दूसरी तरफ पहले चरण में पिछड़े वर्गों को अलग थलग करना। श्री वैद्य यह जानते हैं कि अगर पिछड़ा वर्ग अलग थलग हो जाये तथा उसका आरक्षण समाप्त हो जाये तो सवर्णवाद के लिये जातीय वर्चस्व व उच्च नौकरियों का ( जो वास्तविक सत्ता होती है ) एकदम चुनौती रहित मार्ग प्रशस्त हो जायेगा तथा अगर प्रथम चरण में इस लक्ष्य की पूर्ति मे अनु. जाति/जनजाति के लोग सवर्णों के सहभागी बन जाये तो फिर अगले चरण में पिछड़े वर्गों को साथ लेकर अनु. जाति/जनजाति का आरक्षण समाप्त करना कुछ आसान कसरत हो जायेगी।

3.    जहॉं तक आरक्षित तबको में आर्थिक आधार लागू करने का प्रश्न है तो वह तो अभी भी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद सरकार ने क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू किया है। तथा आरक्षित वर्गों/समूहों के चाहे वे पिछड़े हों या अनु. जाति/जनजाति के क्रीमीलेयर से कम आय वाले प्रत्याशियों को ही आरक्षण देने का नियम बनाया है।

दरअसल इस आरक्षण के बारे में कुछ भ्रांतियॉं है जिनकी भी सफाई भी जरूरी है :-

1.    आरक्षण भागीदारी के लिये है न कि बेरोजगारी का विकल्प। अगर 100 प्रतिशत भी आरक्षण हो जाये तो भी सभी बेरोजगारों ( पिछड़े या अनु. जाति/जनजाति के ) को नौकरियॉं नही मिल सकती या आरक्षण समाप्त हो जाये तो भी सभी बेरोजगारों ( सवर्णों ) को नौकरियॉं नही मिल सकती। प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी की कुल शेष नौकरियॉं बमुश्किल 2 – 3 लाख ही होंगी। ये अगड़े, पिछड़े, दलित किसी को भी मिल जायें उन वर्गों की बेरोजगार नही मिटेगी।

2.    आरक्षण तो हिस्सेदारी के लिये है। चूंकि हमारा समाज सैकड़ों वर्षों से वर्ण व्यवस्था व जातिप्रथा के उच्चवर्गीय आरक्षण के कारण असंतुलित समाज बन गया है जिसमे आबादी का एक बड़ा हिस्सा कई सदियों के लिये ज्ञान, शक्ति व संपत्ति के केन्द्रों से दूर व वंचित कर दिया गया था इसलिये इस हिस्सेदारी के लिये आरक्षण की आवश्यकता है। अवसरविहीनता भी अयोग्य बनाती है। तथा पिछड़े वर्गों या अनु. जाति व जनजातियों की अयोग्यता (अगर कोई ) है तो उनके उपर तत्कालीन समाज व्यवस्था के द्वारा थोपी गई लाचारी है। इसीलिये हमारे देश को लम्बी गुलामी भी सहना पड़ी। फिलहाल आरक्षण तो राष्ट्रीय ऐकता व राष्ट्रीय शक्ति सर्जना के लिये बुनियादी जरूरत है।

3.    आरक्षण योग्यता को नष्ट नही करता वरन योग्यता को पैदा करता है। न केवल भारत में बल्कि दुनिया के संपन्न व ताकतवर देशों में भी आरक्षण किसी न किसी रूप में है। यथा – अमेरिका मे उसे ’’विविधता का सिंद्धांत कहते हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया ने इसे ’’ विषेष अवसर ’’ का सिद्धांत कहा था याने जो लोग इतिहास में भागीदारी से वंचित रहे हैं उन्हे बराबरी पर लाने के लिये विशेष अवसर प्रदान किये जायें।

4.    यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि हमारे देश के ताकतवर लोग स्वतः के लिये तो आरक्षण रूपी संरक्षण चाहते हैं। बड़े बड़े उद्योगपति वैश्विक प्रतियोगिता से बचने के लिये स्वदेशी की चर्चा करते हैं और खुद के लिये सरकारी संरक्षण चाहते है। अपने लिये आरक्षण का समर्थन तथा व्यापक समाज के लिये आरक्षण का विरोध। यह दोहरी नीति भारतीय समाज आमतौर पर अपनाता है।

5.    आरक्षण के विरोध में एक यह तर्क दिया जाता है कि आरक्षण से योग्यता समाप्त हो जायेगी। अयोग्य डॉक्टर बन जायेंगे। क्या यह तथ्य है । डॉक्टरी या इंजीनियरिंग या तकनीकी शिक्षा के लिये आरक्षण प्रवेश में ही मिलता है, उत्तीर्ण होने के लिये नही। जो उत्तीर्ण होगा वह समयोग्यता वाला ही होगा। संघ के मित्रों को इस कटुसत्य को पचाना चाहिये कि आरक्षण से योग्यता समाप्त नही होती वरन योग्यता पाने का अवसर मिलता है। 1971 का युद्ध जिसके बाद बंग्लादेश अलग देश बना, रक्षामंत्री बाबू जगजीवन राम के कार्यकाल में ही जीता गया था। अभी सर्जिकल स्ट्राईक के द्वारा भारत के आत्मविश्वास को जगाने वाले प्रधानमंत्री श्री मोदी स्वतः पिछड़े वर्ग व आरक्षित वर्ग से हैं।

6.    यह अंर्तविरोध भी आश्चर्यजनक है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जो स्वतः राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के हैं – कहते हैं कि ’’ मेरे रहते कोई आरक्षण समाप्त नही कर सकता। ’’ संघ के दूसरे स्वंय सेवक श्री शिवराज सिंह कहते हैं ’’ किसी के बाप में आरक्षण को समाप्त करने की ताकत नही है। ’’ और उनकी मात् संस्था व वैचारिक कार्यक्रमों के नियंत्रक श्री वैद्य कहते हैं कि आरक्षण समाप्त होना चाहिये। कहीं ये सवर्णों या अवर्णों दोनो जातियों को गुमराह कर दोनो के वोट लेने का खेल तो नही है ?

7.    अगर संघ सबको समान मानता है तथा बाबा साहब अंबेडकर को भी मानता है ( यह उनका दावा है, मेरा कथन नही ) तो फिर आरक्षण का विरोध क्यों ? यह व्यवस्था तो वैधानिक रूप से बाबा साहब व गॉंधी जी के बीच समझौते से ही पैदा हुई थी। तथा संविधान में इसे शामिल कराने में भी बाबा साहब का योगदान था।

8.    यह भी कहा जाता है कि अंबेडकर जी ने संविधान पेश करते समय आरक्षण को दस वर्ष के लिये रखा था। दरअसल महत्वपूर्ण समय सीमा नही है वरन महत्वपूर्ण है लक्ष्य व परिणाम। क्या हमारा समाज आरक्षण की भावना के अनुसार सम सहभागिता का समाज बन गया ? अगर 70 वर्षों मे भी हम नौकरियों या निर्वाचित संस्थाओं में आनुपातिक हिस्सेदारी की समता नही ला पाये तो यह गलती आरक्षण या विशेष अवसर के सिद्धांत की नही वरन उसे क्रियान्वित करने वालों की है।

9.    संघ जिस जातीय श्रेष्ठता को पुनःस्थापित करने के लिये आरक्षण के विरूद्ध बहस चलाता है वह उसकी संगठनात्मक लाचारी भी हो सकती है। पर अगर हम वास्तव में भारत को एक समाज के रूप में विकसित और मजबूत करना चाहते हैं तो हमे विशेष अवसर के सिद्धांत को तब तक चालू रखना होगा जब तक जातीय भागीदारी आबादी के समतुल्य न हो जाये। साथ ही उसमे कुछ तार्किक सुधार करने होंगे।

मेरी राय में आरक्षण को तार्किक, व्यापक व उपयोगी बनाने के लिये निम्न कदम उठाना चाहिये :-

1.    आरक्षण वैज्ञानिकों/विशेषज्ञों के पदों में न हो। पर कलेक्टरी से लेकर लिपिक व बाबू – पुलिस से लेकर पटवारी तक के प्रशासनिक व अन्य सभी पदों मे हो।

2.    स्व. मधु लिमये के सुझाव के अनुसार ’’ आरक्षण की स्व समापीय योजना ’’ लागू हो जिसके अनुसार एक आयोग बने जो निरंतर आबादी व शासकीय या निजी नौकरियों में संख्यात्मक संतुलन की जॉंच करता रहे। जो जातियॉं आबादी से तुलनात्मक रूप से अधिक हो जाये उन्हे आरक्षण सूची से बाहर निकाल दिया जाये तथा जो कम हो जायें उन्हे शामिल कर लिया जाये। इस प्रयोग से 10-20 वर्षों में हमारा देश सही अर्थों में समाजिक समानता व समरस्ता का मजबूत देश बनेगा।

3.    पदोन्नति में आरक्षण निस्संदेह कटुता व तनाव पैदा करता है परन्तु दूसरी तरफ जो डी.पी.सी. ( विभागीय ) होती है वे भी अक्सर भेदभाव या अन्याय का निमित्त बनती है। अतः पदोन्नति का एकमात्र आधार केवल वरिष्ठता को तय किया जाना उचित होगा। मात्र शिकायत के आधार पर किसी व्यक्ति को पदोन्नति के अवसर से वंचित न किया जाये जब तक कि उसके विरूद्ध दोषसिद्ध न हो।

4.    स्नातकोत्तर तक सबको समान शिक्षा व निःशुल्क शिक्षा का संवैधानिक प्रावधान बने।

5.    एक व्यक्ति के पास केवल ऐक रोजगार हो। बड़े जमींदारों, उद्योगों के मालिकों व जिनकी किसी अन्य स्रोत से आय 10 लाख प्रतिवर्ष से अधिक हो उन्हे नौकरी के लिये अपात्र माना जाये।

6.    फौरी तौर पर पिछड़े वर्ग व अनु. जाति जनजातियों के आरक्षण को दो खंडो में विभाजित किया जाये। एक खंड में शूद्रों की भूमिहीन व संपत्तिहीन कौशल वाली जातियॉं हो तो दूसरे में जमीन व संपत्ति की मालिक अन्य जन्मना शूद्र जातियॉं हो।

7.    जिस व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिल जाये उसकी दूसरी पीढ़ी को राजनीति या प्रशासन में आरक्षण न हो।

इन सुझावों पर विचार किया जा सकता है। तथा विशेष अवसर के सिद्धांत को ज्यादा तार्किक न्यायसंगत और समतामूलक बनाया जा सकता है। परन्तु भारतीय राजनीति जो संकीर्ण आधारों पर टिक गई है, शायद ही ऐंसा करे। पिछड़े वर्गों व अनु. जाति/जनजाति के नेताओं को भी परस्पर संवेदनशील – सहभागी व सहयोगी बनना होगा। ’’ अपनी जातीय श्रेष्ठता पैदा करने या थोपने का प्रयास भी जातिवाद व नवब्राम्हणवाद है। परिवारवाद नवसामंतवाद है तथा औद्योगिक विविधता के पीछे पूंजीवाद है ’’। पिछड़े वर्गों के व अनु. जाति/जनजातियों के नेताओं को इन तीनों बीमारियों से मुक्ति पाना होगी, नवब्राम्हणवाद – नवसामंतवाद – नवपूंजीवाद। अन्यथा हार सुनिश्चित है। जाति परिवर्तन को रोकने का शस्त्र है और जाति को मिटाकर वर्ग बनाना परिवर्तन का महाअस्त्र।

 

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर देश के जाने माने समाजवादी चिन्तक है।वह स्वं राममनोहर लोहिया के अनुयायी है और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक भी है।